शनिवार, 25 अक्तूबर 2008

दिग्भ्रमित भारतवासी

हम हिंदू, शैव, वैष्णव, जैन, सिक्ख, बोद्ध, आर्यसमाजी हैं या सनातनी या वैदिक या फ़िर कोई और हमारी भाषा क्या है हिन्दी, अंग्रेजी, उर्दू, बंगला या तमिल या फ़िर मराठी, हमारी संस्कृति क्या है आर्य, द्रविड़, पञ्जाबी, गुजराती, उत्तर भारतीय, दक्षिण या पूर्व या फ़िर कोई और हमारी जाति क्या है शर्मा, गुप्ता,ठाकुर,जाटव या कोई और हमारे देश का नाम क्या है भारत वर्ष, आर्य व्रत, हिन्दुस्तान, इंडिया या कुछ और हमारा भूतकाल क्या है मुग़ल-शाशक, ब्रिटिश-राज या राम-राज या कोई और हमारे आदर्श कौन हैं अकबर, ओरंगजेब, शेरशाह सूरी, मोहम्मद बिनकासिम, नेहरू, गाँधी, सरदार पटेल, भगत सिंह, शिवाजी या शंकराचार्य, दयानंद सरस्वती, श्रीराम, श्रीकृष्ण, ऋषि कपिल मुनि , कणाद , पतंजलि, वेदव्यास या कोई और?

ऐसे बहुत सारे प्रश्नों का उत्तर बहुत सारे भारतीय अलग- अलग देंगे वो बात अलग है की बहुमत किसका है पर वास्तव में यक्ष प्रश्न ये है की ऐसा क्यों है इतने दिग्भ्रमित क्यों हैं सभी।

उत्तर है ग़लत शिक्षा और ग़लत शासन का परिणाम जो आज हम विभिन्न तरह की बातें करके दिग्भ्रमित हो चुके हैं. सर्वप्रथम हम देश के नाम से आरम्भ करते हैं हमारे देश का सबसे प्राचीन नाम आर्याव्रत है किंतु भारत वर्ष प्राचीन होने के साथ-२ अधिक प्रसिद्द है अतः आज हमारे देश का तर्कसंगत नाम नाम भारत वर्ष है. यूनानियों की वर्णमाला में स का उच्चारण न होने के कारण और सिन्धु नदी की प्रसिद्दी के कारण उन्होंने ही भारत को हिंदूवासी या हिन्दुस्तान नाम दिया. अंग्रेजो ने इसको इंडस वैली बोला और देश को इंडिया बोला. १९४७ में राष्ट्र के विभाजन पर कांग्रेस और पाकिस्तानियों ने भारत को हिन्दुस्तान नाम से प्रसिद्द करने का प्रयास किया और तर्क दिया विभाजन के पश्चात नए देशों के नाम हिन्दुस्तान और पकिस्तान होंगे. अब उनसे ये कोई प्रश्न पूछें कि क्या भारत नया देश है जो इसका नामकरण किया जायेगा. पकिस्तान के सन्दर्भ में ये बात समझ में तो आती है. अतः वास्तव में हमारे देश का नाम न तो इंडिया है और ना हिन्दुस्तान सिर्फ़ और सिर्फ़ भारत वर्ष है. जाति के बारे में बात करें तो हमारी मानव जाति है और हम अपने कर्मो के अनुसार वर्गीकृत हैं. सभ्यता संस्कृति हमारी आर्य या भारतीय है चाहे वो देश के किसी भी कोने का ही क्यों न हो. हमारे आदर्श लूट खसोट मचाने वाले अकबर, ओरंगजेब या कोई अंग्रेज शाशक नही हैं या चालाक स्वार्थी नेता नेहरू, गाँधी नही हैं हमारे आदर्श हमारे भारत के ऋषि, संत, श्रीराम और श्रीकृष्ण जैसे लोग हैं या फ़िर पराक्रमी शिवाजी, महाराणा प्रताप जैसे लोग होने चाहिए. हमारे या सम्पूर्ण मानव जाति के कल्याण हेतु मूल ग्रन्थ वेद हैं जिनसे ही ज्ञान का प्रकाश लेकर अन्य अनेक पुस्तके लिखी गई हैं जैसे सांख्ययोग, योगशास्त्र, न्यायशास्त्र, वैशेषिक दर्शन, गीता, रामायण, महाभारत आदि धर्मं ग्रन्थ. वेद संस्कृत में लिखे गए हैं और संस्कृत से ही समस्त भाषाएँ निकली हैं. संकृत कि लिपि देवनागरी है और सभी भाषाओँ में सबसे अधिक समीप हिन्दी है तो हमारी राष्ट्र भाषा हिन्दी हैं. एक बार कि बात है राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के भुतपूर्व अध्यक्ष रज्जू भइया तमिलनाडु में एक अधिवेशन में भाषण देने गए वहां पर उन्होंने हिन्दी में बोलना प्रारम्भ कर दिया तभी सभा में लगभग सभी ने तिरस्कार करते हुए और शोर मचाते हुए इंग्लिश या तमिल में बोलने के लिए कहा तो रज्जू भइया ने कहा मैं भौतिक शास्त्र का प्राध्यापक हूँ और अंग्रेजी में भी बोल सकता हूँ पर एक बार आप लोग मुझे हिन्दी में बोलने दे उसके बाद अगर आपकी समझ में नही आएगा तो मैं इंग्लिश में अवश्य बोलूँगा इस बात पर सभी राजी हो गए और उन्होंने अपना पूर्ण भाषण हिन्दी में दिया. भाषण के पश्चात लोगो ने कहा क्या ये हिन्दी है इसको तो हम समझ सकते हैं तब रज्जू भइया ने कहा कि तुमने अभी नेहरू जैसे लोगो कि हिन्दी सुनी है जो कि हिन्दी में फारसी शब्दों का अधिकतम प्र्योग करते हैं जिस के कारण आप को हिन्दी समझ ने में समस्या होती है. इस बात से एक बात समझ में आती है कि यदि हिन्दी में संस्कृत के तत्सम शब्दों का ही अधिकतम प्र्योग हो तो देश के अन्य भाषी भी इसको आराम से समझेंगे और बोल पाने में भी समर्थ बनेंगे. धर्मं हमारा सनातन है या वैदिक कहो एक ही बात है. सनातन का अर्थ है जो अनादी काल से चला आ रहा है या इश्वर द्वारा प्र्ध्रत प्राकृतिक हर मनुष्य का होता है जो किसी सीमाओं में या संकीर्णताओं से नही बंधा है जो वेदों के अनुरूप वैज्ञानिक रूपवत चलता है जोकि एक जीवन शैली है और सभी मनुष्य जाति को समान रूप से देखती है. हिंदू नाम यूनान वासियों ने ही दिया था बाद में अरब और अंग्रेजो ने भी हमें हिंदू बोलना प्रारम्भ कर दिया. धीरे -धीरे अब ये ही सब भारतीयों में भी प्रचलित हो गया किंतु ये हमारा वास्तविक धर्मं नाम नही है. पूरे विश्व में बहुत सारे रिलिजन ,मजहब , या बहुत सारे मत हैं जैसे मुस्लिम, क्रिस्चियन, ज्युत्स, पारसी आदि और एक मत सेकुलर भी है जो इन सबका मिलाजुला रूप है जिसमें बहूत सारे हिंदू भी सम्मलित हैं. सेकुलर मत के अनुसार भारत, भारतीयता (हिंदू, सनातन या वैदिक मत) का ही विरोध किया जाता है और हिन्दुओं का सर्वनाश करना ही इसका मुख्य उद्देश्य है. भारत में यह मत बहुत अच्छी तरह से फलफूल रहा है और हमारे दिग्भ्रमित होने का भी सब से बड़ा कारण ये सेकुलर मत ही है. जो जितना बड़ा हिंदू-विरोधी उतना बड़ा सेकुलर. जो बात मैंने यहाँ पर लिखी हैं वो भी सेकुलर्स को मान्य नही हैं. ये लोग तार्किक बातो पर भी विश्वास नही करते हैं. और सभी मतों की जो घटिया बातें हैं उनके पूर्ण समर्थक हैं. जिस दिन हम इन सेकुलरिस्टों के छदम भारत विरोधी नीतियों का पूर्ण सफाया कर देंगे उसी दिन भ्रम का आवरण विच्छेद होकर भारत में विकासोदय का सूर्य आकाश में प्रज्वलित होगा और समस्त विश्व को अपने ज्ञान प्रकाश से आलोकित करके विश्व कल्याण का मार्ग प्रशस्त करेगा.
वंदे मातरम् !!

4 टिप्‍पणियां:

nitin tyagi ने कहा…

सही कहा सौरभ हम ग़लत शिक्षा और ग़लत शासन का परिणाम जो आज हम विभिन्न तरह की बातें करके दिग्भ्रमित हो चुके हैं

CHANDAN BLOG ने कहा…

आर्य और द्रविड़ को अलग-अलग बता कर भारतीयों को दो खेमो में बाँट कर
भारतीयों की शक्ति को कम करने का एक सुनियोजित षड़यंत्र है , ताकि भारतीय
एक न रहे और विदेशी अपनी सत्ता कायम रख सके , आर्य और द्रविण एक थे
यह पहले भी सही था और अब वैज्ञानिक रीति से भी सिद्ध हो गया है, अब यह
कहना की आर्य बाहर से आये है , कमजोर बुद्धि और वास्तविकता से अज्ञानता
का नतीजा है । यह बिलकुल सही है हमारा मूल इतिहास नष्ट कर दिया और जो
बच गया , उसे विकृत कर दिया गया। हमें सही सोच और द्रष्टिकोर्ण अपनाने
की जरुरत है , यदि एसा नहीं किया गया तो भारत को तोड़ने बाले ही सफल
होंगे ।

Vinay Kumar ने कहा…

अल्पज्ञानीयों की कमी नहीं है।

Vinay Kumar ने कहा…

अब भी ऐसे मुर्ख है जो आर्यों को विदेशी मानते है। और भारतीय इतिहास के सिलेवस मे यही पढ़ाया जाता है।