गुरुवार, 12 अप्रैल 2012

ईश्वर निर्गुण है या सगुण ?

काफी समय से मेरी निष्क्रियता और आलस्य के कारण मेरा लेखन कार्य बंद ही पड़ा है पर अभी हाल ही में मेरी एक पोस्ट सांख्य दर्शन पर एक टिप्पणी में एक बेनामी ने प्रश्न पुछा है कि ईश्वर निर्गुण है या सगुण तो मैंने उसको निम्न उत्तर टिप्पणी के माध्यम से ही दिया है और फिर सोचा क्यों न इसको एक लेख में ही प्रकाशित कर देता हूँ ।   
प्रश्न - ईश्वर निर्गुण है या सगुण ?
उत्तर - उपासना २ प्रकार की है – एक सगुण और दूसरी निर्गुण। इनमें से जगत को रचनेवाला, वीर्यवान् तथा शुद्ध, कवि, मनीषी, परिभू और स्वयम्भू इत्यादि गुणों के सहित होने से परमेश्वर सगुण है और अकाय, अव्रण, अस्नाविर इत्यादि गुणों के निषेध होने से वह निर्गुण कहलाता है।
ईश्वर के सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान , शुद्ध , सनातन , न्यायकारी , दयालु, सब में व्यापक, सब का आधार, मंगलमय, सब की उत्पत्ति करनेवाला और सब का स्वामी इत्यादि सत्यगुणों के ज्ञानपूर्वक उपासना करने को सगुणोंपासना कहते हैं और वह परमेश्वर कभी जन्म नहीं लेता , निराकार अर्थात आकारवाला कभी नहीं होता , अकाय अर्थात शरीर कभी नहीं धरता , अव्रण अर्थात जिसमें छिद्र कभी नहीं होता , जो शब्द , स्पर्श , रूप , रस और गन्धवाला कभी नहीं होता , जिसमें दो, तीन आदि संख्या की गणना नहीं बन सकती , जो लम्बा चौड़ा हल्का भारी कभी नहीं होता , इत्यादि गुणों के निवारणपूर्वक उसका स्मरण करने को निर्गुण उपासना कहते हैं।
इससे क्या सिद्ध हुआ कि जो अज्ञानी मनुष्य ईश्वर के देहधारण करने से सगुण और देहत्याग करने से निर्गुण उपासना कहते हैं, यह उनकी कल्पना वेद शास्त्रों के प्रमाणों और विद्वानों के अनुभव से विरुद्ध होने के कारण मान्य नहीं है ।        

18 टिप्‍पणियां:

मदन शर्मा ने कहा…

बहुत सही बताया है आपने .. जगत को रचनेवाला, वीर्यवान् तथा शुद्ध, कवि, मनीषी, परिभू और स्वयम्भू इत्यादि गुणों के सहित होने से परमेश्वर सगुण है और अकाय, अव्रण, अस्नाविर इत्यादि गुणों के निषेध होने से वह निर्गुण कहलाता है। यहाँ निर्गुण का अर्थ सभी दोषों से रहित है

मदन शर्मा ने कहा…

बहुत दिनों के बाद आपका लेख आया .खुशी हुई ..कृपया इसे अनवरत जारी रखिये ,.....

सौरभ आत्रेय ने कहा…

धन्यवाद मदन शर्मा जी प्रोत्साहन के लिये। प्रयास करूंगा।

बेनामी ने कहा…

मूर्ति-पूजा क्यों - क्या इससे ही ईश्वर को पाया जा सकता है?

मेरे विचार में, यह एक धारणा मात्र है, और इसमें कहीं कोई तथ्य नहीं है - कि बिना देखे हम किसी बात में विश्वास नहीं कर सकते। मैं ऐसा नहीं मानता। ऐसा नहीं है कि मैं जिद्दी हूँ, बल्कि इसलिये क्योंकि इस बात पर मैंने विचार करके देखा है। यजुर्वेद के 32 अध्याय में इस प्रकार की बात लिखी है कि परम ईश्वर या परमात्मा की न तो कोई प्रतिमा है और न ही कोई दुनियावी स्वरूप (सांसारिक रूप जिसे देखा जा सके)। उसे कोई भी अपनी शारीरिक आँखों से नहीं देख सकता। उसका नाम ही इतना ऊँचा तथा शक्तिशाली है उसे पुकारना भर ही काफी है, तौभी हममें से कितने ही उसे देखने की लालसा रखते हैं, और जब नहीं देख पाते तो अपनी कल्पना से उसके सांसारिक रूप की एक रचना कर लेते हैं। वो तो सब जगह विद्यमान है।

मैं इस बात को नहीं मानता कि हमें किसी भी बात में विश्वास करने के लिये उसे देखना ज़रूरी है। मेरी उम्र 32 वर्ष है, और मैं पूछना चाहता हूँ (जो मेरी उम्र के हैं - या बड़े भी), हम में से कितनों ने महात्मा गांधी और अब्राहम लिंकन के अस्तित्व पर अविश्वास किया है। मेरे ख्याल से किसी ने भी नहीं। हमने उनमें से किसी को नहीं देखा, परंतु हम बड़ी आसानी से मानते हैं कि वे मौजूद थे। हम हवा को नहीं देखते पर मान लेते हैं कि हवा है। हमने तार में बहती बिजली को कभी नहीं देखा परंतु नंगे तार पर हम हाथ नहीं रखते, क्योंकि हमने उसके प्रभाव को देखा है - हम जानते हैं कि पंखा चलता है, टीवी चलता है, बल्ब जलता है इसका मतलब बिजली है। तो जब ऋतुएं बदलती है, सूरज और समस्त ग्रह अपने नियत समय में अपने नियत मार्गों में चलते हैं, जब एक औरत के गर्भ में बच्चा बढ़ता जाता है, जब समुद्र की सीमायें बंधी रहती हैं और उसका पानी शहर की सीमाओं में नहीं घुसता, हम सांस लेते हैं, हमारे दिल की धड़कनें निरंतर चलती रहती हैं, क्या ये काम हमें यह बताने के लिये काफी नहीं है कि इस सबके पीछे एक शक्तिशाली तथा बुद्धीमान ईश्वर है। हमें और क्या देखने की ज़रूरत है?

हम जो भी करते हैं, विश्वास के द्वारा ही करते है। हम बहुत से (या ज्यादातर) काम विश्वास से ही करते हैं। हम कुर्सी पर पूरा वज़न डाल के बेठते हैं तब यह विश्वास हमारे मन में होता है कि यह कुर्सी हमारा वज़न संभाल सकती है, टूटेगी नहीं। यदि ऐसा न होता (जिस कुर्सी पर आपको भरोसा नहीं होता) तो आप कैसे उस कुर्सी पर बेठते? जब हम गाड़ी चलाते हैं तो वो भी हम विश्वास से करते हैं। ट्रैफिक सिग्नल पर हरी बत्ती होते ही हम चल पड़ते हैं क्योंकि हमें विश्वास होता है कि दूसरी तरफ लाल बत्ती है और वहाँ से कोई नहीं आयेगा। यदि ऐसा न होता तो क्या हम गाड़ी चला पाते?...............

बेनामी ने कहा…

मेरे कहने का तात्पर्य बस इतना ही है कि जब हम जीवन की सभी बातें जैसे बैंक में पैसा जमा करना, गैस जलाकर खाना बनाना, लिफ्ट में बैठकर ऊपर जाना, ट्रेन में बैठकर नियत जगह के लिये यात्रा करना, फोन पर बात करना इत्यादि सभी बातें विश्वास से ही करते हैं। यदि हम विश्वास न करें तो यह सब संभव नहीं है, इसी प्रकार ईश्वर में विश्वास करने के लिये विश्वास ही ज़रूरी है, देखना नहीं।

कुछ लोग ईश्वर को नहीं मानते और कहते हैं कि किसने ईश्वर को देखा है, ऐसा कोई परमसत्य नहीं है, हम जो सही करते हैं वो ही सही है, उसी से ईश्वर को पाया जा सकता है, इत्यादि। ऐसे कई सवालों के जवाब मैं भविष्य में देने की कोशिश करूँगा, परंतु यहाँ छोटे शब्दों में मैं इतना कहना चाहता हूँ, कि यदि ट्रेफिक सिग्नल पर खड़े हुए हम वो ही करने लगें जो हमें ठीक लगता है तो सोचिये यातायात का क्या हाल होगा। जिसे जल्दी है वो जल्दी जायेगा और हमें कुछ पता नहीं चलेगा कि कब हमें चलना चाहिये ताकि कोई हमें टक्कर न मार दे। इस बात के लिये तो हम एक ऐसे नियम को चाहते हैं जिसे सभी पालन करें ताकि सब कुछ सुचारू रूप से चले, तो फिर ईश्वर के बारे में ऐसा करने के लिये हिचक क्यों?

हमें परमात्मा के एक ही नियम की आवश्यकता है। उसका प्रेम का नियम, जिसके कारण उसने मानव रूप में अवतार लिया ताकि हमें हमारे पापों से छुड़ा ले। पवित्र शास्त्र में लिखा है कि परमेश्वर ने सारे जगत से (किसी जाति अथवा धर्म विशेष से नहीं)ऐसा प्रेम रखा कि अपना इकलौता पुत्र (यीशु मसीह) दे दिया ताकि जो कोई (फिर से कोई बंधन नहीं है)उस पर विश्वास करे वो नाश (नर्क) न हो परंतु अनंत जीवन (स्वर्ग) पाये। जैसा मैंने बचपन से सीखा था और हममें से कई अब भी विश्वास करते हैं कि यदि ईश्वर धर्मियों को बचाने और पापियों का नाश करने आता है तो हमारा तो नाश ही हो जाता क्योंकि कोई भी धर्मी नहीं है (सबने पाप किया है और परमेश्वर की महिमा से रहित हैं), इसलिये परमेश्वर ने धर्मियों को बचाने के लिये नहीं अपितु उनसे प्रेम कर उन्हें बचाने के लिये अपने पुत्र को इस दुनिया में भेजा ताकि वो हमारे पापों का निवारण करे। ऐसा करने के लिये प्रभु यीशु ने हमें मिलने वाली सारी कोड़ो की सज़ा को अपने ऊपर ले लिया और अपना जीवन तक न्योछावर कर दिया। परंतु फिर वो तीसरे दिन जी उठे (क्योंकि ईश्वर को कोई नहीं मार सकता - मृत्यु उन पर बंधन नहीं रख सकती)और जीवित स्वर्ग में उठा लिये गये और अब वो जीवित ईश्वर हमारी सुधि लेता है और हमारी प्रार्थनाओं को सुनता है।..............

बेनामी ने कहा…

उस निराकार ईश्वर के प्रेम व उसके (अपने पुत्र-स्वरूप) बलिदान पर विश्वास करें, ताकि हमारा मानवीय जीवन (जैसा अस्तव्यस्त है) बदल जाये और हमारी आत्मिक ज़रूरतें पूरी हों और हमारा जीवन सुचारू रूप से चले। यह जीवन कोई 60-80 या 100 साल का नहीं है अपितु शाश्वत जीवन है क्योंकि आत्मा नहीं मरती और
वो या तो नर्क में रहती है जहाँ तड़पन है, अशांति है आदि अथवा मोक्ष प्राप्ति कर स्वर्ग में निवास करती है। यह जीवन यहीं से शुरू होता है और इसका निर्णय आपके हाथों में है। अपने पापों का निवारण स्वयं आपके हाथों में है। पापों से मुक्ति मिलने के बाद ही सुख, शांति, पाप-क्षमा, आनंद, सफलता, आशा, प्रेम, तथा ईश्वर-कृपा से भरा आपका हो सकता है।

जल्द ही इस बारे में मैं और लिखूंगा, कि उद्धार (मोक्ष) क्या होता है और कैसे मिल सकता है। बस अभी इतना ही, कि अपने देखने और विश्वास करने के मोह से निकलकर उस निराकार ईश्वर को पुकारना शुरू करें, उसको अपने जीवन में आमंत्रित करें, वो ज़रूर ही आपके पास आयेगा। परम-ईश्वर आपसे प्रेम करता है।

सौरभ आत्रेय ने कहा…

बेनामी जी अभी – २ आपकी टिप्पणियां पढ़ी – देखते ही पता लगता है आपको मेरे लेख से कोई लेना –देना नहीं है आप केवल मिशनरी एजेंट हैं जो बाइबल के अनुसार परमेश्वर के एजेन्ट के रूप में यीशु के प्रचार में कार्यरत हैं। मेरी समझ में यह नहीं आता तुम लोगो को यह सब करने से मिलता क्या है – क्यों तुम्हें परमेश्वर तक पहुँचने में एक एजेन्ट की आवश्यकता होती है। यह कैसा बाइबल का ईश्वर हुआ जो कहता है मेरे से पहले मेरे एजेन्ट पर विश्वास लाओ उसके पीछे चलो तभी मैं तुम्हारा भला करूँगा। बताओ तुम्हारे अनुसार तो ईश्वर भी धंधे वालो की तरह बात करता है। कृपया करके यह ज्ञान तुम अपने मुर्ख अन्धविश्वासी लोगो में ही दिया करो क्योंकि हम प्रमाणित बात पर ही विश्वास करते हैं अप्रमाणित या अतार्किक बातों पर नहीं। जो थोड़ी बात इसमें तुमने अच्छी लिखी हैं उन सबकी आड में तुम लोगो का एक ही उद्देश्य प्रत्यक्ष ही दीखता है – यीशु का प्रचार है – जैसे यीशु तुम्हारे काल्पनिक तथाकथित स्वर्ग द्वार पर बैठा हुआ टिकट बांटता हो - यदि यीशु से टिकट नहीं लिया तो स्वर्ग द्वार नहीं खुलेगा – मुक्ति नहीं मिलेगी। ऐसी ही समस्या मुस्लिम लोगो की है के यदि ईश्वर को प्राप्त करना है तो पहले उसके एजेन्ट रसूल पर विश्वास लाओ अन्यथा ईश्वर तुम से क्रोधित हो जावेगा। कितनी वाहियात और बकवास भरी बात है ये कि ईश्वर के लिए भी लोग अपने -२ एजेंट्स की मार्केटिंग कर रहे है, करोड़ो- अरबो रूपया बहाया जा रहा है। कृपया करके आप इस ब्लॉग पर ना आयें और यदि आयें भी तो अपनी पहचान के साथ आयें. एक-एक बात पर तार्किकता और प्रमाणिकता के साथ मैं आपसे वाद करने के लिए तैयार हूँ यदि आप सिद्धांत-विरुद्ध और वितण्डा न करें तो क्योंकि तर्कपूर्ण तथ्य-परक बातें करने से ही सत्य निकल कर आता है अन्यथा समय-व्यर्थ ही करना है. पहले मेरे १ प्रश्न का सीधे-२ संक्षिप्त में उत्तर दें लंबी-२ टिप्पणियों से बातों को गोल-गोल घुमाने की आवश्यकता नहीं है.

ईश्वर क्या है, यीशु क्या है और यीशु को प्रचार करके पुजवाने की क्यों आवश्यकता है?

सौरभ आत्रेय ने कहा…

24 मई 2012 1:37 pm Manoj kumar ने कहा…
Ek tatwa may do vipreet gurw kaesay ho sakatay hai ?

सौरभ आत्रेय ने कहा…
@Manoj Kumar यहां एक तत्व में कुछ गुणों के सहित होने से सगुण और कुछ के निषेध होने से उसे निर्गुण कहा गया है। एक तत्व में विपरीत गुणंो का समावेश नहीं किया गया है जरा ध्यान दीजिये। उदाहरण - जल के प्राकृतिक गुण शीतलता और तरलता है तोकह सकते हैं जल में शीतलता और तरलता सगुण है या जल में ऊष्णता और ठोसता निर्गुण है। इस उदाहरण में आप समझ सकते हैं एक तत्व जल में विपरीतगुणों का समावेशनहीं किया गया है वरन् कुछ गुणों के समावेश के कारण उसे सगुण और कुछ गुणों के निषेध के कारण निर्गुण कहा गया है। इसी प्रकार आप शास्त्रो में ईश्वर के सगुण और निर्गुण कहे जाने का वास्तविक सन्दर्भ समझिये और जानिये।

KAMAL BAROT ने कहा…

mr,,saurabh...i m from gujarat....i read your blog it is nice but not
real,,,,if you whant know real god[bhagwan] you read ''swaminarayan vchanamrut'' book in hindi verzan......my mail id is ''kamalbarot9090@gmail.com''

KAMAL BAROT ने कहा…

you want this book ,,,,send mail me,,,,,ok,,,,jay schidanand/

सौरभ आत्रेय ने कहा…

Kamal Barot जी I could not getyou what do you mean it's not real - could you please explain little bit. Anyway I would definately prefer to read yor reffered book. I'm gonna send you an email on your given id please reply with this book. Thanks.

तुषार राज रस्तोगी ने कहा…

आपको यह बताते हुए हर्ष हो रहा है के आपकी यह विशेष रचना को आदर प्रदान करने हेतु हमने इसे आज ( २३ जून, २०१३, रविवार ) के ब्लॉग बुलेटिन - छह नीतियां पर स्थान दिया है | बहुत बहुत बधाई |

Madan Mohan Saxena ने कहा…

उत्क्रुस्त

सौरभ आत्रेय ने कहा…

तुषार जी धन्यवाद

बेनामी ने कहा…

Yeh swaminarayan vaale muze, mere ghar pe aa ke kehte hain ki..... "yeh kya shiv aur avtaaro ityadi ki pooja karte ho. Swaminarayan ko pakdo...baaki sab jhooth/vyarth hai. Ek swaminarayan hi sach hai."
Bolo! Aise-aise swaminaraniye hain..islamio se bhi badh ke. Yeh log kal jihad chalu kar de...itna hi baaki hai.!

बेनामी ने कहा…

Mai shaiv hu... Shiv mere isht-dev hain. ismein problem kya hai? Mai ne shiv ko chhodne ki kya zarurat hai? Is tarah se koi baat bhi kaise kar sakta hai? Aur ye (swaminarayaniye... adhoore bhakt)log muze vaishnav banaanaa chaahte hain...vo bhi aise..jaise mai ne abhi 10 minute pehle ki meri tippani mien likha tha. (Is se pehle vaali tippani dekhein). Andhon ki faujein chaaron-tarf ...sabhi dishaaon mein hain...

बेनामी ने कहा…

Bhai, mere computer mein 9:20 PM minute ho rahe hain. Abhi ek minute pehle yani 9:19 PM ko mai ne last tippani kari. Us tippani ke neeche...time 8:49 AM dikh raha hai. Aisa kaise? Aur mai ne ho toh yadi umeri tippani radd karni ho ya usmein sudhaar karnaaa ho, uske liye koi bandobast nahin hai. Aise mein yahaan dusri baar koi...kyon tippani karega? Lilhega? kya blog chala rahe ho! Kyon bhadaas nikaal rahe ho? Chale aate hain...blog chalaane... Banaane..! Haan..aur ab 9:31 PM baj rahe hain. Ab dekhte hain ki is tippani ke neeche kaunsa samay dikhata hai tumhara setting. Aap swarg mein ho... kya? Yeh meri tisri tippani hai... abhi 20 minute mein.

बेनामी ने कहा…

likhte achha hain. Yeh aur dusri items..aap aksharshah...souces se. Mai bhi bahut padhta hu...aur meri memory powerful hai...So jaan jaataa hu.. Achha hai...achha hai. Chaalu rakkho. Vaise...aap chaaho toh kaafi saari links de du? yahaan? dekhte baitthna... masala bahut...milega...REALITY SHOW. Lekin talwaar--bna moorkho ka kaam hai. Bhagwan Shree krishna ne yeh nahin kaha ki... "mai hinduo ko bachaunga". Unhone kaha ki: "devo durbal ghaatakah" arthaat: survival of the fittest. Yahi satya hai..aur "satyamevajayate" ka yahi arth hai.Yehi stya hai. Itna saaf-saaf kaha hai. Arjun ko bhi yeh yeh nahin kaha ki "mai tuze bachaaunga" ya...tu mere naam ke manjeere bajaa 24x7--tera uddhaaar karunga...vaikunth/swarg dunga..Tuze jitaaunga". Aisa nahin kaha. Arjun se kaha ki tu jo+jaisa karega vo+vaisa hi bharega. Tu dusryodhan ko nahin maarega toh vo tuze maar dega. Mai kuchh nahin karunga...kyoki muze hi yadi sab kuchh karna hai toh muze teri zarurat kya hi? yu tere liye aur dharm ke liye kar...mere liye nahin. "Tasmaad...Hato va praapsyasi ...." ityadi.Tu sachha hai ...achha hai..tu ne kisko takleef nahin di...tu ne keval sahaay kari...dusron ki bhalaai kari...isliye teri jeet hogi / sachhai ki jeet hogi..aisa kuchh nahin hai. Gaay ko kabhi bhi sinh par vijay karte huey dekha hi tu ne? Nahin na? Yahi meri shrishti hai. Toh tu teri nirbalta nikaal de. "ajaa-putram balirdyaatah..." (Sanskrit mein 'ajaa' yani bakri/bakra jo nirbal hota hai..ahimsak-shaanti-priya..aur uska putra us sebhi nirbal hota hai. Vah nirbalta tu nikaal de aur yuddh ke nishchay kar. Varna..."tu apni xy z-vaa". draupadi ka ho gaya aur ab baaki tera sab lutega... aur logo par duaryodhan jaiso ka/se raakshas-raj chalega. So tera dharm hai us se sabko bachaanaa..yani "dharmo-rakshati-rakshitah". Varna.. "thakur toh giyo"! (karan-arjun film...lol). Tere jaise yahaan bahut aaye aur bahut gaye. Yahaan sab "mritak" hain. Tu kis khet ki mooli hai? So..."yuddhaay kritnishcayah". Aur... "na shatru shesh"...arthaat: shatru ka naamo-nishaan mitaa dena. Iske liye "par-aakram" (anyo par...dushto par aakraman) karna. Yani offence. Pro-active action. Apni XY..Z daale koi..tab tak raah dekhte baitthneka? aur fir bhi mere naam ki mala ferega tu? Geeta paddhne ke liye nahin...yuddh karne ke liye boli hai mai ne. "Klaibya" chhod ke gaandiv uttha. Tension lene ka nahin. Nahin toh teri xy z-vaa. Islam aur secularism par aakraman nahin karenge...sab prakaar se...tab tak, sab bhadvagiri hai. Bhadvon ka jootha bakwaas hai. Yahi hai "satya" aur isi satya ki jeet hoti hai. Yahi arth hai "satyamevajayate" ka. Baaki...teri marzi...