मंगलवार, 24 फ़रवरी 2009

क्या वैदिक धर्म में विभिन्न मत हैं?

कुछ लोग विद्वान होते हुए भी अविद्वता की बात करते हैं तो बड़ा अजीब लगता है जैसे उदाहरण के तौर पर मैंने पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य(शांतिकुंज हरिद्वार वाले)की व्याखित की हुई सांख्य योग, योग शास्त्र, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा एवं वेदांत दर्शन पढ़ी। पुस्तकों की भूमिका में और कहीं-कहीं मध्य में भी श्रीराम शर्मा आचार्य ने ये भरपूर प्रयास किया है की ये पुस्तकें विपरीतार्थक दर्शन हैं जबकि पढने के पश्चात् एक मेरा जैसा आम मनुष्य भी शुद्ध रूप से कह सकता है ये दर्शन तो वेदों के ही पृथक-पृथक विषयों का अध्यन कराते हैं या कह सकते हैं वेद के ज्ञान को ही व्याखित करते हैं और कहीं से कहीं तक भी एक दूसरे का विरोध नही करते और शब्द प्रमाण अर्थात वेद ऋचाओं को सर्वोपरि मानते हैं फ़िर जबरदस्ती ये ऐसा आरोप लगाने का प्रयास क्यों कर रहे हैं। श्रीराम आचार्य ने अनुवाद और व्याखा उत्तम गुणवत्ता की है किंतु हल्का सा आभास होता है कहीं-कहीं व्याखा अनुवाद से भिन्न नज़र आती है। वैसे निश्चित तौर पर वो अपने इन अनुवादित एवं व्याखित कि हुई पुस्तकों से निर्विवाद विद्वान नज़र आते हैं किन्तु वो इश्वर, आत्मा और प्रकृति के नवीन सिद्धांत एकात्मवाद पर बल देते नज़र आते हैं और साथ में पुराणियो की मूर्तिपूजा और अवतारवाद को समर्थन भी प्रदान करते हैं। मतलब की वो किसी का विरोधी नहीं होना पसंद करते हैं चाहे थोडा सा असत्य क्यों न अपनाना पड़े। उनकी यह मान्यता उनके द्वारा इन व्याखित की हुई पुस्तकों में भी झलकती है। वैसे ये असत्य के विरोधी न होने की मानसिकता आत्मविरोधी के साथ-साथ आत्मघाती भी होती है इसलिए मनुष्य को सर्वदा सत्य का साथ देना चाहिए चाहे कोई बुरा माने या भला माने और इस से साम्प्रदायिक लोगो को बल भी मिलता है और उन जैसे विद्वान पुरुषों को शोभा भी नहीं देता है। मेरे अध्यन के हिसाब से और प्रत्यक्ष प्रमाणित भी है कि संक्षिप्त रूप में महर्षि कपिल द्वारा रचित सांख्य योग प्रकृति के तत्वों की संख्यात्मक विवेचना करता है मतलब की ये जगत किन तत्वों से मिलकर क्यों और कैसे बना है और प्रकृति अपना कार्य किस प्रकार इश्वर से प्रेरित होके करती है,महर्षि पतंजलि का योग शास्त्र इश्वर प्राप्ति या आत्म ज्ञान की क्रियात्मक विवेचना करता है मतलब की सभी ग्रंथो की वास्तविक सार्थकता तभी है जब योग शास्त्र के अनुसार मनुष्य व्यवहार करता हुआ ध्यान, समाधि द्वारा अपने जीवन में क्रियान्वित करे और तभी उसको जीवात्मा, प्रकृति और इश्वर का भेदज्ञान होकर इश्वर सानिध्य प्राप्त आनंद होगा, महर्षि अक्षपाद गौतम का न्याय सत्य-असत्य का कैसे निर्णय हो और प्रमाणों को भी प्रमाणित करते हुए न्याय की विवेचना करता है मतलब की सभी शास्त्रों की प्रमाणिकता किस आधार पर हो उसको बताता है, महर्षि कणाद का वैशेषिक प्रकृति की वास्तविक स्वरूपता की विवेचना करता है मतलब की प्रकृति अपने मूल स्वरुप में कैसी होती है किस तरह से परमाणु सयुंक्त हो कर नवतत्वों का सृजन करते हैं, महर्षि जैमिनी का मीमांसा मनुष्य के कर्म-कांड यज्ञ आदि कर्मो की विवेचना करता है और महर्षि बादरायण कृत वेदांत आत्म ज्ञान और इश्वर उपासना को समझाता है। वेदांत के साथ-साथ बाकि सभी ग्रन्थ इश्वर,आत्मा और प्रकृति ३ नित्य तत्वों को स्वीकारते हैं और इन सभी की रचना इन ३ तत्वों के भेदों, स्वरूपों का वर्णन करने के लिए ही ऋषियों द्वारा मनुष्य कल्याण के लिए ही की है।

बहुत से लोग इस बात को कहते मिल जायेंगे की वैदिक हिन्दू धर्म शास्त्रों की बातें आपस में विरोधी हैं। कुछ लोग यहाँ तक कहते मिल जायेंगे की वेदों की बहुत सी ऋचाएं एक-दुसरे की विरोधी हैं। मैंने वेद तो नहीं पढ़े हैं किन्तु किसी भी आप्त पुरुषों द्वारा ऐसा कहते नहीं सुना। ऐसा कहने वालो में अधिकतर तो वो हैं जिन्होंने इन ग्रंथो का एक अक्षर भी नहीं पढ़ा और कुछ ऐसे भी हैं जिन्होंने आधे-अधूरे ज्ञान वालो की या अंग्रेजी लेखको की पुस्तकों को पढ़ कर निर्णय लिया है। कुछ विद्वान वैदिक हिन्दू दर्शन को षड्-दर्शन की संज्ञा देते हैं और वो इसको सांख्य योग, योग शास्त्र, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा एवं वेदांत दर्शन पुस्तकों के आधार पर बोलते हैं की ये पुस्तकें पृथक -पृथक दर्शन हैं और इनको अलग अलग मतों में विभाजित कर देते हैं जैसे सांख्यवादी, न्यायिक, वैशेषिक, मिमांसिक, वेदांत मान्यता वाले आदि नामो से संबोधित करते हैं। यदि इसको सत्य की कसौटी पर रखा जाये तो ये निरी मुर्खता के अलावा कुछ भी नहीं है। जैसे प्राणी विज्ञान के २ भाग हैं जीव विज्ञान और वनस्पति विज्ञान तो क्या हम ये कहेंगे जीव विज्ञान और वनस्पति विज्ञान एक दूसरे के विरोधी विषय हैं और या फिर क्या हम ये कहते हैं भौतिक शास्त्र रसायन शास्त्र का विरोधी है उसी प्रकार से ये ६ पुस्तकें वेदों पर आधारित ६ विषय को वर्णित करती हैं और कोई भी इनको एक दूसरे का विरोधी नहीं कह सकता है और यदि कहता है तो ये अविद्वता कि बात लगती है। मेरी समझ में ये नहीं आता हिन्दू हर स्तर पर विभाजित है यहाँ तक की अपने धर्म-शास्त्रों के बारे में भी। मुझे ये स्वार्थी विद्वानों, चालक और धूर्त लोगो के कारण ऐसा होता दिखाई देता है। हर कोई अपनी विद्वता को सिद्ध करने के लिए कुछ भी करने को तैयार है और यहाँ तक की उन आप्त-पुरुषों, ब्रह्म-वेत्ताओं अथवा मुक्त-पुरुषों महर्षियों की बातों को अपने छल और कुतर्को से बलपूर्वक काटने का प्रयास करते हैं या अपनी बातो को उनका बताने का मिथ्या प्रचार करते हैं।इनको पढने के लिए अध्यात्म में सत्य के अन्वेषण में गहरी रूचि होनी चाहिए ये ६ ग्रन्थ पढ़ कर आप की जीवनद्रष्टि ही बदल जायेगी और यदि आप सत्य के समर्थक हैं आप की धर्म के बारे में धारणा ही बदल जायेगी और ये भी अंतर कर पाओगे की वैदिक हिन्दू धर्म विज्ञान सम्मत सनातन धर्म है न की कोई मजहब या रिलिजन। इनको पढ़ कर वास्तव में ये एहसास होता है की कितने ही सारे आज के वैज्ञानिक सिद्दांत इन पुस्तकों में और भी व्यापक रूप से हैं मतलब की देखा जाये तो आज के वैज्ञानिको ने ऐसे कुछ नए सिद्दांत नहीं खोजें है वो तो पहले से ही वैदिक शास्त्रों में उस से भी अधिक व्यापक रूप में लिखित है। शायद मेरी बात साम्प्रदायिक लोगो की संकीर्ण बुद्दी से समझ नहीं आएगी जो वैदिक धर्म को मजहब,टोटकेधारियों,रिलिजन आदि की द्रष्टि से देखते हैं। मैं केवल इतना कह सकता हूँ कि मनुष्य स्वयम अध्यन करके सत्य-असत्य का निष्पक्ष रूप से निर्णय कर सकता है।

सोमवार, 26 जनवरी 2009

आवश्यकता है अभी एक ओर स्वतंत्रता संग्राम की

सम्पूर्ण विश्व ने सदियों से भारत पर आक्रमण किए हैं किंतु मुख्यतः मुग़ल और ब्रिटिश लोगो को ही अधिक सफलता मिली है। मुग़ल और ब्रिटिश लोग भी इस राष्ट्र पर कभी पुर्णतः राज नही कर सके।भारत जब गुलाम नही था जब यहाँ मुग़ल और ब्रिटिश आए क्युकी उस समय देश में किसी न किसी जगह क्रांति चलती ही रहती थी और यहाँ के लोगो ने प्राण गवाएं पर कभी मन से दासता स्वीकार नही की किंतु आज देश के एक बड़े वर्ग ने पराधीनता और गुलामी स्वीकार ली है और अब उनका उद्देश्य पूरे राष्ट्र को पराधीन बनाने का है और इस कार्य को बड़ी कुशलता के साथ क्रियान्वित कर रहे हैं। उन्होंने चारो तरफ़ ऐसा जाल बिछाया है की इसको हर कोई आराम से समझ भी नही पाता एक ऐसा माहौल बना दिया है की किसी भी भारतवासी में आत्मसम्मान या आत्मविश्वास जाग्रत न हो जाए और अपने को हीन भावना से ही ग्रस्त समझे। वर्तमान में पूरे विश्व में ये अकेला देश ऐसा है जिसको अपनी भाषा में लिखते-बोलते-पढ़ते शर्म आती है जो अमेरिका और ब्रिटेन की नौकरी करना पसंद करता है या सिर्फ़ एक उपनिवेश बन कर रहना चाहता है। यहाँ के उधोगपति, नौकरीपेशा या थोड़ा सा भी संपन्न व्यक्ति इंग्लिश बोलता है या बोलने का प्रयास करता दिखाई देता है और बड़ा ही गर्व महसूस करता है। मैं किसी भाषा के विरुद्ध नही हूँ और मैं भी फिलहाल इंग्लिश भाषी देश में कार्यरत हूँ किंतु इंग्लिश बोलने पर गर्व नही करता क्युकी मैं इसको एक साधारण भाषा से अधिक कुछ नहीं समझता जैसा की चाइना , जापान, रसिया, फ्रांस, स्पेन आदि के लोग समझते हैं। मेरा यह मानना है और यह प्रत्यक्ष भी है की भाषा, ज्ञान का पर्यावाची नही होती और कोई राष्ट्र अपनी भाषा में ही तरक्की कर सकता है अन्यथा उसकी तरक्की कुछ सीमित लोगो तक ही सीमित रहती है। जापान, यु. एस., चाइना इस बात के ज्वलंत उदाहरण है कि अपने स्वाभिमान और आत्मविश्वास से ही तरक्की होती है न कि किसी की नक़ल से।भारतियों में ये प्रचार बहुत है कि कंप्यूटर पर हिन्दी में कार्य करना सम्भव नहीं है इसके लिए हँसी के टेक्निकल शब्द बनाकर बहुत मजे लिए जाते हैं। ये तो गुलामी कि मानसिकता की पराकाष्ठा है। चाइना कि मैंडरिन भाषा में ३०० से अधिक अक्षर हैं और वो अपना समस्त कार्य इसी में करते हैं और ऐसा ही जापान, रसिया, फ्रांस आदि के लोग करते हैं। जापान आदि कई देशो में प्रोग्रामिंग भी जापानीज़ आदि में होती है। नयी खोज के साथ भाषा में नए शब्दों का भी निर्माण होता है। किंतु हिन्दी में ऊटपटांग शब्द बना कर कुछ भारतीय हँसते हैं और गुलामी कि चरम सीमा पर पहुच जातें हैं।

कुछ लोग आई. टी. और सोफ्टवेअर में भारत की कामयाबी को ही पूर्ण राष्ट्र कि तरक्की मानते हैं। क्या यह देश केवल सोफ्टवेअर और आई टी इंजिनीयर्स का ही है बाकी जनता को देश निकाले कि सजा देनी चाहिए। क्या केवल एक क्षेत्र में तरक्की करके इतने विशाल देश का भरण-पोषण हो सकता है। एक अनुमान के अनुससार २०२० तक भारत में १५ करोड़ से भी अधिक बेरोजगार हो जायेंगे और अब भी कितने ही करोडो लोग भूखे-नंगो का नर्कीय जीवन जीने पर मजबूर हैं।ये कैसी तरक्की कि है भारत ने १९९७ से करीब १ लाख ८२ हजार ९३६ किसान आत्महत्या कर चुके हैं, जबकि सरकार अमेरिका कि नक़ल से बेलआउट में मस्त है।२००७ के दौरान १६६३२ किसानों ने आत्महत्या कर ली। इनमें सर्वाधिक किसान महाराष्ट्र से हैं। गांव-देहात में मौत का धारावाहिक तांडव जस का तस जारी है। दिन-प्रतिदिन बेरोजगारी बढती जा रही है और भारत के इंजिनियर अमेरिका और ब्रिटेन के लिए काम करके बहुत प्रसन्न हो रहे हैं कि देश तरक्की कर रहा है। यदि वर्तमान में देश कि समस्याओं पर एक पुस्तक लिखी जाए तो कम से कम १०००० पृष्ठ तो आराम से लिखे जा सकते हैं। जो भारत का शहरी धनाड्य और संपन्न वर्ग है उसको केवल अपनी तरक्की ही सारे देश कि तरक्की नज़र आती है किंतु कटु सत्य यह है मुश्किल से २-३ करोड़ लोग ही संपन्न हैं और अधिक से अधिक ५ करोड़ हैं और ये ही लोग ओर अधिक संपन्न होते जा रहे हैं और ये ही लोग देश पर राज भी कर रहे हैं और बाकी जनता को लच्छेदार बातो में उलझा के उनका शोषण कर रहे हैं।ऊपर से सेकुलर्स खुलेआम प्रत्यक्ष आतंकवादियों को समर्थन देते हैं और शान्ति का राग अलाप करके जनता के विद्रोह या क्रांति को शांत करने में लगे रहते हैं । मजे कि बात देखो जनता का बेवकूफ उसी के सामने बनाया जा रहा है और जनता जातियों और गुटों में विभाजित होकर अपना बलात्कार करा रही है और जरा सी लज्जा भी नही है। अब राष्ट्रभक्ति का भी वो सम्मान नहीं है ओर लोग स्वतंत्रता को Happy Republic Day या Happy Independence Day कह कर अपना कर्तव्य पूर्ण करते हैं। यदि लोग ये समझते हैं की १९४७ में देश स्वतंत्र हुआ था तो वो एक बहुत बड़े भुलावे में हैं गौर से इतिहास को पलट कर देखो ओर जिनके हाथो में वो सत्ता आई थी उनका व्यक्तित्व देखो तो पाओगे वह एक सत्ता का स्थानांतरण था जो की कुछ अंग्रेजो से हट कर दूसरे अंग्रेजो के हाथ में आ गई थी। उन्होंने उस समय न तो अंग्रेजो के कानून को बदला न ही अपनी शिक्षा पद्धति लागू की, न ही ग़लत इतिहास को बदलने का प्रयास किया और न ही देश को एक सूत्र में बांधने का प्रयास किया वरन् देश को अंग्रेजो की नीति पर ही मुस्लिम तुष्टिकरण, भाषा, जाति आदि के नाम पर इसको खंड-बंड कर दिया। ये कैसी स्वतंत्रता है भाई मेरी समझ से परे है। इन्होने देश को मानसिक गुलाम बना दिया ओर उसीका परिणाम है आज जनता ने स्वयम ही देश की सत्ता एक विदेशी महिला के चरणों में अर्पित करदी अब केवल उसका मन्दिर बनाना ही बाकी है।

हमें राष्ट्र और राष्ट्रवाद को जानना चाहिए यजुर्वेद के अनुसार

आ ब्रह्मन ब्राहमणों ब्रह्मवर्चसी जायतामा राष्ट्रे राजन्यः शूरअइषव्योअतिव्यधि महारथो जायतां दोग्ध्री धेनुर्वोधानडवानाशुः सप्तिः पुरन्धिर्योषा जिष्णू रतेष्ठा सभेयो युवास्या यजमानस्य वीरो जायतां, निकामे निकामे नः पर्जन्यो वर्षतु फलवत्यो नअओषधयः पच्यन्तां योगक्षेमो नः कल्पताम्।।

इस सूक्त के अनुसार जन समूह, जो एक सुनिश्चित भूमिखंड में रहता है, संसार में व्याप्त और इसको चलने वाले परमात्मा अथवा प्रकृति के अस्तित्व को स्वीकारता है, जो बुद्धि या ज्ञान को प्राथमिकता देता है और विद्वजनों का आदर करता है, और जिसके पास अपने देश को बाहरी आक्रमण और आन्तरिक, प्राकृतिक आपत्तियों से बचाने और सभी के योगक्षेम की क्षमता हो, वह एक राष्ट्र है।

अंग्रेजी भाषा के ऑक्सफोर्ड शब्दकोष में नेशन शब्द का अर्थ बताया गया है - 'वह विशिष्ट जाति अथवा जन समूह जिसका उदगम, भाषा, इतिहास अथवा राजनीतिक संस्थाएं समान हों ।'

वैसे पश्चिम में नेशन को और अलग-अलग तरीको से भी परिभाषित किया गया है। आज का संसार नेशन-स्टेट्स में विभाजित है। आप देख सकते हैं भारत की राष्ट्र की परिभाषा और पश्चिम में कितना अन्तर है। यह भी एक पूर्ण विषय है जिस पर पूरी पुस्तक लिखी जा सकती है। मेरा यहाँ पर तात्पर्य ये है की भारत एक राष्ट्र है और उसकी आत्मा वहां की संस्कृति और लोगो की वो भावना है जो उनको एक राष्ट्र के लिए समर्पित करती है । किंतु आज न केवल इसके राष्ट्र होने में संदेह किया जाता है वरन इसकी आत्मा हिंदू समाज को आतंकवादी, अत्याचारी जैसे शब्दों से परिभाषित किया जाता है। पूरे विश्व में सनातन धर्म या हिन्दुओ की छवि को कलंकित करने का व्यापक तौर पर कार्य और षडयंत्र किया जा रहा है। खुलेआम प्रत्यक्ष राष्ट्रवादी शक्तियों का दमन हो रहा है और आज का हिंदू समाज मौन धारण किए किसी ईश्वरीय अवतार की प्रतीक्षा में बैठा दिखाई देता है जबकि मनुष्य अपने कर्मो का स्वयं कर्ता और भोक्ता होता है। और सत्य की तभी जीत होती है जब उसके जीतने की चेष्टा होती है यदि कोई प्रयास ही नही करेगा तो ये देश इन सेकुलर्स जिनका उद्देश्य ही हिंदू,हिन्दुज्म को जड़ से मिटाना है के हाथो गुलाम या मुस्लिम मजहबी देश में परिवर्तित हो जाएगा । ये सेकुलर्स यहाँ यू. एस. में और विदेशो में बैठे भारतीयों को अपने राष्ट्र से काटने के लिए विशेष फिल्में या मूवी बनाते हैं, पुस्तकें लिखते हैं, समाचार पत्र पर लेख लिखते हैं आदि कार्य ये बड़ी ही दृढ़ इच्छा के साथ युद्ध स्तर पर कर रहे हैं।ये सेकुलर लोग जिमी मानसिकता से ग्रस्त जिमी-टैक्स अदा कर रहे हैं जो मुग़ल काल में हिन्दुओं से लिया जाता था।

आप में से काफ़ी लोगो ने स्वतंत्रता की लड़ाई और क्रांतिकारियों के बारे में जब-जब पढ़ा होगा तो आप लोगो में भी एक राष्ट्रवाद की भावना जाग्रत होती होगी और ये भी सोचते होगे कि यदि मैं उस समय होता तो क्रांतिकारी होता तो आज ये राष्ट्र अपने भक्तो को फ़िर से आमंत्रण दे रहा है उन्हें क्रांतिकारी बनने का ओर देश पर बलिदान होने का फ़िर से मौका दे रहा है और आज फ़िर से एक स्वतंत्रता संग्राम की आवश्यकता है अन्यथा इस विश्व से विश्वगुरू सनातन सभ्यता का नामो-निशान मिट जाएगा। गीता में भी श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा है-

बुधवार, 19 नवंबर 2008

तंत्र - अविद्या

तंत्र विद्या एक ऐसा ढोंग है जोकि मुर्ख वाम-मार्गियो से प्रारम्भ हुआ था और उसीकी एक शाखा है। जिस तरह शैव मत वाले शिव के लिंग की पूजा करते हैं वाम-मार्गी, देवी जो शिवजी की पत्नी है उसके उपासक हैं ये मुर्ख लोग क्वारी कन्या(१२-१६ वर्ष के मध्य उम्र) को नग्न करके उसको देवी बनाकर उसके कोमार्य की उपासना करते हैं जिसको ये भैरव चक्र बोलते हैं जिसमें ये सब मदिरा का देवी को भोग लगा कर उसका प्रसाद आपस में एक ही पात्र में पीते हैं और सभी स्त्री -पुरूष लोग आपस में एक साथ मिलकर शारीरिक सम्बंध बनाते हैं और एक दूसरे के मूल-मूत्र उलटी तक खा जाते हैं(विदेशो में इसी तरह के नाईट-क्लब्स और पोर्नोग्राफी आधुनिक भैरव चक्र रूप है जो और भी अधिक विकृत हो चुका है) । बेड़ागर्क हो इन लोगो का ये है इन महामुर्खो का तरीका इश्वर की आराधना करने का अब इन महामुर्खो से कोई इन घिनोने कार्यो के बारे में पूछे तो आप को कुछ मंत्र-तंत्र बताएँगे जो इन्ही की तरह कुछ लोगो ने कपोल-कल्पित बनाये हुए हैं इन तंत्रों-मंत्रो का कही भी किसी भी आप्त ग्रन्थ में वर्णन नहीं मिलेगा। आज-कल भारत में इस तरह के भैरव चक्र तो शायद ही मिलेंगे किंतु यह मत और अंधविश्वास रूप में आप को मिल जाएगा। मूलतः इस मत का उदभव महाभारत काल के पश्चात का है क्युकी उस समय विद्वानों की कमी होने के कारण कुछ स्वार्थी, मुर्ख लोगो ने वेदों और आप्तग्रंथो की मनमाने ढंग से व्याखा की और उनका ग़लत अर्थ बताकर लोगो को बहकाया, उसी की आधुनिक शाखाएं ये तांत्रिक, देवी पर शराब चढाने वाले, यज्ञो में बलि देने वाले, झाड़-फूंक वाले,कब्रिस्तान वाले मोलवी, जादू-टोटके वाले, राख मलने वाले, लाश खाने वाले अघोरी आदि मुर्ख लोग हैं जो इस अपने अमूल्य जीवन का सर्वनाश करने में लगे हुए हैं और साथ में और लोगो का भी जो इनकी बातो में आकर इनका अनुसरण करने लगते हैं। इन्होने बहुत से संस्कृत में अपने अनुसार मंत्र आदि बनाये हुए हैं जिन्हें सुनाकर ये जनता को ठगते हैं । ऐसे-ऐसे मत यदि भारत वर्ष में होंगे तो क्यों न बेडा गर्क होगा इस देश का और इन्ही लोगो के कुकर्मो से निजात पाने के लिए जैन, बोद्ध आदि साम्प्रदायिक मत चल निकले थे इस देश में और मूल विद्या का हृयास होने से देश और विश्व को बहुत हानि हुई है। इन लोगो की वजह से देश की प्रतिष्ठा भी कम हुई है और लोग इश्वर सुख के लिए इनके अविद्या जाल में फस जाते हैं। अपनी अंतरात्मा से पूछो और आप्त ग्रंथों को पड़ कर देखो क्या ये तरीका है इश्वर सुख का, वास्तव में जानोगे तो ये रास्ता है घोर नर्क अविद्या और दुःख के महा सागर का। हम भारतियों को इन सब से मुक्ति पाने का प्रयास करना चाहिए क्युकी ये भी एक बहुत बड़ा रोड़ा हैं उन्नति मार्ग का।

शनिवार, 1 नवंबर 2008

वैदिक या सनातन मत (हिंदू)

बहुत लोग वैदिक दर्शन के बारे में सही तथ्य से नहीं जानते हैं ये बात मैं इस आधार पर कर रहा हूँ कि मैं जब बहुत लोगो से पूछता हूँ तो अधिकतर लोग इसकी प्राचीनता, बहुलतावाद में एकतावाद और कुछ ब्रह्म , विष्णु, महेश(शिव) की प्रार्थना के बारे में और पुराणों की कथा को कहते हैं। कुछ लोगो का मानना है कि वैदिक धर्म के अनुसार ८४ करोड़ देवी देवता हैं और फ़िर भी हम इश्वर एक है ये मानते हैं। वेदिकमतानुसार मूर्तिपूजा का निषेध नही है ऐसा भी मानना है बहुत से लोगो का, विकीपीडिया या बहुत सारी पुस्तको में लिखा है वैदिक या हिन्दुओं कि मुख्य पुस्तकें वेद हैं जिनमे बहुत से मंत्र-तंत्र और जादू-टोने और बहुत सारे कर्मकांड लिखे हैं और प्रायः सभी लोग इस बारे में एकमत हैं कि वेदांत या हिन्दुओं की मुख्य धार्मिक पुस्तकें वेद हैं किंतु इनमें लिखा क्या है इस बारे थोड़े ही लोग परिचित हैं मैं भी नही जानताअभी तक किंतु सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा एवं वेदांत दर्शन कुछ पुस्तकें पढने के पश्चात थोड़ा बहुत जानकारी हुई है और काफी सारी आशंकाओं का निवारण भी हुआ है।

क्या सत्य है और क्या असत्य इस बात का प्रमाण क्या हो जैसे कहीं ये लिखा है या कोई कहता है अग्नि में उष्णता नही होती तो उसकी बात का प्रत्यक्ष प्रमाण के आधार पर खंडन हो सकता है. किसी भी पुस्तक या किसी भी मनुष्य के वचनों पर बिना प्रमाण के विश्वास नही किया जा सकता इसलिए भारतीय दर्शन वेदोक्त मत में सभी शास्त्र अपनी बातो को बड़ी बुद्धिमत्ता के साथ प्रमाणित करते हैं। मुख्यतः ३ प्रकार के प्रमाण है - प्रत्यक्ष, अनुमान और शब्द जिनको सभी वेदांत शास्त्र स्वीकारते हैं। प्रत्यक्ष प्रमाण अनुसार जो हम ज्ञानेन्द्रियों से प्रत्यक्ष ग्रहण करते हैं जैसे की अग्नि में उष्णता होती है ये प्रत्यक्ष प्रमाण है और धुँए को देख कर कोई भी व्यक्ति अनुमान कर सकता है की निश्चित ही कहीं अग्नि लगी है ये अनुमान प्रमाण है क्योकि बिना अग्नि के धुआं नहीं उत्पन्न हो सकता और जो बात वेदों से या वेदानुसार आप्त ग्रंथों से प्रमाणित होती है वो शब्द प्रमाण के अंतर्गत आता है क्योंकि वेद अपोरुष्य या इश्वरकृत ज्ञान है जो स्वतः प्रमाणित है। वेद अपोरुष्य हैं इस बात को भी बहुत सारी बातो से प्रमाणित किया गया है किंतु यहाँ इस विषय पर अधिक बात न करते हुए मैं यहाँ केवल एक बात कहना चाहता हूँ क्योंकि वेदों के बनाने वाले को किसी ने भी नहीं देखा है इस कारण वो अपोरुष्य कहलाते हैं और स्रष्टि के आरम्भ में इतना गूढ़ ज्ञान देने वाला कोई मनुष्य नही हो सकता इसलिए इनको इश्वरकृत बोला गया है। अब इसमें प्रश्न ये उठता है की मनुष्य ने स्वयम ज्ञान अर्जित करके ये पुस्तकें लिखी होंगी किंतु अगर ऐसा माना जाए तो आज भी भील या वनवासी लोग क्यों स्वतः ज्ञान अर्जित करके ज्ञानी नहीं बन पाये अभी तक और ये भी प्रत्यक्ष है बच्चे को यदि जानवरों के मध्य पाला जाए या उसको ज्ञान से वंचित रखा जाए तो वो जानवरों के सद्रश्य ही व्यवहार करेगा और ज्ञान से उपेक्षित ही रहेगा। इसी बात से बुद्धिमान मनुष्य को समझ में आ जाना चाहिए की बिना शिक्षा और ज्ञान दिए कोई भी मनुष्य स्वतः ज्ञान अर्जित नही करता हाँ वो बात अलग है की ज्ञान मिलने के पश्चात वो खोज-कार्य या अनुसंधान करने लगे। उदाहरण के तौर पर एक इंजिनियर बिना शिक्षित हुए नही बना जा सकता अब कुछ लोग बिना शिक्षित हुए ही बहुत से इंजीनियरिंग वाले कार्य कर लेते हैं तो मेरा मतलब केवल विद्यालय शिक्षा से ही नही है किसी भी प्रकार की शिक्षा से है उसका स्रोत कुछ भी हो सकता है जैसे किसी से सुनकर,कहीं पढ़कर या किसी को देख कर ही किसी विषय का प्रारंभिक ज्ञान होता है और फ़िर उसके पश्चात ही अनुसंधान कार्य होता है। इस बात को थोड़ा गहराई से समझिये ये प्रत्यक्ष प्रमाणित है। यदि आपके पास कोई ऐसा उदाहरण है जो इस बात को ग़लत सिद्ध करता है तो मुझे भी बताइए। अभी भी बहुत लोगो की शंका का निवारण नहीं हो पाया होगा किंतु वो भिन्न विषय है ओर जिसको शंका हो वो वाद-विवाद कर सकता है. यदि कोई वेदों को ईश्वरीय या अपोरुष्य पुस्तक माने या न माने वो अलग बात है किंतु ये तो निश्चित है वो ज्ञान का भण्डार हैं इस पर प्रायः सभी सनातनी एक मत हैं।

वेदों में आत्म ज्ञान, श्रष्टि-ज्ञान के साथ-साथ उपासना विधि, कर्मकांड विधि , गणित, ज्योतिष(नक्षत्र,ग्रह, तारों के बारे में न की फलित ज्योतिष जैसा की आज कल के ढोंगी लोग बताते हैं), प्रकाश, पदार्थ विज्ञान आदि के अलावा गुरुत्व ज्ञान, नौकाविज्ञान, विमान विद्या आदि समस्त प्रकार के ज्ञानो का उल्लेख है जो कि मनुष्य जीवन के लिए आवश्यक हैं . इस बात को जान कर आपको आश्चर्य होगा कि परमाणु से लेकर ब्रह्माण्ड के विस्तार तक सभी विषय वेदों में वर्णित हैं. कला यंत्र (मशीन) आदि का भी वर्णन है. मैंने अभी हाल ही में एक पुस्तक और पढ़ी जिसका विषय १०८ उपनिषद है इस पुस्तक में १०८ उपनिषदों कि व्याखा है किंतु पुस्तक को पढने पर ज्ञात हुआ अधिकतर उपनिषद वास्तविक उपनिषद नहीं हैं सांप्रदायिक हैं क्युकी प्रमाण सिर्फ़ कुछ बातों को छोड़ कर एक का भी नही देते जैसे बहुत सारे उपनिषदों के अन्तिम में लिखा कि इस उपनिषद को पढ़ने से कितना भी बड़ा पापी क्यों न हो सब पापो से मुक्त हो जाता है और भी बहुत स्थानों पर तर्कहीन अप्रमाणित बातें हैं और जो उनमें सही बातें हैं वो आप्तग्रंथो या वास्तविक उपनिषदों से उध्रत हैं तो उनमे शंका करने का प्रश्न ही नही होता. मेरा तात्पर्य प्राचीन ऋषियों और ब्रह्मवेत्ताओं द्वारा लिखित उपनिषदों के विरुद्ध बोलना नही है वो तो साक्षात् वेदों का ही ज्ञान व्याखित करते हैं मेरा विरोध उन साम्प्रदायिक लोगो के साम्प्रदायिक ग्रंथो से है जिसको वो उपनिषदों का नाम देकर जनता को भ्रम में डालते हैं. वास्तविक उपनिषद कितने हैं ये तो मुझे भी पता नही(प्रयत्नरत हूँ) पर इतना मुझे भरोसा हो गया है कि धूर्त लोगो ने यहाँ भी चालबाजी दिखाई है उपनिषदों को बदनाम करने के लिए और अपनी-अपनी दुकान चलाने के लिए.

वैदिक मतानुसार इस जगत में दो तत्त्व हैं एक दृश्य(जड़) और एक द्रष्टा(चेतन) जोकि अनादी और अंतरहित हैं और ये चेतन दो तरह का है एक जीवात्मा(द्रष्टा) और एक परमात्मा(सर्वद्रष्टा) किंतु हैं दोनों सजातीय, जीवात्मा अल्पज्ञ है और इस स्थूल शरीर की अधिष्ठाता है परमेश्वर सर्वज्ञ है और इस समस्त जगत और जीवात्माओं का भी अधिष्टाता है जिसके कारण यह समस्त जगत चेतनवत कार्य करता रहता है. बिना चेतन के कोई जड़ स्वयम चेष्टा नहीं कर सकता और बिना कारण के इस जगत में कोई वस्तु कार्य रूप में परिणित नहीं होती और कार्य रूप में परिणित होने से पहले अपने कारण रूप में विद्यमान रहती है और बाद में कारण में ही लीन हो जाती है. उदाहरण के तौर पर घट(घड़ा) का उपादान कारण मिटटी है और वो नष्ट हो कर अपने उपादान कारण(जिस से वो निर्मित हुआ अर्थात मिट्टी) उसी में लय हो जाता है पर वास्तव में कोई वस्तु नष्ट नही होती और उत्पन्न भी नही होती केवल उसका रूप परिवर्तन होता है उसीको यहाँ पर नष्ट या उत्पन्न बोला जा रहा है (न्यूटन, आइन्स्टीन आदि वैज्ञानिको ने ये सिद्दांत यहीं से लिये हैं) इस प्रकार यह जगत भी अपने उपादान कारण प्रकर्ति से निर्मित होता है और उसी में लय हो जाता है और फ़िर से उत्पन्न होता है और फ़िर अपने कारण निरवयव प्रकृति में चला जाता है इस प्रकार यह प्रक्रिया भी अनादी और अंतरहित है. इस जगत कि यह प्रक्रिया उस परमेश्वर के सानिध्य से ही सम्भव है क्युकी जगत तो जड़ होने के कारण स्वयम चेष्टा नहीं कर सकता वो तो परमपिता परमेश्वर सबके आधार वैश्वानर अनादी अनंत प्रभु से प्रेरणा लेकर ही सक्रिय रहता है इस बात को प्रत्यक्ष इस विचित्र जगत में हर जगह देखा जा सकता है कि कोई भी जड़ स्वतः कार्य नही करता चेतन तत्त्व के बिना. हम सभी जीवधारी उस परमात्मा के अंश नही है किंतु प्रथक हैं क्युकी हम मनुष्य परोपकारी, दयालू, बुद्धिमान,निर्दयी,मुर्ख, ज्ञानी, अज्ञानी, अल्पज्ञ, जीवित, मृत सभी प्रकार के होते हैं किंतु इश्वर सदा एक सा सर्वज्ञ, परोपकारी, और भी उसके जो-जो गुण वेदों में वर्णित हैं होता है उसमें आम मनुष्यों के दोष आरोपित नही किए जा सकते और उसको अव्यक्त और अचिन्त्य भी कहा जाता है क्युकी वो इन्द्रियों का विषय नही है. जब-जब आत्मा इश्वर के गुणों में वर्तति है और इश्वर के अनंत गुणों में विचरती है तब-तब उसको इश्वर के सानिध्य का परमानंद का अनुभव होने लगता है और सब दुखो से निवृत्ति होने लगती है और जब वो अपने मूल स्वरुप से साक्षात्कार करती है तो परमानन्द में रहते हुए इस विचित्र जगत के सभी रहस्य जान जाती है और जीवन-म्रत्यु के बंधन से भी स्रष्टि के दोबारा उत्पन्न होने तक मुक्ति पा लेती.

बहुत से विद्वान् (शंक्रचार्यकाल के पश्चात् आजकल अधिकतर) के अनुसार हम जीवधारी उस इश्वर के अंश हैं और उसीमें हम को लय हो जाना है और जीवन मृत्यु से सदा के लिए छुटकारा पाना हमारा उद्देश्य है. इनके अनुसार इस जगत का उपादान कारण भी स्वयं ब्रह्मा ही है जो स्वयम को जगत और जीवात्माओं में परिवर्तित करके अज्ञानतावश या अविवेक्तावश अपने को पहचान नही पाता मतलब मैं, तुम, हम और ये जगत स्वयम इश्वर है और हमें अपने अन्दर और सब में इश्वर खोजना चाहिए. और एक बहुत लोकप्रिय इनका द्रष्टान्त है कि जिस प्रकार हम अंधेरे में रज्जू(रस्सी) को सर्प समझ लेते हैं या समझकर भ्रमतावश डर जाते हैं पर वास्तव में वहां सर्प नहीं है उसी प्रकार यह जगत को हम अविवेकी होने के कारण अस्तित्व वाला समझते है पर वास्तव में वो है नहीं वो उस सर्प कि तरह मिथ्या है मतलब ये जगत वास्तव में उपस्थित प्रतीत होता है किंतु जब ज्ञान का प्रकाश होता है तब वह उस सर्प की भाती गायब हो जाता है. यह सिद्धांत निराधार है और तर्कहीन है क्युकी पहले तो इश्वर में हम अज्ञानता का दोष नहीं लगा सकते दूसरा यह जगत इस द्रष्टान्त से भी मिथ्या नहीं सिद्ध हो सकता क्युकी हम किसी वस्तु में किसी वस्तु का ज्ञान का भ्रम तभी कर सकते हैं जब उस कल्पित वस्तु का भी कहीं अस्तित्व होता है जैसे इस द्रष्टान्त में सर्प का भ्रम इसलिए है क्युकी सर्प भी इस जगत में विद्यमान है इसका मतलब ये जगत भी विद्यमान है. मोक्ष या निर्वाण जीवन मृत्यु से छुटकारा प्राप्त करके इश्वर का सानिध्य प्राप्त करना है किंतु स्रष्टि लय तक जीवात्मा मुक्त होती और फ़िर स्रष्टि उत्पन्न होने पर फ़िर से जन्म लेती है और ये चक्र सदा चलता है. जीवन-मृत्यु क्या है और क्यों होता है ये जगत किन तत्वों से मिल कर बना है और हम कौन हैं, परमेश्वर कौन है, परमानन्द क्या है, दुखो से निवृत्ति कैसे हो ऐसे ही अनेक प्रश्नों का उत्तर मिलता है वेदों और उपनिषद में. इसके साथ-२ सामान्य मनुष्यों के कार्यो और अनेक कर्मकांडों जोकि समस्त जीवधारियों के भले के लिए हैं वो भी वर्णित हैं. इस छोटे से लेख में सभी बातो का समावेश नहीं हो सकता तो फिलहाल के लिए इतना ही लिखता हूँ बाकी सब आगे बाद में.

शनिवार, 25 अक्टूबर 2008

दिग्भ्रमित भारतवासी

हम हिंदू, शैव, वैष्णव, जैन, सिक्ख, बोद्ध, आर्यसमाजी हैं या सनातनी या वैदिक या फ़िर कोई और हमारी भाषा क्या है हिन्दी, अंग्रेजी, उर्दू, बंगला या तमिल या फ़िर मराठी, हमारी संस्कृति क्या है आर्य, द्रविड़, पञ्जाबी, गुजराती, उत्तर भारतीय, दक्षिण या पूर्व या फ़िर कोई और हमारी जाति क्या है शर्मा, गुप्ता,ठाकुर,जाटव या कोई और हमारे देश का नाम क्या है भारत वर्ष, आर्य व्रत, हिन्दुस्तान, इंडिया या कुछ और हमारा भूतकाल क्या है मुग़ल-शाशक, ब्रिटिश-राज या राम-राज या कोई और हमारे आदर्श कौन हैं अकबर, ओरंगजेब, शेरशाह सूरी, मोहम्मद बिनकासिम, नेहरू, गाँधी, सरदार पटेल, भगत सिंह, शिवाजी या शंकराचार्य, दयानंद सरस्वती, श्रीराम, श्रीकृष्ण, ऋषि कपिल मुनि , कणाद , पतंजलि, वेदव्यास या कोई और?

ऐसे बहुत सारे प्रश्नों का उत्तर बहुत सारे भारतीय अलग- अलग देंगे वो बात अलग है की बहुमत किसका है पर वास्तव में यक्ष प्रश्न ये है की ऐसा क्यों है इतने दिग्भ्रमित क्यों हैं सभी।

उत्तर है ग़लत शिक्षा और ग़लत शासन का परिणाम जो आज हम विभिन्न तरह की बातें करके दिग्भ्रमित हो चुके हैं. सर्वप्रथम हम देश के नाम से आरम्भ करते हैं हमारे देश का सबसे प्राचीन नाम आर्याव्रत है किंतु भारत वर्ष प्राचीन होने के साथ-२ अधिक प्रसिद्द है अतः आज हमारे देश का तर्कसंगत नाम नाम भारत वर्ष है. यूनानियों की वर्णमाला में स का उच्चारण न होने के कारण और सिन्धु नदी की प्रसिद्दी के कारण उन्होंने ही भारत को हिंदूवासी या हिन्दुस्तान नाम दिया. अंग्रेजो ने इसको इंडस वैली बोला और देश को इंडिया बोला. १९४७ में राष्ट्र के विभाजन पर कांग्रेस और पाकिस्तानियों ने भारत को हिन्दुस्तान नाम से प्रसिद्द करने का प्रयास किया और तर्क दिया विभाजन के पश्चात नए देशों के नाम हिन्दुस्तान और पकिस्तान होंगे. अब उनसे ये कोई प्रश्न पूछें कि क्या भारत नया देश है जो इसका नामकरण किया जायेगा. पकिस्तान के सन्दर्भ में ये बात समझ में तो आती है. अतः वास्तव में हमारे देश का नाम न तो इंडिया है और ना हिन्दुस्तान सिर्फ़ और सिर्फ़ भारत वर्ष है. जाति के बारे में बात करें तो हमारी मानव जाति है और हम अपने कर्मो के अनुसार वर्गीकृत हैं. सभ्यता संस्कृति हमारी आर्य या भारतीय है चाहे वो देश के किसी भी कोने का ही क्यों न हो. हमारे आदर्श लूट खसोट मचाने वाले अकबर, ओरंगजेब या कोई अंग्रेज शाशक नही हैं या चालाक स्वार्थी नेता नेहरू, गाँधी नही हैं हमारे आदर्श हमारे भारत के ऋषि, संत, श्रीराम और श्रीकृष्ण जैसे लोग हैं या फ़िर पराक्रमी शिवाजी, महाराणा प्रताप जैसे लोग होने चाहिए. हमारे या सम्पूर्ण मानव जाति के कल्याण हेतु मूल ग्रन्थ वेद हैं जिनसे ही ज्ञान का प्रकाश लेकर अन्य अनेक पुस्तके लिखी गई हैं जैसे सांख्ययोग, योगशास्त्र, न्यायशास्त्र, वैशेषिक दर्शन, गीता, रामायण, महाभारत आदि धर्मं ग्रन्थ. वेद संस्कृत में लिखे गए हैं और संस्कृत से ही समस्त भाषाएँ निकली हैं. संकृत कि लिपि देवनागरी है और सभी भाषाओँ में सबसे अधिक समीप हिन्दी है तो हमारी राष्ट्र भाषा हिन्दी हैं. एक बार कि बात है राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के भुतपूर्व अध्यक्ष रज्जू भइया तमिलनाडु में एक अधिवेशन में भाषण देने गए वहां पर उन्होंने हिन्दी में बोलना प्रारम्भ कर दिया तभी सभा में लगभग सभी ने तिरस्कार करते हुए और शोर मचाते हुए इंग्लिश या तमिल में बोलने के लिए कहा तो रज्जू भइया ने कहा मैं भौतिक शास्त्र का प्राध्यापक हूँ और अंग्रेजी में भी बोल सकता हूँ पर एक बार आप लोग मुझे हिन्दी में बोलने दे उसके बाद अगर आपकी समझ में नही आएगा तो मैं इंग्लिश में अवश्य बोलूँगा इस बात पर सभी राजी हो गए और उन्होंने अपना पूर्ण भाषण हिन्दी में दिया. भाषण के पश्चात लोगो ने कहा क्या ये हिन्दी है इसको तो हम समझ सकते हैं तब रज्जू भइया ने कहा कि तुमने अभी नेहरू जैसे लोगो कि हिन्दी सुनी है जो कि हिन्दी में फारसी शब्दों का अधिकतम प्र्योग करते हैं जिस के कारण आप को हिन्दी समझ ने में समस्या होती है. इस बात से एक बात समझ में आती है कि यदि हिन्दी में संस्कृत के तत्सम शब्दों का ही अधिकतम प्र्योग हो तो देश के अन्य भाषी भी इसको आराम से समझेंगे और बोल पाने में भी समर्थ बनेंगे. धर्मं हमारा सनातन है या वैदिक कहो एक ही बात है. सनातन का अर्थ है जो अनादी काल से चला आ रहा है या इश्वर द्वारा प्र्ध्रत प्राकृतिक हर मनुष्य का होता है जो किसी सीमाओं में या संकीर्णताओं से नही बंधा है जो वेदों के अनुरूप वैज्ञानिक रूपवत चलता है जोकि एक जीवन शैली है और सभी मनुष्य जाति को समान रूप से देखती है. हिंदू नाम यूनान वासियों ने ही दिया था बाद में अरब और अंग्रेजो ने भी हमें हिंदू बोलना प्रारम्भ कर दिया. धीरे -धीरे अब ये ही सब भारतीयों में भी प्रचलित हो गया किंतु ये हमारा वास्तविक धर्मं नाम नही है. पूरे विश्व में बहुत सारे रिलिजन ,मजहब , या बहुत सारे मत हैं जैसे मुस्लिम, क्रिस्चियन, ज्युत्स, पारसी आदि और एक मत सेकुलर भी है जो इन सबका मिलाजुला रूप है जिसमें बहूत सारे हिंदू भी सम्मलित हैं. सेकुलर मत के अनुसार भारत, भारतीयता (हिंदू, सनातन या वैदिक मत) का ही विरोध किया जाता है और हिन्दुओं का सर्वनाश करना ही इसका मुख्य उद्देश्य है. भारत में यह मत बहुत अच्छी तरह से फलफूल रहा है और हमारे दिग्भ्रमित होने का भी सब से बड़ा कारण ये सेकुलर मत ही है. जो जितना बड़ा हिंदू-विरोधी उतना बड़ा सेकुलर. जो बात मैंने यहाँ पर लिखी हैं वो भी सेकुलर्स को मान्य नही हैं. ये लोग तार्किक बातो पर भी विश्वास नही करते हैं. और सभी मतों की जो घटिया बातें हैं उनके पूर्ण समर्थक हैं. जिस दिन हम इन सेकुलरिस्टों के छदम भारत विरोधी नीतियों का पूर्ण सफाया कर देंगे उसी दिन भ्रम का आवरण विच्छेद होकर भारत में विकासोदय का सूर्य आकाश में प्रज्वलित होगा और समस्त विश्व को अपने ज्ञान प्रकाश से आलोकित करके विश्व कल्याण का मार्ग प्रशस्त करेगा.
वंदे मातरम् !!

गुरुवार, 17 अप्रैल 2008

क्या भारत वर्ष या आर्याव्रत हमारा देश नहीं है (क्या हम विदेशी हैं )

भारत वर्ष की लगातार अत्यन्त त्रुटिपूर्ण शिक्षा का ही ये कमाल है की हम अपने देश में ही अपने आप को विदेशी आक्रमणकारी की संज्ञा से संबोधित करते हैं जिस के कारण बहुत सारे लोग (और इसमें लगातार वृद्धि भी हो रही है) अपने को आर्य और कुछ को द्रविड़ बताते हैं और जिसके कारण उनके ह्रदय एक नही हो पाते हैं और वो अपने आप को अलग संस्कृति का मानते हैं ये बड़ी ही विकट और हास्यास्पद बात है कि काफी सारे दक्षिण भारतीय लोग अब भी उत्तरी भारतीय लोगो को आक्रमणकारी और अलग संस्कृति का समझते हैं और इनकी इस समझ में बहुत सारे नेता उत्तरी भारतीय लोग भी बढ़-चढ़ कर साथ देते हैं जिससे देश विखंडन कि और बढ़ रहा है। करीब १५० साल पहले ब्रिटिश शाशकों द्वारा बड़ी चालाकी से भारतीय शिक्षा में ये लिखवा दिया गया कि उत्तरी भारतीय लोग यहाँ के नही हैं मध्य एशिया से यहाँ पर आए हैं और उन्होंने यहाँ पर यहाँ के वास्तविक लोगो पर कब्जा कर लिया बाद में उनका साथ हमारे महा बेवकूफ और चरित्रहीन नेता जवाहर लाल नेहरू ने एक तर्कहीन महाबकवास किताब उन्ही की नक़ल से डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया लिख कर महांचापलूसी और बुद्दिहीनता का परिचय दिया। इस बात का आज कि पीडी पर बड़ा ही कुप्रभाव पड़ा है। उनके पास कोई भी प्रमाण नही है कि आर्य बाहर से आए हैं सिर्फ़ बेसिर-पैर कि बातों के अलावा। जैसे NCERT की पुस्तकों में लिखा है कि “आर्य पहले कहीं साउथ रूस से मध्य एशिया के मध्य में कही रहते थे क्युकी कुछ जानवरों के नाम जैसे dog, horse, goat (कुत्ता,घोडा , बकरी) आदि और कुछ पोधो के नाम पाइन, मेपल आदि जैसे शब्द सभी इंडो- यूरोपियन भाषाओं में एक जैसे हैं इससे ये पता लगता है कि आर्य नदियों और जंगलों से परिचित थे।“ सब से पहले तो ये इंडो-यूरोपियन भाषा का कोई अस्तित्व नहीं है और विश्व की सभी भाषाओं में तुम्हे संस्कृत के शब्द मिल जायेंगे सभी भाषाओं के आदि में संस्कृत है जरा शोध करके तो देखो। खैर ये एकदम से बेसिर-पैर और अतार्किक बात है जो NCERT कि पुस्तकों में लिखी है भाषाई शब्द और यहाँ तक कि व्याकरण से इंग्लिश, ग्रीक, इटालिक अरेबिक , हिन्दी(संस्कृत) और विश्व की कई अन्य भाषाओं में एक जैसे शब्द पाए जाते हैं किंतु इससे ये तो सिद्ध नही होता और ना ही कोई प्रमाण मिलता कि इंग्लिशमैन,इटालियन , अरब और भारतीयों के एक ही पूर्वज थे ये तो बिल्कुल बेवकूफी वाली बात है। कुछ भारतीयों को भारतीयों द्वारा लिखित या हिन्दी में लिखित बातों पर शायद विश्वास नहीं होगा तो ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की विंसेंट ऐ स्मिथ द्वारा लिखित पुस्तक "हिस्टरी ऑफ़ इंडिया" में साफ शब्दों में लिखा है "भाषा कोई आधार नही है एक जातीय होने के लिये"। NCERT की पुस्तक में ये भी लिखा है “आर्य १५०० वर्ष ईसा पूर्व से कुछ पहले भारत में आये जबकि कोई भी ऐसा पुरातात्विक विश्लेषण इसको सिद्ध नही कर सकता और ना ही तुम्हे कहीं मिलेगा” अगर मिलता तो हमें भी बताओ जरा।

अब जरा एक बात अपनी बुद्दी से और अनुसंधान करके सोच कर बताओ जो सब कुछ वेदों में लिखा है और जो भी कुछ हमारे रीती रिवाज़ हैं और जो हमारी जीवन दर्शन का सिद्धांत है वो इस विश्व में कही भी नही है अगर आर्य बाहर से मध्य से आते तो उनके वहाँ भी तो तो कुछ प्रमाण होने चाहिए जबकि हमारी संस्कृति और उनमें धरती-आसमान का अन्तर दिखाई देता है। शायद मेरी बात को आप में से कुछ लोग स्वीकार नही करेंगे तो मैं यहाँ उनके लिये कुछ ब्रिटेनिका एनसाईक्लोपीडिया से लिये गए बातो को लिख रहा हूँ ।
१) आर्यों में कोई गुलाम बनाने का कोई रिवाज़ नही था।
समीक्षा - जबकि मध्य एशिया अरब देशो में ये रिवाज़ बहुत रहा है।
२) आर्य प्रारम्भ से ही कृषि करके शाकाहार भोजन ग्रहण करते आ रहें है।
समीक्षा - मध्य एशिया में मासांहार का बहुत सेवन होता है जबकि भारत में अधिकतम सभी आर्य या हिंदू लोग शाकाहारी हैं३) आर्यों ने किसी देश पर आक्रमण नहीं किया
समीक्षा- अधिकतम अपनी सुरक्षा के लिये किया है या फ़िर अधर्मियो और राक्षसों (बुरे लोगो) का संहार करने के लिये और लोगो को अन्याय से बचाने के लिये और शिक्षित करने के लिये किया है। इतिहास साक्षी है अरब देशो ने कितने आक्रमण और लौट-खसोट अकारण ही मचाई है।
४) आर्यों में कभी परदा प्रथा नही रही बल्कि वैदिक काल में स्त्रियाँ स्नातक और भी पढी लिखी होती थी उनका आर्य समाज में अपना काफी आदर्श और उच् स्थान था ( मुगलों के आक्रमण के साथ भारत के काले युग में इसका प्रसार हुआ था) समीक्षा- जबकि उस समय मध्य एशिया या विश्व के किसी भी देश में स्त्रियों को इतना सम्मान प्राप्त नही था।
५)आर्य लोग शवो का दाह संस्कार या जलाते हैं जबकि विश्व में और बाकी सभी और तरीका अपनाते हैं।
समीक्षा - ना की केवल मध्य एशिया में वरन पूरे विश्व में भारतीयों के अलावा आज भी शवो को जलाया नही जाता।
६) आर्यों की भाषा लिपि बाएं से दायें की ओर है।
समीक्षा - जबकि मध्य एशिया और इरानियो की लिपि दायें से बाईं ओरहै
७)आर्यों के अपने लोकतांत्रिक गाँव होते थे कोई राजा मध्य एशिया या मंगोलियो की तरह से नही होता था।
समीक्षा - मध्य एशिया में उस समय इन सब बातो का पता या अनुमान भी नही था
८)आर्यों का कोई अपना संकीर्ण सिद्दांत या कानून नही था वरन उनका एक वैश्विक अध्यात्मिक सिद्दांत रहा है जैसे की अहिंसा, सम्पूर्ण विश्व को परिवार की तरह मानना। समीक्षा -मध्य एशिया या शेष विश्व में ऐसा कोई सिद्दांत या अवधारणा नही है।
९)वैदिक या सनातन धर्म को कोई प्रवर्तक या बनाने वाला नहीं है जैसे की मोहम्मद मुस्लिमों का, अब्राहम ज्युष का या क्राईस्ट क्रिश्चियन का और भी सब इसी तरीको से।
समीक्षा - मध्य एशिया या शेष विश्व में भारतीयों या हिन्दुओं के अतिरिक्त सभी के अपने मत हैं और सभी में और मतों की बुराई और अपनी तारीफ़ लिखी गई है जबकि हिन्दुओं या आर्यों ने हमेशा समस्त विश्व को साथ लेकर चलने की बात कही गई है।
१०) वेदों में या किसी भी संस्कृत साहित्य में कहीं भी ये वर्णन नहीं है की आर्य जाती सूचक शब्द है और कोई मध्य एशिया से आक्रमणकारी यहाँ आ कर बसे हैं जिन्होंने वेदों की रचना की है।
समीक्षा -जबकि इस बात को विश्व में सभी सर्वसहमति से स्वीकारते हैं की वेद विश्व की सबसे पुराने ग्रन्थ हैंऔर किसी भी भारतीय उपनिषद, पुराण, रामायण, महाभारत या अन्य किसी में भी कहीं भी ये एक शब्द भी नही मिलता की आर्य बाहर से आए हैं जबकि आर्य कोई जातिसूचक शब्द ना हो कर के उसका अर्थ श्रेष्ट है।
अब विचार करने योग्य ये है ये सभी बातें भारतीयों या हिन्दुओं के अलावा विश्व में कहीं और क्यों नही पाई जाती यदि हम आक्रमणकारी थे तो हमारे सिद्दांत या रीती रिवाज़, समाज या अन्य धार्मिक क्रिया-कलाप किसी और विश्व की सभ्यता में क्यों नही पाए जाते अगर वास्तव में हम आक्रमणकारी हैं तो हमारी मूल स्थान कहीं तो होगा जैसे की अधिकतर लोगो का मानना मध्य एशिया हमारा मूल स्थान है उनमें क्या एक भी गुण हम आर्यों के सिद्दान्तो या जीवनदर्शन से मिलता है बल्कि मूल स्थान पर ये गुण अधिक पाये जाने चाहिए थे। हम इस विश्व में शेष विश्व से अपनी एक अलग पहचान रखते हैं और ऐसे हजारों तथ्य हैं जो इस बात को सिद्ध करते हैं हम भारतीय मानव के जन्म काल से भारतवासी हैं। मेरे विचार से इससे बड़ी हास्यास्पद और विकट समस्या भारतीयों के लिये हो नहीं सकती अगर वो अपने को इस देश का मूल निवासी नही मानते। क्युकी इससे राष्ट्रभक्ति और स्वाभिमान पर सीधा आघात होता है जैसा की ब्रिटिश चाहते ही थे और इनके उद्देश्य को पूर्ण करने में पिछले १५० सालो से हमारे नेताओं ने जोकि अधिकतर भारतीयों की खाल में वेदेशी घुसे हुए हैं ने कोई कमी नही छोडी है जिससे आजकल की पीडी अपने राष्ट्र और संस्कृति से भी कटने लगी है। खैर देखते और आशा भी करते है भारत अपने इस काले युग से बाहर निकल कर फ़िर से अपने पैरो पर खड़ा हो कर के चलेगा किसी दिन।
धन्यवाद एवं शुभ कामनाओं सहित,
आपका मित्र सौरभ आत्रेय

मंगलवार, 15 अप्रैल 2008

क्या हम हिन्दी नहीं बोलते

मित्रो एक बार की बात है मेरी एक भारतीय से ये बैहस हुई कि भारतीय हिन्दी नहीं बोलते अब आप लोगो को सुन कर मेरा मतलब पढ़ कर बड़ा अजीब लगा होगा पर ऐसा ही कि कुछ मूर्ख लोग समझते हैं। अब उनका तर्क सुनिए उसने मुझ से हिन्दी में ही बोल कर कहा की आप इसको हिन्दी में बोलिए "भाईसाब दिल्ली जाने वाली ट्रेन कितने बजे जायेगी" सुन कर बड़ा अजीब लगा की हिन्दी में ही बोल रहा है और कहता है इसको हिन्दी में बोलिए। मैंने उससे कहा तुम तो इसको पहले से ही हिन्दी में बोल रहे हो तो कहता है हिन्दी में इसको ऐसा बोलेंगे "श्रीमान दिल्ली जाने वाली लोहपथगामिनी कितने समय पर प्रस्थान करेगी। मैंने उस से कहा ठीक है ये भी हिन्दी है और इसमें लोहपथगामिनी के स्थान पर अगर ट्रेन ही बोलोगे तो ज्यादा उचित रहेगा क्युकी ऐसा शब्द कुछ लोग जबरदस्ती बनाते हैं मजे लेने के लिये जैसे धुक-धुक वाहिनी और भी इस तरह के शब्द अपनी ही भाषा का मजाक उडाने के लिये लोग प्रयोग करते हैं और वास्तव में वो अपना मजाक स्वयं ही उड़ारे होते हैं , कहता है फ़िर ये हिन्दी कहाँ रहेगी। मैंने कहा अरे भले आदमी दुनिया की हर भाषा दूसरी भाषाओं से शब्द लेती रहती है इसका मतलब ये नही है की वो भाषा ही बदल गई अगर तुम्हे पता हो इंगलिश और अन्य भाषाओं में भी में कितने ही सैंकडो शब्द हिन्दी और अन्य भाषाओं से लिये गए हैं किंतु जब तुम ये क्यों नही बोलते की ये इंग्लिश नहीं है उदाहरण के तौर पर अगर मैं ये कहूं he is a tech guru. तो अब तुम इसको क्या बोलोगे गुरु शब्द तो हिन्दी का है जबकि अमेरिका मैं तो इसको बहुत प्रयोग में लाते हैं और ये सिर्फ़ एक शब्द नही ऐसे पता नही कितने शब्द हिन्दी(संस्कृत) , स्पेनिश , फ्रेंच, जर्मन और भी बहुत सी भाषाओं के शब्द तुम्हे इंग्लिश में आराम से मिल जायेंगे पर तुम उसको हमेशा इंग्लिश ही बोलोगे और वो है भी इंग्लिश। अब इसी तरह अगर हिन्दी में हम कुछ इंग्लिश के या फारसी के शब्द मिला कर बोल देते हैं तो वो हिन्दी ही रहेगी क्यूंकि ये शब्द हिन्दी ने ग्रहण कर लिये हैं हाँ लकिन अगर हम जानभूझ कर इंग्लिश या फारसी के शब्द अधिक से अधिक प्रयोग करते हैं तो वो हमारी नासमझगी गुलामी की मानसिकता और अच्छी हिन्दी नही होगी लेकिन वो होगी हिन्दी ही क्युकी भाषा व्याकरण से होती है न की सिर्फ़ संज्ञा से और तुम जब भी वाक्य की सरचना हिन्दी की ही व्याकरण से कर रहे हो। तो मेरे भाई अगर मैं ये कहता हूँ "दिल्ली जाने वाली ट्रेन कितने बजे\टाइम\वक्त या समय पर जायेगी" तो ये हिन्दी ही है। दोस्तो आप लोगो की क्या राय है इस बरे में कृपया कुछ प्रतिक्रिया दीजिये।

धन्यवाद एवं शुभ कामनाओं सहित,

आपका मित्र सौरभ आत्रेय