सोमवार, 26 अप्रैल 2010

सत्य का निर्धारण कैसे हो (न्यायदर्शनम् भाग ४)

क्योंकि २ प्रमाण शेष रह गए हैं इसीलिए उनको सक्षिप्त में लिखते हुए और इस विषय में लोगो की रूचि को अत्यंत कम देखते हुए न्याय दर्शन के इन सिद्धांतों को इसी भाग में समाप्त कर रहा हूँ और आगे अन्य विषयों पर लिखने का भी प्रयास करूँगा. आज कल पहले की भाति समय की उपलब्धता की कमी के कारण लेखन में फिर से रुकावट आ गयी है. वैसे मेरे इस तरह के लेख लोगो के लिए रुचिकर भी नहीं हैं फिर भी लोगो को अपने धर्म ग्रंथो के बारे में बताने का मेरा एक छोटा सा प्रयास है.

क्रमप्राप्त उपमान प्रमाण का संक्षिप्त में लक्षण इस प्रकार है –

जाने हुए साधर्म्य-सादृश्य से साध्य का साधन उपमान होता है. तीसरा प्रमाण उपमान है. किन्हीं दो पदार्थों का साधर्म्य-सादृश्य पहले से ज्ञात हो जाने पर उस सादृश्य ज्ञान से , प्रथम अदृष्ट वस्तु के सामने आ जाने पर उसके नाम का ज्ञान हो जाना उपमान है. जैसे एक नागरिक ने एक वनवासी से पूंछा क्या आप माषपर्णी और मुदगपर्णी ओषधियों को पहचानते हो ? हमें आवश्यकता है वन में जाकर लाना चाहते हैं; वहां उन्हें कैसे पहचाने ? वनवासी ने कहा आपने कभी उडद और मूंग के पेड़ को देखा है ? नागरिक बोला हाँ, उन्हें मैं अच्छी तरह से जनता हूँ. वनवासी ने बताया – उडद के पौधे के समान माषपर्णी तथा मूंग के पौधे के समान मुदगपर्णीका पौधा होता है. इससे व्यक्ति को उडद और माषपर्णी तथा मूंग और मुदगपर्णी के परस्पर-सादृश्य का ज्ञान हो जाता है. यह सादृश्य ज्ञान शाब्दिक है , अर्थात शब्दप्रमाणजन्य.

जब व्यक्ति अवसर पाकर जंगल में जाता है, तो वहां ढूँढने पर कुछ पौधे उसे उडद और मूंग के पौधों के समान दिखाई देते हैं. उन्हें देखते ही पहले जाने हुये इनके सादृश्य का स्मरण हो आने पर यह जान लेता है कि इस इस पौधे का नाम माषपर्णी और इसका मुदगपर्णी है . पौधा उसे प्रत्यक्ष दिखाई दे रहा है, यदि उसे पहले उडद और माषपर्णी के सादृश्य का ज्ञान नहीं होता, तो उस पौधे को देखते हुये भी वह नहीं जान सकता था कि इस पौधे का नाम माषपर्णी है.

क्रमप्राप्त शब्द प्रमाण का संक्षिप्त लक्षण इस प्रकार है –

आप्त का उपदेश कथन अथवा शब्द, शब्द नामक प्रमाण है.किसी पदार्थ के साक्षात्कृतधर्मा पुरुष को आप्त कहा जाता है. साक्षात्कार का अर्थ है—जो वस्तु जैसी है , उसको उसी रूप में निश्चयपूर्वक जानना. ऐसा जान कर पुरुष जब उस वस्तु के विषय में अन्य व्यक्तियों को बताने के लिए प्रव्रत्त होता है , तब वह उपदेष्टा है ; उसका कथन शब्द प्रमाण है .ऐसे पुरुष को आप्त इस आधार पर कहा जाता है कि पदार्थ के उस प्रकार जानने का नाम आप्ति है . जगत में सब प्रकार के व्यवहार इन्हीं प्रमाणों की आधार पर चलते हैं. जैसे उदाहरण के तौर पर सभी वैज्ञानिक सिद्धांत शब्द प्रमाण के अंतर्गत कहे जा सकते हैं.

शब्द प्रमाण से जाने गए जिस अर्थ को इसी देह के साथ रहते , अथवा इसी जीवन में जाना जा सके , वह दृष्टार्थ शब्द-प्रमाण है. इसका तात्पर्य है –शब्दप्रमाण से जाने गए जिस अर्थ को प्रत्यक्ष प्रमाण से भी जाना जा सके , वह दृष्टार्थ है ; जैसे –किसी व्यक्ति ने किसी अन्य से कहा –वहां नदी-किनारे पेड़ पर पांच फल लगे हैं . वक्ता पुरुष आप्त है , उसने फलो को पेड़ पर लगे देखा है . जब श्रोता पुरुष नदी-तट पर जाता है , यदि किसी ने इस बीच उन फलों को नहीं तोडा है , तो वह उनको वहां देखता है व् प्राप्त कर लेता है . वक्ता पुरुष का वैसा कथन दृष्टार्थ शब्दप्रमाण है. लोक में ऐसे व्यवहार की प्रचुरता है . व्यवहार में ऐसा कोई विभाग नहीं है , जहाँ शब्द प्रमाण के इस आधार के बिना अभिलषित कार्य को अनुकूलता के साथ संपन्न किया जा सके.

अन्य प्रमाण के बिना जो अर्थ केवल शब्द्प्रमाण से जाना जाये , वह अदृष्टार्थ शब्द-प्रमाण कहा जाता है.यह शब्दप्रमाण का विभाग वस्तुतः वैदिक वाक्य और लौकिक वाक्य के आधार पर है . इस रूप में लौकिक वाक्य को दृष्टार्थ और वैदिक वाक्य को अदृष्टार्थ समझना चाहिये. यहाँ अदृष्टार्थ से तात्पर्य केवल इतना है कि बहुत से वैदिक वाक्यों के विषय साधारणतया दृष्ट नहीं होते उनको अनुमान प्रमाण से जानने के लिए प्रयत्न किया जाता है. किन्तु मुक्त पुरुष के लिए कोई भी पदार्थ या विषय अदृष्ट नहीं होता इसीलिए मुक्त पुरुषों द्वारा कहे गए कथन भी साधारण मनुष्यों के लिए दृष्टार्थ या अदृष्टार्थ शब्द प्रमाण के श्रेणी में ही आते हैं.

सांख्य-दर्शन में प्रमाणों के केवल ३ प्रकार उल्लेखित हैं इसका अर्थ यह बिलकुल नहीं है कि ये आर्य ग्रन्थ विरोधी हैं. वास्तव में किसी विषय को समझाने के लिए किसी व्यक्ति को अधिक विस्तार से समझाया जाता है और कहीं कोई व्यक्ति संक्षिप्त आधारों से ही समझ जाता है, इसी प्रकार प्रमाणों की संख्या का यह भेद मात्र विषय को समझाने की दृष्टि के कारण हैं अन्यथा सभी वैदिक आर्ष मान्य ग्रन्थ अविरोधी हैं.

जैसा कि मैंने लेख के शुरू में लिखा था प्रमाणों का यह क्रम मैं यहीं समाप्त करते हुए इस न्याय-दर्शन के लेखन को अभी के लिए यहीं इसी लेख में समाप्त करता हूँ. आगे कभी किसी लेख में सक्षिप्त में शेष सिद्धांत, छल आदि के बारे में लिखूंगा. विस्तार से जानने के लिए इन षड-दर्शन को आप स्वयं पढ़िए अधिक बेहतर होगा. इस लेख-श्रृंखला में बहुत ही संक्षिप्त में यह सब लिखा है और बाकी विस्तार से जानने के लिए इन ग्रंथों का सूक्ष्म बुद्धि से स्वध्याय बहुत आवश्यक है.

1 टिप्पणी:

पंकज सिंह राजपूत ने कहा…

वैसे मेरे इस तरह के लेख लोगो के लिए रुचिकर भी नहीं हैं फिर भी लोगो को अपने धर्म ग्रंथो के बारे में बताने का मेरा एक छोटा सा प्रयास है.

kisi ko ruchi ho ya naa ho mujhe to hai, 100 moorkh logon ke pichhe chalane se achchha hai kee akele hee chala jaaye