शुक्रवार, 26 मार्च 2010

सत्य का निर्धारण कैसे हो (न्यायदर्शनम् भाग ३)

भाग ३ –

प्रमाण का दूसरा प्रकार है अनुमान. प्रत्यक्ष के अनंतर प्रत्यक्ष पूर्वक होने वाला (अर्थात प्रत्यक्ष है कारण जिसका) ३ प्रकार का अनुमान प्रमाण है – वे ३ प्रकार हैं पूर्ववत, शेषवत, और सामान्यतोदृष्ट. अनुमान में कोई साध्य, हेतु एवं उदाहरण आदि को प्रस्तुत कर – सिद्ध किया जाता है . यद्यपि अनुमान के प्रयोग में पञ्च अवयवों(वाक्य खण्डों) का प्रयोग किया जाता है , तथापि(फिर भी) महत्वपूर्ण अवयव साध्य सिद्धि के लिए ‘हेतु’ होता है, उसीको ‘साधन’ कहा जाता है. यह नाम ही उसके महत्त्व का द्योतक है.

प्रत्यक्ष एवं अनंतर अनुमान-काल में साधन का प्रत्यक्ष होना अभिप्रेत है. साध्य-साधन के परस्पर संबंध को ‘व्याप्ति’ कहा जाता है. अनुमान में सर्वप्रथम व्याप्ति का प्रत्यक्ष ज्ञान होना चाहिये. व्यक्ति देखता है जब लकड़ियों में आग जलाई जाती है , तो उससे धुआं अवश्य निकलता है, इससे वह जान लेता है धुंए का कारण आग है, धुँआ आग के बिना हो नहीं सकता.ऐसा प्रत्यक्ष ज्ञान ही ‘व्यप्तिज्ञान’ है.

हेतु, साधन, लिंग ये पद एक ही अर्थ को कहते हैं, इसी प्रकार साध्य, लिंगी ये पर्याय पद हैं. साध्य और साधन अथवा लिंगी और लिंग के संबंध का उक्त प्रकार प्रत्यक्ष हो जाने के अनंतर प्रत्यक्ष ज्ञान की स्तिथि तो नहीं रहती, उसका संस्कार आत्मा में रह जाता है. ऐसा व्यक्ति जिसने लिंग-लिंगी-सम्बन्ध का प्रत्यक्ष ज्ञान कर लिया है, कभी जंगल में चला जा रहा है उसे आग की आवश्यकता होती है. इधर उधर दृष्टिपात करता हुआ चल रहा है. एक जगह उसे धुँआ उठता दिखाई देता है. उसको देखते ही वह संस्कार जाग जाता है, जो पूर्व में हुए ज्ञान से आत्मा में हुआ था. संस्कार के जागते ही साध्य-साधन के सम्बन्ध का स्मरण हो आता है . उस समय धुंए के दीखने और साध्य-साधन के सम्बन्ध का स्मरण हो आने से उस व्यक्ति को वहां अग्नि का ज्ञान हो जाता है. अनुमान-प्रमाण से हुआ यह ज्ञान अनुमिति–ज्ञान कहा जाता है.

अनुमान के पांच अवयव-

१.) सामने जगह आग वाली है. यहाँ आग साध्य है, प्रदेश (जगह) अधिकरण है. साध्य के अधिकरण को तार्किक भाषा में ‘पक्ष’ कहा जाता है . अनुमान के पांच अवयवों में यह प्रतिज्ञा वाक्य है .

२.) वहां धुआं दिखने से यह हेतुवाक्य है .

३.) जैसे लकड़ियों को जलाने में , यह दृष्टान्तवाक्य है .

४.) वैसा ही यहाँ है , अर्थात सामने धुंआ दिख रहा है. यह उपनय वाक्य कहा जाता है .

५) धुआं वाला होने से यह प्रदेश(जगह) अवश्य आग वाला है. यह निगमनवाक्य है .

इस स्मृति का मूल वह प्रत्यक्ष ज्ञान है, जो प्रथम लकड़ियों के ढेर आदि में साध्य-साधन सम्बन्ध का व्यक्ति को साक्षात् होता है . कोई अनुमान इसके बिना हो नहीं सकता , इसीलिए अनुमान के लक्षण में प्रत्यक्षपूर्वक्ता का प्राधान्य होता है .

अनुमान के ३ भेद – अनुमान –प्रमाण विशिष्ट वाक्य प्रयोगों द्वारा किसी अदृष्ट अर्थ को जानलेने-समझने की एक पद्धति है. ऐसे कतिपय आधारों पर अनुमान ३ प्रकार का होता है – पूर्ववत , शेषवत सामान्यतोदृष्ट.

पूर्ववत्- जहाँ कारण से कार्य का अनुमान हो, अनुमान का यह प्रकार पूर्ववत् कहलाता है.

उदाहरण –जैसे उमड़ते-घुमड़ते बदलो को देख कर यह अनुमान हो जाता है कि अभी भविष्य में वर्षा होने वाली है. यहाँ उन्नत-मेघ कारण और वर्षा कार्य है . कार्योन्मुख कारण से होने वाले कार्य का अनुमान हो जाता है .

शेषवत्- पूर्व विद्यमान कारण की अपेक्षा से कार्य शेष समझा जाता है . अतः यह यह शेष पद कार्य का बोध कराता है . अर्थ हुआ कार्य वाला , वह कारण होगा . तात्पर्य है –जहाँ कार्य से कारण का अनुमान हो.

उदाहरण – साधारण जल प्रवाह के विपरीत नदी का पानी बहुत चड़ आया है, प्रवाह बहुत तीव्र है , जल, मिटटी , सूखे पत्ते ,कूड़ा-कबाड़ अदि मिला बहुत मलिन है , कभी पेड़ व झाड़-झंखाड़ भी बहे चले आ रहे हैं; नदी के ऐसे प्रवाह से ऊपरी भागों में कहीं वृष्टि के होने का अनुमान होता है .नदिजल का वैसा प्रवाह कार्य तथा वृष्टिजल उसका कारण है . यहाँ कार्य से कारण का अनुमान होता है . धूम-कार्य से अग्नि-कारण का अनुमान भी इसका उदाहरण है.

सामान्यतोदृष्ट- विभिन्न प्रदेश में एकत्वेन द्रष्ट व्यक्ति या पदार्थ जहाँ अदृष्ट अर्थ का अनुमान कराता है, वह अनुमान का सामान्यतोद्रष्ट नामक तीसरा प्रकार है.

उदाहरण – गत वर्ष मैंने जिस देवदत्त को मुंबई में देखा था, वही आज दिल्ली में विद्यमान है . मुंबई में देखे देवदत्त का दिल्ली में दीखना -- हमारे लिए अदृष्ट – उसकी यात्रा का अनुमान कराता है . यात्रा के बिना ऐसा संभव ही नहीं है अतः कालान्तर से विभिन्न प्रदेश में किसी व्यक्ति या पदार्थ का दीखना उसकी यात्रा अथवा गति का अनुमान कराता है, जिसको अनुमाता ने देखा ही नहीं है .

पूर्ववत् अनुमान का अन्य विवरण- यह अनुमान भी २ प्रकार का होता है –एक समव्याप्तिक, दूसरा –विषमव्याप्तिक. पहला वह अनुमान होता है जहाँ साध्य और साधन दोनों एक दूसरे के साध्य व साधन हो सकें . तात्पर्य है , साध्य-साधन दोनों का परस्पर व्याप्य-व्यापकभाव हो, जैसे –‘उत्पतिमत्त्व’ (उत्पत्ति वाला) हेतु से घट (घड़ा) का अनित्यत्व सिद्ध किया जाता है –‘घटः अनित्यः, उत्पत्तिमत्त्व’ . यहाँ घट का अधिकरण अथवा पक्ष में अनित्यत्व साध्य है , उत्पत्तिमत्त्व हेतु है. इसकी व्याप्ति होगी-जो उत्पन्न होने वाला पदार्थ है , वह अनित्य होता है. इस प्रकार के कथन में व्याप्य का पहले और व्यापक का अनंतर कथन किया जाता है . यह एक व्यवस्था है –व्याप्ति के ऐसे निर्देश में हेतु अर्थात साधन व्याप्य और साध्य व्यापक होता है. इस उदाहरण में साध्य-साधन को परस्पर बदला जा सकता है. अर्थात जो पदार्थ अनित्य है, वह उत्पत्ति वाला होता है. इस प्रकार अनित्यत्व और उत्पत्तिमत्व दोनों धर्म सामान व्यप्तिवाले हैं. इनमें से प्रत्येक एक दूसरे का साध्य व साधन कहा जा सकता है . इसीलिए यह पूर्ववत् समव्याप्तिक अनुमान माना जायेगा.

यह स्तिथि धूम-अग्नि के उदाहरण में नहीं है. जहाँ आग है वहां धुंआ अवश्य होता है किन्तु जहाँ आग है , वहां धुंआ अवश्य होता है ऐसा निर्देश नहीं किया जा सकता. क्योंकि दहकते अंगारों में आग के रहते भी धुंआ नहीं रहता . इस कारण यह पूर्ववत् विषमव्याप्तिक अनुमान कहाता है.

शेषवत् का अन्य विवरण – इस पद का अर्थ है, परिशेष अर्थात बचा हुआ. किसी पदार्थ के स्वरुप का निर्णय करने के लिए , अन्य विविध पदार्थों से उसके भेद का उपपादन करने पर जो पदार्थ शेष रह जाता है; अर्थात जिसके साथ उसके भेद का वर्णन नहीं हुआ; वही स्वरूप उस पदार्थ को समझ लिया जाता है. जैसे किसी कार्य या द्रव्य के हमारे पास संभावित कारण उपलब्ध ५ कारणों में से एक है और हम ४ कारणों को असिद्ध प्रमाणित कर देते हैं तो शेष बचे हुए कारण को ही उसका कारण प्रमाणित माना जायेगा.

उदाहरण के तौर पर शब्द के स्वरूप का निर्णय करने के लिए प्रसंग चलाया – शब्द सत् अर्थात सत्ता वाला है, और अनित्य है, यह जानलेने पर इतना निश्चय हो जाता है कि शब्द न सामान्य (जातिरूप) हो सकता है , न विशेष और न समवाय . क्योंकि इन पदार्थों में न सत्ता जाति रहती है और न ये अनित्य हैं . इसीलिए शब्द सत्ता जाति वाला और अनित्य होने से सामान्य, विशेष, समवाय इन पदार्थों से अलग हो जाता है . अब सामान्य आदि से अतिरिक्त ३ पदार्थ और हैं –द्रव्य, गुण और कर्म . तब विवेचन करना होगा शब्द द्रव्य है, गुण है या कर्म है ?

ज्ञात हुआ –शब्द द्रव्य नहीं हो सकता , क्योंकि शब्द अनित्य है; जो अनित्य द्रव्य होते हैं , उनके समवायिकरण अनेक द्रव्य हुआ करते हैं . किसी भी अनित्य द्रव्य का समवायिकरण एक द्रव्य कभी नहीं होता . परन्तु शब्द का समवायिकरण केवल एक द्रव्य –आकाश है . अतः शब्द का द्रव्य माना जाना संभव नहीं .

शब्द कर्म पदार्थ के वर्ग में भी नहीं आता , क्योंकि कर्म कभी दूसरे कर्म का कारण नहीं होता ; अर्थात कर्म किसी अन्य कर्म को कभी उत्पन्न नहीं करता . इसके विपरीत शब्द अन्य शब्द का उत्पादक होता है . वक्ता के मुख से उच्चारित शब्द , श्रोता के श्रोतेंद्रिय तक शब्द-संतति द्वारा पहुँचता है . मुखोच्चारित प्रथम शब्द से समानजातीय शब्द आगे-२ उत्पन्न होते जाते हैं , और वह ध्वनि इस प्रकार श्रोत्र तक पहुँच जाति है . अतः शब्द, शब्दान्तर का हेतु होने से कर्म के वर्ग में समावेश नहीं हो पाता . इस प्रकार द्रव्यादी पांच पदार्थों से अतिरिक्त केवल एक पदार्थ शेष रह जाता है . उस वर्ग में असमावेश के लिए कोई हेतु न होने के कारण शब्द का समावेश गुण वर्ग में मान लिया जाता है . इस परिशेष अनुमान के आधार पर शब्द का गुण होना निश्चित हो जाता है .

किसी पदार्थ का स्वरुप क्या -२ हो सकता है उसको भी सिद्ध किया जा सकता है किन्तु उक्त उदाहरण में वो स्वरुप को सिद्ध मान कर विवेचन किया गया है. तार्किकता से प्रमाणों के आधार पर शब्द पञ्च भूतों में से आकाश का गुण होता है . यहाँ केवल उदाहरण के लिए संक्षिप्त में लिखा है .

क्रमशः

2 टिप्‍पणियां:

naval ने कहा…

mahoday ek comments men mene padha he aap batyen theek he ya ghalat

स्वामी दयानंद सरस्वती ने दाह संस्कार की जो विधि बताई है वह विधि दफ़नाने की अपेक्षा कहीं अधिक महंगी है। जैसा कि स्वामी जी ने लिखा है कि मुर्दे के दाह संस्कार में “शरीर के वज़न के बराबर घी, उसमें एक सेर में रत्ती भर कस्तूरी, माषा भर केसर, कम से कम आधा मन चन्दन, अगर, तगर, कपूर आदि और पलाष आदि की लकड़ी प्रयोग करनी चाहिए। मृत दरिद्र भी हो तो भी बीस सेर से कम घी चिता में न डाले। (13-40,41,42)
स्वामी दयानंद सरस्वती के दाह संस्कार में जो सामग्री उपयोग में लाई गई वह इस प्रकार थी - घी 4 मन यानी 149 कि.ग्रा., चंदन 2 मन यानि 75 कि.ग्रा., कपूर 5 सेर यानी 4.67 कि.ग्रा., केसर 1 सेर यानि 933 ग्राम, कस्तूरी 2 तोला यानि 23.32 ग्राम, लकड़ी 10 मन यानि 373 कि.ग्रा. आदि। (आर्श साहित्य प्रचार ट्रस्ट द्वारा प्रकाषित पुस्तक, ‘‘महर्शि दयानंद का जीवन चरित्र’’ से) उक्त सामग्री से सिद्ध होता है कि दाह संस्कार की क्रिया कितनी महंगी है।

nitin tyagi ने कहा…

@saurabh
नवल जैसे मूर्खों का क्या होगा ???
ये वों हिन्दू है जिससे सिर्फ बातों को सुनकर या उलटी सीधी किताबें या जमाल जैसो मुर्ख लोगों के ब्लॉग पढ़ कर ,कुए के मेंढक की तरह टर्र-२ करते हैं |