रविवार, 25 जुलाई 2010

क्या शूद्र को विद्याप्राप्ति का अधिकार नहीं है ?

शास्त्र के अध्यन तथा ब्रह्मा की उपासना आदि में मनुष्यमात्र का अधिकार है, इस तथ्य का विवेचन भारतीय साहित्य के विभिन्न स्थलों में विविध प्रकार से किया गया है । बादरायण व्यास-प्रणीत ब्रह्मसूत्रों में भी इसका एक प्रसंग है। सूत्रकार ने इस प्रसंग [१३२५-३३] के द्वारा विद्याध्यन एवं ब्रह्मोपासना आदि में मनुष्यमात्र के अधिकार का निश्चय किया है। पर एक छान्दोग्य [४११-२] प्रसंग के आधार पर ऐसा कहा जाता है कि विद्याध्यन आदि में शूद्र को अधिकार नहीं होना चाहिये। वहां एक आख्यानक है- जानश्रुति पौत्रायण नामक व्यक्ति रैक्व नामका ऋषि के पास जाता है; उसे बहुत-सा धन, गौ आदि देकर ब्रह्मविद्या की शिक्षा के लिये प्रार्थना करता है। ऋषि रैक्व उसे दुत्कार देता है, और कहता है –अरे शूद्र! गौ , धन आदि अपने ही पास रख, मुझे इसकी आवश्यकता नहीं, चला जा !’ इससे समझा जाता है कि शूद्र को विद्या में अधिकार नहीं होना चाहिये।

इसी प्रसंग के ब्रह्मसूत्रों [२३३४-६५] में स्पष्ट किया गया है कि जानश्रुति को ऋषि ने शूद्र क्यों कहा। वस्तुतः वह क्षत्रिय राजा था। वह अपना अनादर सुनकर शोक को प्राप्त हुआ , अथवा शोक के कारण वह रैक्व ऋषि के पास दौड़ा आया ; इन भावनाओं को अपनी अन्तरदृष्टि से ऋषि ने पहले ही समझकर उसको शूद्र कहा; यहाँ पर शूद्र-वर्ण का कोई प्रसंग नहीं है। उपनिषद में इस पद के प्रयोग को भ्रान्ति से वर्ण-परक न समझा जाए, इसीलिए सूत्रकार ने इसकी विशिष्ट व्याख्या की है। इससे विद्याप्राप्ति में शूद्रवर्ण के अधिकार के लिये किसी प्रकार की बाधा नहीं आती। विद्या में मनुष्यमात्र का अधिकार है, इस तथ्य को सूत्रकार ने प्रथम [१३२५] निश्चित कर दिया है, इसी के अनुसार शूद्र में उत्पन्न विदुर तहत अन्य मातंग व्यक्तियों के वेदादि अध्यन का उल्लेख इतिहास में मिलता है।

जिस प्रकार किसी कम बुद्दी वाले व्यक्ति को हम मुर्ख, मंदबुद्धि कहते हैं उसी प्रकार से शूद्र का अर्थ लेना चाहिये। शूद्र कोई जन्म आधारित जाति नहीं है शास्त्र में यह कहीं पर उन लोगो के वर्ग के लिये कहा जाता है जो ज्ञान को प्राथमिकता न देकर धूर्तता, मूर्खता आदि में लिप्त मनुष्य होते हैं या किसी उद्दण्ड, स्वार्थी इत्यादि दुर्गुणों वाले व्यक्ति के लिये कहा जाता है। यदि आप शास्त्र में कहीं शूद्र पढते हैं तो वहां वो किस प्रसंग में वर्णित है उस पर गौर कीजिये न कि उसको तथाकथित आधुनिक जाति समझकर भ्रान्ति में पडिये। वर्ण व्यवस्था को जन्म आधारित बनाने वाले व्यक्ति पण्डित या ब्राह्मण नहीं स्वयं शूद्र हैं। उदाहरण के लिये एक चोर, डाकू, स्वार्थी, धूर्त, मंदबुद्धि आदि व्यक्तियों (शूद्रों) के पुत्रों अथवा पुत्रियों को भी विद्या अध्यन का पूर्ण अधिकार है क्योंकि यह सम्भव है माता-पिता के दुर्गुणों में लिप्त होने पर भी या मंदबुद्धि होने पर भी पुत्र में ये दोष न हों और वह विद्याध्यन का अभिलाषी हो। इसीलिए शूद्रों पर अत्याचार को शास्त्र को दोष न देकर सत्य से अवगत होइये। एक मुर्ख मुस्लिम व्यक्ति ने शास्त्र पर यह आरोप लगाया कि बचपन में शूद्र का उपनयन संस्कार वर्जित है। जिसने आरोप लगाया वो तो शूद्र, धूर्त या जेहादी है किन्तु विचारवान व्यक्ति को समझना चाहिये शास्त्र में ऐसा क्यों लिखा है –इसका कारण है उपनयन संस्कार में बालक को प्रतिज्ञा करायी जाती है कि वह अखण्ड ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए विद्या की प्राप्ति करेगा। शूद्र के लिये यह संस्कार वर्जित है –इसका कारण यह है कि बचपन में ही यदि बालक अत्यन्त उद्दण्ड, प्रमादी, आलसी है या मंदबुद्धि है तो उसको यहाँ शूद्र कहा गया है और उसकी प्रतिज्ञा में संदेह रहता है। ऐसा नहीं है कि एक तीव्र बुद्दी वाला बच्चा प्रत्येक बात पर खरा उतरता है किन्तु फिर भी उसके लिये भविष्य में ऐसी सम्भावना कम होती है।

कुछ महानुभव तैतरीय संहिता के ‘शूद्रो यज्ञेअनवक्लृप्तः’ सन्दर्भ के आधार पर कहा करते हैं कि यज्ञ में शूद्र असिद्ध है, असमर्थ है; उसे यज्ञ में सम्मलित नहीं किया जाना चाहिये। तो महानुभवों यह प्रसंग ऐसे व्यक्तियों के लिये है, जो प्रयत्न करने पर भी वेद आदि का अध्यन नहीं कर पाते हैं। इसी कारण मन्त्रों का शुद्ध उच्चारण नहीं कर सकते, पर यज्ञों के अवसर पर मन्त्रों के अनाप-शनाप उच्चारण के दुस्साहस का प्रयास करते हैं। ऐसे व्यक्तियों को मन्त्रोच्चारयिता के रूप में यज्ञों में भाग लेना निषिद्ध किया गया है। यह निषेध शूद्रवर्ण के विद्या में अधिकार न होने का प्रतिपादन नहीं करता। विद्या अध्यन आदि के लिये प्रत्येक व्यक्ति को पूर्ण अवसर दिया जाना शास्त्रसम्मत है। यदि अनधीतशास्त्र व्यक्ति भी ब्रह्माविद्या-विषयक या किसी भी विषय पर उपदेश चाहता है तो वह ले सकता है; इसमं किसी प्रकार की शास्त्रीय बाधा नहीं है। जो व्यक्ति यह समझते हैं कि शूद्र के विद्याध्यन का शास्त्र निषेध करता है, वस्तुतः वो भ्रान्ति में हैं। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि छान्दोग्य के उक्त प्रसंग में शूद्र-पद का प्रयोग शूद्रवर्ण की भावना से नहीं है। क्योंकि रैक्व ऋषि द्वारा जानश्रुति के यहाँ विद्या का उपदेश दिया जाना सिद्ध है। उपनिषद के अनुसार प्रथम जैसे शूद्र कहकर उपदेश देने से नकार किया , ऐसे ही पुनः ‘शूद्र’ कह कर उपदेश दिया। वैदिक साहित्य में कोई ऐसा उल्लेख उपलब्ध नहीं है जिससे मनुष्य के किसी निर्धारित वर्गविशेष को विद्या आदि में अनाधिकारी सूचित होता हो।

शेष आगे ...

4 टिप्‍पणियां:

राहुल पंडित ने कहा…

पूज्य बड़े भाई ,बहुत अच्छा कार्य कर रहे हैं.वेदों का वास्तविक मतलब हमारे हिन्दू समाज में पहुचने के लिए बधाई.जो लोग वेदों को बाटने वाला और ब्रह्मिण परस्त मानते हैं..उनको जानकारी मिलेगी.

nitin tyagi ने कहा…

good article

chandra shekher ने कहा…

read yatharthgeeta.com

madansharma ने कहा…

पूज्य बड़े भाई ,बहुत अच्छा कार्य कर रहे हैं. लोगो के ऊपर झूठ का ऐसा चश्मा चड़ा है उनको सत्य बताओ तो असत्य लगेगा और असत्य बताओ तो सत्य लगेगा.मुर्ख लोगो ने धर्म ग्रन्थों का मनमाना अर्थ किया किसी ने यज्ञों में बलि चड़ाई, किसी ने वीभत्स यौन क्रीड़ा का भैरव चक्र चलाया, उन्मुक्त यौनक्रियाओं को वेदोक्त बताया, उल्टी-सीधी बकवास बाजी लिखी, संस्कृत में अपने हित के लिए मन्त्र गढ़े गये.
वेदों का वास्तविक मतलब हमारे हिन्दू समाज में पहुचने के लिए बधाई.