शुक्रवार, 11 जून 2010

सुवचन-सुधा

११.) अर्थसम्पप्रकृतिसम्पदं करोति ।

अर्थ-सम्पत्ति ‘प्रकृति-सम्पत्ति’ (अमात्य, सेना, मित्र आदि सम्पत्ति)को उत्पन्न करने वाली होती है

१२.) प्रकृतिसम्पदा ह्मानायकमपि राज्यं नीयते ।

प्रकृतिसम्पत्ति के द्वारा नेतारहित राज्य का भी सञ्चालन किया जा सकता है

१३.) प्रकृतिकोपस्सर्वकोपेभ्यो गरीयान् ।

‘प्रकृतिकोप’ सब कोपों से बलवान होता है।

१४.) अविनीतस्वामिलाभः श्रेयान् ।

विनयहीन स्वामी के लाभ से , स्वामी का लाभ न् होना ही अच्छा है।

१५.) संपाद्यात्मानमन्विच्छेत्सहायवान् ।

अपने आपको शक्ति-सम्पन्न बनाकर, फिर सहायकों की इच्छा करो।

१६.) नासहायस्य मन्त्रनिश्चयः ।

सहायकहीन राजा के मन्त्र(विचार) का, कभी निश्चय नहीं हो सकता।

१७.) नैकं चक्रं परिभ्रमयति ।

एक पहिया कभी गाड़ी को घुमा नहीं सकता।

१८.) सहायस्समसुखदुःखः ।

सहायक वही होता है, जो अपने सुख और दुःख में बराबर का साथी रहे।

१९.) मानि प्रतिमानिनमात्मनि द्वितीयं मन्त्रमुत्पादयेत् ।

मानी पुरुष , अपने समान दूसरे मानि पुरुष को ही अपना सलाहकार बनावे।

२०.) अविनितं स्नेहमात्रेण न् मन्त्रे कुर्वीत् ।

विनयपुरुष को , केवल स्नेह के कारण, कभी मन्त्र (सलाह या विचार) करने में सम्मलित न करे।

२१.) श्रुतवन्तमुपधाशुद्धं मंत्रिणं कुर्वीत् ।

विद्वान तथा सब तरह से परीक्षा किये हुये शुद्धह्रदय पुरुष को मन्त्री बनावे।

2 टिप्‍पणियां:

PARAM ARYA ने कहा…

उत्तम विचार । देश की ज्वलंत समस्या , मुसलमान पर भी ऋषि के विचार प्रकाशित करेँ । 14 वेँ समुल्लास से आरंभ करेँ ।

आचार्य जी ने कहा…

बेहद प्रभावशाली अभिव्यक्ति।

(आईये एक आध्यात्मिक लेख पढें .... मैं कौन हूं।)