रविवार, 26 सितंबर 2010

भारतीय सनातन धर्म और चार्वाक, जैन-बोद्ध दर्शन

भारतीय ६ धर्म-शास्त्रों जिनको वेदांग भी कहा जाता है को लक्ष्य कर उनके पारस्परिक अविरोध को प्रकट करने के लिये इससे पूर्व का लेख(भारतीय सनातन धर्म और उसके दर्शन-शास्त्र ) लिखा गया था। अब हम इस लेख में भारतीय नास्तिक दर्शनों का विचार करते हैं।

नास्तिक दर्शन(चार्वाक)— यदि हम भारतीय तथाकथित नास्तिक दर्शनों का गम्भीरता से विवेचन और परिक्षण करें तो इन दर्शनों में भी सनातन वैदिक धर्म से कोई उत्कट और मूलभूत विरोध की भावना नहीं पाई जाती है, यह पर्याप्त सीमा तक स्पष्ट हो जाता है। वैदिक या आस्तिक दर्शन के समान चार्वाक अथवा जैन-बोद्ध दर्शनों द्वारा चेतन-अचेतन रूप में तत्वों का विवेचन किया गया है।

चार्वाक दर्शन की अचर एवं जड़ चेतन जगत का मूल आधार तत्व केवल जड़ है; तब उसका तात्पर्य केवल इतने अर्थ में है कि इस लोक में हमारी सुख-सुविधा और सब प्रकार के अभ्युदय के लिये सर्वप्रथम जड़ तत्व की यथार्थता और उसकी प्राणी कल्याणकारी उपयोगिता को जानना परम आवश्यक है, उसकी उपेक्षा कर संसार में हमारा सुखी रहना सम्भव न होगा। इस मान्यता के विरोध में चार्वाकदर्शन के सामने जब यह आशंका प्रस्तुत की जाती है कि क्या जड़ तत्व से अतिरिक्त चेतनतत्त्व का नित्य अस्तित्त्व नहीं माना जाना चाहिये ? तब इसके समाधान में चार्वाक दर्शन का यही कहना है , कि चेतन के अस्तित्त्व से उसे कोई नकार नहीं है , पर वह नित्य है, या कैसा है , कहाँ से आता है , कहाँ जाता है ? इत्यादि विचार-मन्थन उस समय तक अनपेक्षित है, जब तक उन तत्वों की यथार्थता व उपयोगिता को नहीं जान लिया जाता , जिन पर हमारा वर्तमान अस्तित्व निर्भर करता है। मरने के बाद क्या होगा ? इसकी अपेक्षा यह अधिक आवश्यक है कि हम जीवित कैसे रह सकते हैं। वर्तमान जीवन के आधारभूत जड़तत्व की रहस्यमय वास्तविकता व उपयोगिता के जान लेने से पहले यदि हम ऐसा मान लें , कि चेतन तत्व जड़ से ही उभर आता है , तो इसमें क्या हानि है ? चार्वाकदर्शन का यह मन्तव्य ‘अन्तिमेत्थम्’ नहीं है, मानव समाज के विचार-प्रवाह और कर्तव्य का यह एक स्तर है, इसकी उपेक्षा किया जाना मंगल का मूल नहीं है। यह प्रत्यक्ष है , कि प्रायः मानव करता वही है, जो चार्वाकदर्शन बताता है; पर कहता वह है, जो उस दर्शन का विषय नहीं है, तब स्वभावतः संघर्ष की स्तिथि उत्पन्न हो जाती है।

जैन-बोद्ध दर्शन- चार्वाकदर्शन की अपेक्षा इन दोनों दर्शनों में यह विशेषता है, कि ये जड़तत्व से अतिरिक्त चेतन तत्व के स्वतन्त्र अस्तित्व का उपदेश करते हैं। यह सम्भावना की जा सकती है कि इन दर्शनों के मूल प्रवक्ताओं ने विचार की द्रष्टि से कुछ उन्नत जिज्ञासु जनों को तत्वज्ञान के इस स्तर का अधिकारी समझकर चेतन-अचेतन तत्वों का विवेचन प्रस्तुत किया हो। जैन दर्शन चेतन(आत्म) तत्व को जहाँ संकोच-विकासशील बताता है , दूसरा दर्शन उसे ज्ञान स्वरुप मानकर क्षणिक कहता है , और उसके निर्विकार भाव को अक्षुण बनाये रखना चाहता है। बोद्ध-दर्शन में अधिकारी स्तर की भावना से ज्ञानरूप अथवा विज्ञानरूप चेतन तत्व का विवेचन उस स्तिथि तक पहुंचा दिया गया है जहाँ यह प्रतिपादन किया जाता है, कि समस्त चराचर जड़-चेतन जगत उस ‘विज्ञान’ का ही आभास है , ब्रह्मा का अपना स्वतन्त्र अस्तित्व कुछ नहीं है, वस्तुभूत सत्तामात्र एक विज्ञान है, भले वह क्षणिक हो। यह सम्भव है, कदाचित मूल स्वरूप में उसका भी वस्तु भूत अस्तित्व न हो। इस प्रकार हम संसार के मूलतत्व की विवेचना व खोज करते एक रहस्यमय स्तिथि पर पहुंच जाते हैं। ये सब तत्व-विचार के विभिन्न स्तर हैं। सम्भवतः इनमें कोई एक ऐसा ठिकाना नहीं , जिसे ‘अन्तिमेत्थम्’ कहकर निश्चयरूप से वहां टिका जा सके। इससे उन-उन विचारों के मूल प्रवक्ताओं को अज्ञानी बताने का यहाँ हमारा तात्पर्य नहीं है ; वे वस्तुतः महाज्ञानी रहे होंगे, उनके वैसे उपदेश में लोक-कल्याण की भावना अधिक हो सकती है। फलतः चेतन-अचेतन का यह विवेचन जो इतने अनेक प्रकारों में प्रस्तुत हुआ है, इसमें परस्पर विरोध की भावना न होकर जिज्ञासु अधिकारी के कल्याण की भावना अधिक है।


आस्तिक-नास्तिक दर्शन के भेद का कारण ईश्वर अथवा ब्रह्मा-तत्व की मान्यता-अमान्यता कहा जा सकता है। आस्तिक दर्शन उसके अस्तित्व को सर्वतोभावेन स्वीकार करते हैं, जबकि दूसरे नहीं, इस्सी आधार पर उनका यह नाम-भेद हो गया है। दूसरा कारण है, वेद के प्रामाण्य को स्वीकार करना, न करना ; परन्तु यह पहले कारण पर आश्रित है। वेद को मानने वाले उसे ईश्वरीय ज्ञान कहते हैं , जिन्होंने ईश्वर को न माना , वे ईश्वरीय ज्ञान वेद को उसके प्रामाण्य को क्यों मानेंगे ? इस प्रसंग में तर्कपूर्ण विचार यह है कि तथाकथित नास्तिक दर्शन के मूल प्रवक्ताओं ने ईश्वर—अथवा ऐसी परम चेतन शक्ति, जो संसार का नियन्तरण करती है –के अस्तित्व का निषेध नहीं किया । उनकी रचनाओं से ऐसा अवगत होता है , कि उन्होंने किन्हीं विशेष परिस्तिथियों से बाधित होकर ऐसा प्रवचन किया । वे परिस्तिथियाँ चाहे जिज्ञासु-जनों की योग्यता पर आधारित हों , अथवा ईश्वर या वेद के मानने वालों द्वारा अपनी मान्यताओं को अन्यथा प्रस्तुत करने से पैदा हुई हों या तत्कालिक समाजिक प्रवृत्तियां आदि अन्य कारण रहे हों। ऐतिहासिक द्रष्टि से महाभारत के पश्चात एक वाममार्गी सम्प्रदाय वेदों के नाम पर यज्ञों में बलि, घृणित यौन-क्रीडाएं, मदिरापान इत्यादि सभी निन्दित कार्य करता है और उसका अस्तित्व आज भी अघोरी, झाड़-फूंक वाले, ईश्वर के नाम पर प्रसाद के रूप में मदिरा(दारु) आदि चढ़ाने वाले, चरस-गांजा नशा करने वाले लोगो के रूप में जीवित है। ये मुर्ख लोग ये सभी कार्य वेद और ईश्वर के नाम पर करते हैं जबकि सत्य के आस-पास भी ये लोग नहीं है। इसीलिए यह निश्चित तौर पर कहा जा सकता है कि इस वाममार्गी सम्प्रदाय, मुर्ख और स्वार्थी लोगो से आहत होकर चार्वाक और जैन-बोद्ध दर्शनों का उदय हुआ है। उनके मूल प्रवक्ताओं ने समाज कल्याण हेतु समझाया कि अपने वर्तमान जीवन को सुधारों, सबके कल्याण के लिये सदाचार पर ध्यान दो, परस्पर सहानुभूति से रहना सीखो उससे यह हमारा लोक सुखमय होगा और परलोक भी। ऐसे आचरण से ईश्वर तक भी पहुंचा जा सकता है। इसकी अपेक्षा तब रही होगी, वस्तुतः इसकी अपेक्षा सदा रहती है। यदि गम्भीरता से परिक्षण करते हैं तो उन प्रवक्ताओं का तात्पर्य लोक-कल्याण में अधिक ईश्वर अस्तित्व के नकार में कम प्रतीत होता है। तब ऐसे में विरोध की भावना इन दर्शनों में कहाँ रह जाती है।

अनन्तर काल में उन-उन विचारों के अनुयायियों ने अपने आदिप्रवक्ता के तात्पर्य को यथार्थ रूप में न समझते हुए परस्पर विरोध की भावना को उभारने में सहयोग दिया। धीरे-धीरे ऐसी प्रवृत्तियां बढ़ती गईं; कालान्तर में उन्होंने विभिन्न वर्ग, सम्प्रदायों अथवा पन्थ का रूप धारण कर लिया, तब परस्पर विरोधी अखाड़ों ने स्थायिता प्राप्त कर ली। प्रत्येक विचार के व्याख्याकार विद्वानों ने उसी रूप में अपने विषय के विशाल साहित्य का सृजन कर लिया। उसमें कारण चाहे उनके निजी स्वार्थ रहे हों अथवा अन्य कारण पर आज हम उसी आदर्श की आधार पर मूल तत्व-विवेचना को परखने का प्रयास करते हैं। निश्चित रूप में हम उद्देश्य से बहुत दूर भटक गये हैं। आदि-प्रवक्ताओं के जन-कल्याणी लक्ष्य-विचार इन काली-पीली आँधियों में तिरोहित हो चुके हैं।

3 टिप्‍पणियां:

गजेन्द्र सिंह ने कहा…

अच्छी रचना ........

पढ़िए और मुस्कुराइए :-
आप ही बताये कैसे पार की जाये नदी ?

Namaskar Meditation ने कहा…

नास्तिक का मतलब जो एक में अस्त नहीं हुआ | यानी जो एक की सत्ता नहीं मानता है | यानी जिसने अभी घुटने नहीं टेके हैं और जो निरंतर खोज में लगा है |
आस्तिक का मतलब जो एक को मानता है | यानी जिसने एक की सत्ता मान ली | जिसकी खोज पूरी हो गई है और उसने अपने आप को एक के प्रति समर्पित कर दिया है |
अब चार्वाक - चार्वाक का मतलब होता है चार वाक्य | यावत् जीवेत सुख जीवेत ऋणं कृत्वा घृतं पिवेत | भस्मी भूतस्य देहस्य पुनरागमन कुत: ||
इसमें क्या गलत है | सभी लोग सुख की चाह करते हैं | और इन चार वाक्यों में उसी सुख को प्राप्त करने का रास्ता है | आज दुनिया भी उसी रास्ते पर चल रही है | लोन और क्रेडिट कार्ड क्या है ऋण है | इसी के बल पर तो दुनिया में लोग सुखी हैं |

सुज्ञान सुराणा ने कहा…

वेदिक दर्शन में ईश्वर को सर्वोच्च सत्ता मानकर सम्पूर्ण जगत का नियंत्रण कर्ता माना गया है जबकि जैन दर्शन में ईश्वर को सर्वोच्च तो माना गया है किन्तु नियंत्रणकर्ता नहीं माना गया क्यूंकि कर्म कि प्रधानता मानी गई है| ईश्वर यदि सर्वोच्च सत्ता है भी तो भी उसका नियंत्रण तो कर्म आधार पर ही हो सकता है| इसलिए ईश्वर को अक्रिय माना गया है|जो आत्मा राम कृष्ण बुद्ध महावीर में है वही आत्मा एक साधारण प्राणी में भी मानी गई है सिर्फ कर्मों के आधार पर जीव संसार में भ्रमण कर्ता है|इसके विपरीत वेदिक दर्शन अवतारवाद को मानता है जो इश्व्वर द्वारा धर्म की रक्षा के लिए लिया जाता है|ईश्वर को इसके लिए शरीर धारण करने की क्या आवश्यकता हे?यदि ईश्वर क्रियावान है और सभी को नियंत्रित करता है तो कर्म का क्या महत्त्व है? और यदि कर्म के आधार पर फल मिलता है तो फिर ईश्वर की अधीनता क्यूँ स्वीकारी जाये?