मंगलवार, 28 सितंबर 2010

इन्द्र और अहल्या की कथा

सुर्य्यरश्पिचन्द्रमा गन्धर्वः।। इत्यपि निगमो भवति । सोअपि गौरुच्यते।।
जार आ भगः जार इव भगम्।। आदित्योअत्र जार उच्यते, रात्रेर्जरयिता।।


उपरोक्त सूक्त के आधार पर एक कथा है इन्द्र और अहल्या की जिसको मूढ़ लोगो ने अनेक प्रकार बिगाड़ के लिखा है। जोकि संक्षिप्त में इस प्रकार है-

'देवों का राजा इन्द्र देवलोक में देहधारी देव था। वह गोतम ऋषि की स्त्री अहल्या के साथ जारकर्म किया करता था। एक दिन जब उन दोनों को गोतम ऋषि ने देख लिया, तब इस प्रकार शाप दिया की हे इन्द्र ! तू हजार भगवाला हो जा । तथा अहल्या को शाप दिया की तू पाषाणरूप हो जा। परन्तु जब उन्होंने गोतम ऋषि की प्रार्थना की कि हमारे शाप को मोक्षरण कैसे व कब मिलेगा, तब इन्द्र से तो कहा कि तुम्हारे हजार भग के स्थान में हजार नेत्र हो जायें, और अहल्या को वचन दिया कि जिस समय रामचन्द्र अवतार लेकर तेरे पर अपना चरण लगाएंगे, उस समय तू फिर अपने स्वरुप में आ जाओगी।'

इस प्रकार यह कथा बिगाड़ कर लिखी गयी है। सत्य ग्रंथों में ऐसा नहीं है । सत्य इस प्रकार है --

(इन्द्रागच्छेती०) अर्थात उनमें इस रीति से है कि सूर्य का नाम इन्द्र ,रात्रि का नाम अहल्या तथा चन्द्रमा का गोतम है। यहाँ रात्रि और चन्द्रमा का स्त्री-पुरुष के समान रूपकालंकार है। चन्द्रमा अपनी स्त्री रात्रि के साथ सब प्राणियों को आनन्द कराता है और उस रात्रि का जार आदित्य है। अर्थात जिसके उदय होने से रात्रि अन्तर्धान हो जाती है। और जार अर्थात यह सूर्य ही रात्रि के वर्तमान रूप श्रंगार को बिगाड़ने वाला है। इसीलिए यह स्त्रीपुरुष का रूपकालंकार बांधा है, कि जिस प्रकार स्त्रीपुरुष मिलकर रहते हैं, वैसे ही चन्द्रमा और रात्रि भी साथ-२ रहते हैं।

चन्द्रमा का नाम गोतम इसलिए है कि वह अत्यन्त वेग से चलता है। और रात्रि को अहल्या इसलिये कहते हैं कि उसमें दिन लय हो जाता है । तथा सूर्य रात्रि को निवृत्त कर देता है, इसलिये वह उसका जार कहाता है।

इस उत्तम रूपकालंकार को अल्पबुद्धि पुरुषों ने बिगाड़ के सब मनुष्य में हानिकारक मिथ्या सन्देश फैलाया है। इसलिये सब सज्जन लोग पुराणोक्त मिथ्या कथाओं का मूल से ही त्याग कर दें।
(ऋग्वेदभाष्यभूमिका से उद्दृत)

18 टिप्‍पणियां:

Dev ने कहा…

dhanya waad guru ji...ye bat sach main bahaut hila dene wali hain..ki itna corrupt kar dia.. logo ne..isko..
but can u tell me...ki fir ismei ram ka pravesh kaha se hua..unko kaha se link kar dia..or ramayan program main bhi dikhaya tha aisa jabki unhonei sources main valmiki or tulsidas ki ramayan ka ulekh kia hai.. kriptya ispar prakash daley..

Dev ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
Dev ने कहा…
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Dev ने कहा…
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Dev ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
Gourav Agrawal ने कहा…

मित्र,
आपकी बात को सम्मान सहित प्रणाम करता हूँ
कृपया इस बारे में भी थोडा सा मार्गदर्शन करें
http://vramayan.blogspot.com/2009/10/13.html
ये प्रश्न जिज्ञासा है बस , अन्यथा ना लें

Gourav Agrawal ने कहा…

.... उपरोक्त टिप्पणी अगर विषय या सन्दर्भ से बाहर लगे तो आप मेरी इन दोनों टिप्पणियों को हटा सकते हैं
आपका टिपण्णी हटाना मेरे लिए संकेत जैसा होगा की मेरा प्रश्न विषय से बाहर है

आभार :)

सौरभ आत्रेय ने कहा…

@Dev
हिन्दुओं की मति भ्रष्ट होने में असत्य ग्रन्थों का बहुत बड़ा हाथ है. मूर्खों ने ऐसी व्यभिचार भरी कहानिया बना दी हैं जिनको परिवार में पढ़ते भी शर्म आये यदि ये कहानियाँ सत्य होती तो मैं तो कब का यह सनातन धर्म त्याग चुका होता.

श्रीराम हम सबके आदर्श वेदोक्त महापुरुष हैं पूजनीय हैं अर्थात सत्कार योग्य हैं किन्तु वाल्मीकि रामायण में ऐसी बकवास प्रक्षिप्त है अर्थात मिलावट है, रामायण, महाभारत में तो अब प्रक्षिप्त श्लोको की संख्या इतनी हो चुकी है कि सत्य से अवगत होना बहुत ही मुश्किल हो गया है. द्रोपदी के पांच पति, सीता की अग्नि परीक्षा इत्यादि भी सब बकवासबाजी हैं.लेकिन लोगो के ऊपर झूठ का ऐसा चश्मा चड़ा है उनको सत्य बताओ तो असत्य लगेगा और असत्य बताओ तो सत्य लगेगा.

महाभारत के पश्चात बहुत से मुर्ख लोगो ने धर्म ग्रन्थों का मनमाना अर्थ किया किसी ने यज्ञों में बलि चड़ाई, किसी ने वीभत्स यौन क्रीड़ा का भैरव चक्र चलाया, उन्मुक्त यौनक्रियाओं को वेदोक्त बताया, उल्टी-सीधी बकवास बाजी लिखी, संस्कृत में अपने हित के लिए मन्त्र गढ़े गये. समाज जब अत्यन्त आहत हो गया इनसबसे तो वेड निन्दकों के रूप में चार्वाक,जैन-बोद्ध आदि नास्तिक मतों का उदय हुआ जिनका मुख्य उद्देश्य इन धर्मग्रन्थों के नाम पर गतिविधियों से भटके हुए समाज को रास्ते पर लाने का अधिक था किन्तु बाद में इन सम्प्रदायों के अनुयायिओं ने भी ईश्वर के नाम पर नंगी मुर्तिया गढ़ ली और वैदिक पुस्तकों को नष्ट करने का अभियान चलाया जिसके विपरीत और लोगो ने भी नये-२ भगवान गढ़ कर इस प्रतिस्पर्धा को बढाया और नयी-२ कहानियां रच दी, इस भगवान बनाने में उन्होंने महान एतिहासिक आदरणीय पुरुषों का सहारा भी लिया और उनकी भी मूर्तियां गढ़वा कर लोगो से पुजवाया. किसी ने कहा यह धरती बैल के सींघ पर टिकी है किसी ने कहा पानी में है किसी ने कहा सूअर की थूथन पर है आदि अनेक मिथ्या बातों को वेदोक्त बताकर ऋषियों के नाम से पुस्तकें बना डाली, जिस से लोगो से यह कह सकें यह हम नहीं कह रहे ये तो महर्षि व्यास या वाल्मीकी आदि कह रहे हैं.

जब यह सब अपने चरम पर था तब एक दक्षिण में शंकराचार्य नाम के विद्वान हुए जिन्होंने परिस्तिथि को देख कर कहा कि कहाँ तुम इन मूर्तियों में ईश्वर ढूँढ रहे हो वो हम स्वयं ही हैं. उन्होंने अनेक शास्त्रार्थ किये और देश को उस स्तिथि से निकालने का भरसक प्रयास किया जिसमें काफी सीमा तक वो सफल भी हुए किन्तु उनका परिस्तिथिवश यह कहना कि ईश्वर हम स्वयं हैं जोकि वेदोक्त नहीं है,उनके अनुयायियों ने उसका अक्षरशः पालन करते हुए अपने को भगवान मानना शुरू कर दिया और अपने को ही लोगो से पुजवाने लगे. जिसका नतीजा तुम आज भी देख सकते हो कितने ही गुरु बनकर अपने को ईश्वर बनवाकर पुजवाते हैं.

तो कहने का तात्पर्य यह है मिलावट किस सीमा तक हो चुकी है इस बात का अभी आपको अंदाज़ा नहीं है.

@Gaurav Agrawal
उपरोक्त विवरण से आपको भी अपनी बात का उत्तर मिल गया होगा यदि अब भी संदेह है तो निसंकोच पूछिये.

Gourav Agrawal ने कहा…

मित्र

@किन्तु वाल्मीकि रामायण में ऐसी बकवास प्रक्षिप्त है अर्थात मिलावट है, रामायण, महाभारत में तो अब प्रक्षिप्त श्लोको की संख्या इतनी हो चुकी है कि सत्य से अवगत होना बहुत ही मुश्किल हो गया है.

क्या गीता इस मिलावट से बची हुयी है ??

@द्रोपदी के पांच पति, सीता की अग्नि परीक्षा इत्यादि भी सब बकवासबाजी हैं.

हम युधिष्ठिर , अर्जुन, [पांचो भाइयों] , द्रौपदी चीर हरण को कैसे परिभाषित करें ??

इनके बारे में अपने विचार बताएं , आप इनके अध्ययन से कितने सहमत हैं
http://bksinha.blogspot.com/2009/04/blog-post.html


क्या सभी चेनलों पर आने वाले धार्मिक धारावाहिकों .... जो ना जाने कितने रेफरेंस अपने शुरुआत और अंत में बताते हैं , को पूरी तरह इग्नोर करना चाहिए ??

हनुमान के संजीवनी बूटी लाने के बारे में आपके विचार क्या हैं ??, क्या ऐसा हुआ था ??

अभी भी श्रीलंका में एक पर्वत है जहां के पेड़ पौधे वहां सबसे अलग हैं ..ये माना जाता है , वो वही पर्वत है जो हनुमान उठा कर लाये थे , इस बारे में भी बताएं ??

स्वामी विवेकानंद के बारे में आपके क्या विचार हैं ??

सही ज्ञान किस ग्रन्थ / पुस्तक में मिल सकता है
प्राथमिकता
१. जो नेट पर उपलब्ध हो और हिंदी या अंग्रेजी में हो
२. कोई सा भी किसी भी भाषा में हो चलेगा


मेरे प्रश्नों में मूर्खता झलके तो उसे पूर्वाग्रह नहीं अज्ञान समझिएगा


पिछले उत्तर के लिए आपका ह्रदय से धन्यवाद देता हूँ

Gourav Agrawal ने कहा…

राम के दस हजार साल तक राज्य करने की बात के बारे में भी अपने विचार बताएं

सौरभ आत्रेय ने कहा…

@Gaurav Agrawal

क्या गीता इस मिलावट से बची हुयी है ??
गीता आज इतनी लोकप्रिय है कि यदि मैं यह कहूँ कि कुछ श्लोकों में विरोधाभास है तो लोग मुझे मुर्ख और घमण्डी कहेंगे. किन्तु में आपको साक्षात् प्रमाण दे सकता हूँ.

@हम युधिष्ठिर , अर्जुन, [पांचो भाइयों] , द्रौपदी चीर हरण को कैसे परिभाषित करें ??

द्रोपदी का सभा अपमान हुआ होगा यह निश्चित है और श्रीकृष्ण ने उनके सम्मान बचाया होगा यह भी हुआ होगा किन्तु असम्भव तरीके से यह मुमकिन नहीं है. आपके पांच भाइयों को परिभाषित करने से क्या तात्पर्य है?

@इनके बारे में अपने विचार बताएं , आप इनके अध्ययन से कितने सहमत हैं
http://bksinha.blogspot.com/2009/04/blog-post.html


फुर्सत में पढ़कर ही किसी के बारे में कुछ कह सकता हूँ. वैसे मेरा यहाँ अपने को श्रेष्ठ साबित करना नहीं वरन सत्य बताने का प्रयास करना मात्र है जोकि तर्कपूर्ण हो.

@क्या सभी चेनलों पर आने वाले धार्मिक धारावाहिकों .... जो ना जाने कितने रेफरेंस अपने शुरुआत और अंत में बताते हैं , को पूरी तरह इग्नोर करना चाहिए ??

जो सत्य हो उसको ग्रहण करना चाहिए जो असत्य उसको छोड़ देना चाहिये.

@हनुमान के संजीवनी बूटी लाने के बारे में आपके विचार क्या हैं ??, क्या ऐसा हुआ था ??

हनुमान संजीवनी बूटी लेकर आये होंगें यह सम्भव है किन्तु पर्वत का उठाकर लाना असम्भव और अतार्किक है.

@अभी भी श्रीलंका में एक पर्वत है जहां के पेड़ पौधे वहां सबसे अलग हैं ..ये माना जाता है , वो वही पर्वत है जो हनुमान उठा कर लाये थे , इस बारे में भी बताएं ??

एक स्थान से पेड़-पौधे लाकर दुसरे स्थान या देश में लगाना कोई बड़ी बात नहीं है यह आज भी होता है तो उस समय होने में क्या फर्क पड़ता है.

@स्वामी विवेकानंद के बारे में आपके क्या विचार हैं ??
महान व्यक्तित्व के स्वामी थे ज्ञानी पुरुष रहे हैं किन्तु वो शंकर मत से प्रभावित थे उन्होंने मूल वेदान्त सिद्धान्त का प्रसार न करके शंकरमत का प्रचार किया था. देखो मेरा यहाँ विवेकानंद और शंकराचार्य को अल्पबुद्धि कहने से मतलब नहीं है वो निश्चित ही श्रेष्ठ और अत्यन्त बुद्धिमान पुरुष रहे हैं और वेदों के पूर्ण पक्षधर रहे हैं किन्तु जहाँ शंकराचार्य ने किसी परिस्तिथिवश नया सिद्धान्त चलाया था और वेदों को ईश्वर प्रणीत माना है वहीँ उन्हीके मत से प्रभावित विवेकानंद जी ने उनके सिद्धान्त का पालन तो ज्यूँ का त्यूं किया है पर वेदों को विभिन्न ऋषियों द्वारा समय-२ पर किया हुआ ज्ञान का संग्रह बताया है जोकि उनसे पहले किसी भी महापुरुष, ऋषि या आचार्य ने कभी ऐसा नहीं कहा. खैर इन लोगो ने निश्चित ही अच्छे कार्य और विद्वतापूर्ण भाषण किये हैं, बाकी सब तो एक धर्म के बारे में छोटा सा आपसी मतभेद है जिसको आम जनता जानती तक नहीं है तो उस छोटे से मतभेद के कारण उनकी विद्वता और अच्छे कार्य के बारे में कोई सन्देह नहीं है.

@सही ज्ञान किस ग्रन्थ / पुस्तक में मिल सकता है
प्राथमिकता
१. जो नेट पर उपलब्ध हो और हिंदी या अंग्रेजी में हो
२. कोई सा भी किसी भी भाषा में हो चलेगा


मैं तो पुस्तकों से ही पढता हूँ, आप यदि धर्म के बारे में जाने के अधिक उत्सुक हैं तो सबसे पहले वैशेषिकदर्शन, उसके बाद न्याय दर्शन, फिर सांख्य और फिर योग दर्शन पढ़िए और उन सबके पश्चात ब्रह्मसूत्र अर्थात वेदान्त दर्शन पढ़िए. आचार्य उदयवीर शास्त्री भाष्याकृत पढ़ सकते हैं क्योंकि उन्होंने इनका भाष्य बिना पूर्वाग्रस्त हुए निष्पक्ष किया है.

कभी भी जीवन यदि कुछ भी कहीं से किसी के द्वारा लिखा हुआ पढ़े तो जब तक बात तार्किकता के आधार पर प्रमाणित न हो बिलकुल स्वीकार न करें. हाँ यदि समझ में कुछ नहीं आता है किसी विद्वान जोकि पूर्वाग्रस्त न हो उससे समझ सकते हैं.
राम के दस हजार साल तक राज्य करने की बात के बारे में भी अपने विचार बताएं

असम्भव और असत्य है. दस हजार साल तक किसी भी व्यक्ति के जीवित रहने का आज तक कोई प्रमाण नहीं है चाहे वो कितना ही आदरणीय क्यों न हो.

Gourav Agrawal ने कहा…

मित्र,
मेरी जिज्ञासाओं के समाधान के लिए आभार आपका

@किन्तु में आपको साक्षात् प्रमाण दे सकता हूँ.

मैं अवश्य जानना चाहूँगा ,
साथ ही ये भी की गीता की सबसे विश्वसनीय व्याख्या किसने की है , क्या वो कहीं उपलब्ध है ??
@ आपके पांच भाइयों को परिभाषित करने से क्या तात्पर्य है?

पिछले उत्तर में आपने कुछ ये कहा था

@द्रोपदी के पांच पति, सीता की अग्नि परीक्षा इत्यादि भी सब बकवासबाजी हैं.

तो मैं ये मानता हूँ की अक्सर एक स्त्री के अंतरमन में इनकी यही परिभाषा होती होगी [द्रोपदी के पांच पति = युधिष्ठिर , भीम , अर्जुन , नकुल , सहदेव ] अगर ये सही परिभाषा नहीं है तो इनको द्रोपदी से किस तरह जुडा हुआ देखेंगे ?

@ वैसे मेरा यहाँ अपने को श्रेष्ठ साबित करना नहीं.....

नहीं नहीं मित्र मैं ऐसा नहीं सोच रहा ... मुझे इनकी अधिकतर बातें कुछ तर्कपूर्ण लगी इसलिए आपके विचार भी जानना चाहता हूँ

@कभी भी जीवन यदि कुछ भी कहीं से किसी के द्वारा लिखा हुआ पढ़े तो जब तक बात तार्किकता के आधार पर प्रमाणित न हो बिलकुल स्वीकार न करें. हाँ यदि समझ में कुछ नहीं आता है किसी विद्वान जोकि पूर्वाग्रस्त न हो उससे समझ सकते हैं.

बिलकुल सहमत हूँ मित्र , इसीलिए सबके मत जानने में रूचि लेता रहा हूँ

एक प्रश्न और

क्या हठ योग से "गप्प माने जाने वाले" कार्य जैसे सालों तक तपस्या , जल, अग्नि आदि पर नियंत्रण किया जा सकता है ?

माना जाता है की स्वामी लक्कड़ भारती नामक साधू को अत्याचारी अंग्रेजों ने जब अग्नि में बैठाया तो वे सुरक्षित वापस आ गए
और उस अग्नि में जितने मन लकड़ियों का प्रयोग हुआ उनकी भविष्यवाणी के अनुसार उतने ही साल बाद भारत आजाद हुआ
आप इस बारे मैं क्या सोचते हैं, ये संभव है ??

सौरभ आत्रेय ने कहा…

@Gaurav Agrawal

क्योंकि अभी मेरे पास फिलहाल गीता का कोई संस्करण नहीं है, कोई ऑनलाइन देखकर आपको श्लोक संख्याओं के साथ बताता हूँ.

आज जो यह गीता है ये महाराजा भोज के समय में कोई विद्वान हुए हैं उन्होंने महाभारत में कृष्ण के वक्तव्यों को लेकर महर्षि व्यास के नाम से बनायी हैं इसलिये इसमें परस्पर विरुद्ध बातों का भी समावेश है. वो विरुद्ध बातें आम जनता को प्रभावित नहीं कर पाती हैं लेकिन बुद्धिमान व्यक्ति उनको तार्किकता की कसौटी पर समझ सकता है. गीता की व्याख्या आदि शंकराचार्य द्वारा भी की गयी है वो सब व्याख्याओं में उत्तम है हालाँकि वो अपना मत या सिद्धान्त उसमें सशक्तता के साथ आरोपित करते हैं. किन्तु उनकी यह व्याख्या संस्कृत में है और उसका हिन्दी अनुवाद किसी और व्यक्ति के द्वारा किया हुआ मिलेगा.

द्रोपदी केवल युधिष्ठिर की पत्नी थीं, अर्जुन की उत्तरा थीं, भीम की हिडिम्बा और इसी प्रकार नुकुल-सहदेव की अपनी-२ पत्नियाँ थी. आर्यों में कभी इस तरह के अवैदिक व्यवहार कभी नहीं रहे एक पत्नी के एक ही समय में एक से अधिक पति अवैदिक, और निन्दित है.

सालो तक तपस्या का अर्थ यह नहीं होता कि व्यक्ति बिना भोजन, जल, निद्रा, स्नान आदि आवश्यक कार्य भी नहीं करता और समाधि में बैठा रहता है. ईश्वर का साक्षात्कार अर्थात मोक्ष अवस्था धारणा, ध्यान से होते हुए सबीज से निर्बीज समाधि पर पहुँचने पर प्राप्त होती है. इस अवस्था को अखण्ड ब्रहमचर्य का पालन करते हुए नित्य सन्धि बेला अर्थात सुबह और सायंकाल में निरंतर अभ्यास करके प्राप्त किया जाता है. भोजन और जल आदि का त्याग नहीं किया जाता हैं हाँ भोजन सात्विक हो इसका ध्यान अवश्य रखा जाता है क्योंकि सात्विक भोजन से मन पर नियंत्रण करने में और अच्छा स्वास्थ्य रखने में सहायता मिलती है. यह क्रम वर्षों तक रखने पर साधक के स्तर के अनुसार उसको सफलता मिलती है. यही वास्तव में सालो की तपस्या होती है.

हठ योग नाम का या इस प्रकार का कोई योग नहीं होता है. आप इसको योग दर्शन पढ़कर समझ सकते हैं.

जब साधक उपरोक्त वर्णित जैसी वर्षों की तपस्या और अपने कर्मानुसार निर्बीज समाधि अर्थात आत्म-साक्षात्कार अर्थात मोक्ष अर्थात निर्वाण अर्थात ईश्वर साक्षात्कार की अवस्था को प्राप्त हो जाता है तो उसके सामने जगत की सभी परतें और रहस्य खुल जाते हैं क्योंकि वह उस मूल तत्व को जान जाता है जो सबका आश्रय और नियन्ता है तो उस अवस्था में वह किसी भी वस्तु के मूल कारण को देख सकता है अर्थात वस्तु के मूल भूत कणों से लेकर उसके अस्तित्व तक की यात्रा वो साक्षात् देख सकता है तो यह सम्भव है वो प्राकृतिक वस्तुओं पर कुछ सीमा तक नियंत्रण कर सकता है किन्तु ईश्वर के बनाये प्राकृतिक नियमों का उलंघन कोई भी नहीं कर सकता है. इस अवस्था में कोई स्वार्थी, प्रमादी या किसी प्रकार से दूषित व्यक्ति नहीं जा सकता है क्योंकि ऐसा व्यक्ति अपने मन को नियंत्रित तक नहीं कर सकता तो इस आनंदमयी अवस्था तक क्या पहुंचेगा.

अग्नि में किसी भी व्यक्ति का शरीर जल जाएगा चाहे वो कितना बड़ा ही योगी क्यों न हो. आज सृष्टि विरुद्ध कार्यों के करने की कल्पना को ही लोग योगी समझ लेते हैं. जो आपने लक्कड़ भारती नामक साधू की बात की है वह झूठी, असत्य, अतार्किक व मनगढंत है. लोग नये भगवान गढ़ देते हैं जैसे अभी का वर्तमान उदाहरण है साईं बाबा नाम का नया भगवान खड़ा कर देना और उसके नामसे चमत्कारिक कहानियाँ बना देना.

nitin tyagi ने कहा…

great saurabh ji

Gourav Agrawal ने कहा…

आपके उत्तरों के लिए बहुत बहुत आभार मित्र , क्षमा चाहता हूँ बीच में चर्चा से गायब होने के लिए

मेरी कुछ जिज्ञासाएं और हैं

आप मूर्ती पूजा के बारे में क्या सोचते हैं , अगर इसे सही नहीं मानते तो कृपया कारण भी बताइये

आपके अनुसार "सत्यार्थ प्रकाश" की निंदा करने वालों की मूल परेशानी / मुद्दा और उसका खंडन क्या है ??

आप इश्वर आराधना के किस माध्यम [ध्यान , मन्त्र जप , आदि.. में से ] को श्रेष्ठ मानते हैं जो आज के जीवन में आसानी से शामिल हो सकता हो ??

सौरभ आत्रेय ने कहा…

@Gaurav Agrawal

यदि एक ही ईश्वर की उपासना मूर्ति पूजा के द्वारा हुई होती तो एक बार को वह स्वीकार भी हो जाती किन्तु लाखो भगवान बनाकर उनके नाम से मिथ्या कहानियाँ फैलाना लोगो में अन्धविश्वास और अज्ञान को फैलाता है, फिर उन भगवानो की मध्य परस्पर युद्ध की गाथा लिखना और भी मूर्खता पूर्ण लगता है.
लोग कहते हैं मूर्ति पूजा से ईश्वर का ध्यान लगाना आसान होता है, चलो एक बार को मान भी लें किन्तु इस से देश का नुक्सान अधिक होता है जैसे मूर्ति पूजा के कारण हिन्दू अनेक सम्प्रदायों में विभक्त हो गया है, इस जाति-व्यवस्था ऊंच-नीच आदि सामाजिक दोष भी मंदिरों के पंडो ने अपने हित के लिये फैलाये हैं तो गौर से देखोगे मूर्तिपूजा भी कारण है देश में लोगो के बीच में दीवारें खड़ी करने में.

हम बचपन से अनेक भगवानों के नाम से कितनी ही मिथ्या अवैज्ञानिक कहानिया सुनते आ रहे हैं और उसका अनुसरण भी समाज में देखते आ रहे हैं जैसे उदाहरण के तौर पर हम मूर्तियों का जलाभिषेक, दुग्धाभिषेक, तेलाभिषेक आदि जैसे कार्य बिना सोचे-समझे, बिना जाने भी लोगो के देखा देख करते आ रहे हैं. हमारी मन वही सोचता है जिसके हम अभ्यस्त हो चुके हैं, एक और उदाहरण मुसलमान कुरान का अनुसरण करते हैं, लोगो को मारना, इस्लाम कबूल करवाके जन्नत हासिल करने का ख्वाब देखते हैं, अब उनको कितना ही तर्क और ज्ञान से समझा लो कि यह सब गलत है लेकिन उनकी बुद्धि ऐसी मंझ चुकी है वो मानने को तैयार ही नहीं होते.

सत्यार्थप्रकाश पढ़कर अच्छे-अच्छों को झटका लग जाता है क्योंकि जो हम सुनते और देखते आ रहे हैं उनको तार्किकता और ज्ञान की कसौटी पर रखा गया है और सभी मिथ्या बातों का खण्डन उस में किया गया है चाहे वो किसी भी मत की क्यों न हो. सत्य को स्वीकारने वाले और केवल ज्ञान को प्राथमिकता देने वालों की संख्या कम ही होती है इसीलिये कुछ लोग इस पुस्तक को शत्रुता की द्रष्टि से देखते हैं. और ऐसा भी नहीं कि आर्य समाज के सभी जन बुद्धिमान हैं उसमें भी मुर्ख घुस आये हैं. और यह कहावत बिलकुल सही है गधा, गधा ही रहता है उसको केवल रैकने से मतलब होता है चाहे वो मूर्खो में बैठे या विद्वानों में, इसीलिए बात केवल वो ही माननी चाहिये जो प्रमाणित हो सके.

सत्यार्थ प्रकाश में नियोग और विवाह सम्बंधित बातों को लोग बिना पूर्णतयः जाने समझे विवादग्रस्त बनाने का प्रयास करते हैं. ज्ञानी पुरुष को समझने के लिये भी बुद्धिमान होना अनिवार्य है अन्यथा पाठक लेखक के मन्तव्य को न समझके अनर्गल बकवासबाजी करने लगता है और अपनी पूर्वाग्रस्त बुद्धि से अतार्किकता भरी बात बकने लगता है.

ईश्वर अराधना का सबसे सशक्त उपाय है सबसे पहले सदाचारी, निष्पाप और न्यायपूर्ण बनें, सुबह सवेरे प्राणायाम की सहायता से ध्यान लगाएं ईश्वर का जो स्वरुप सत्य शास्त्रों में वर्णित है उसका चिन्तन करें, अश्लीलता आदि निन्दित बातों से दूर रहें, मांस बिलकुल न खाएं, सात्विक भोजन ग्रहण करने का ही प्रयास करें --इन सब बातों से मन का निग्रह या एकाग्रिकरण होगा, इन्द्रिया अपने विषयों से हटकर अन्तर्मुखी होंगी जिससे मन विचारशून्य होकर ईश्वर में लगने लगेगा और वास्तविक आनन्द की झलक दिखाई देनी शुरू होगी. ऐसे ही निरंतर अभ्यास से आनंदमय ईश्वर के समीप आया जाता है. हम लोग सन्यासी तो हैं नहीं गृहस्थ हैं फिर भी जितना हो सके उतना तो प्रयास करना ही चाहिये अधिक नहीं तो ३०-३० मिनट सुबह शाम प्राणायाम के साथ ध्यान लगाना चाहिये और हमेशा साहसपूर्णता से सत्य और न्याय का साथ देना चाहिये जोकि हमारा धर्म है.

बेनामी ने कहा…

जिने मूर्ती को तराश कर बनाया तो उस मूर्ती को बनाने वाला बड़ा हुआ

बनाने वाला क्रियेटर हुआ

तो वह मूर्ती कैसे ईश्वर हो सकती है वो तो मनुष्य के द्वारा बनायी गयी है

यानी मतलब साफ है कि मनुष्य को बनाने वाला और कोई है

सुज्ञान सुराणा ने कहा…

सत्यार्थ प्रकाश पढने पर स्वामी जी का कुछ पूर्वाग्रह सा महसूस होता है क्यूँ कि बहुत से बातें धर्म विशेष से न लेकर अपने विरोध से ली गई लगती है|