बुधवार, 29 सितंबर 2010

इन्द्र- वृत्रासुर कथा

एक कथा वृत्रासुर की है जिसको मुर्ख लोगो ने ऐसा धर के लौटा है कि वह प्रमाण और युक्ति इन दोनों से विरुद्ध जा पड़ी है।

'त्वष्टा के पुत्र वृत्रासुर ने देवों के राजा इन्द्र को निगल लिया। तब सब देवता लोग बड़े भय युक्त होकर विष्णु के समीप गये, और विष्णु ने उसके मारने का उपाय बतलाया कि --मैं समुद्र के फेन में प्रविष्ट हो जाऊँगा। तुम लोग, उस फेन को उठाकर वृत्रासुर के मारना, वह मर जायेगा।'

यह पागलों की सी बनाई हुई पुराणग्रन्थों की कथा सब मिथ्या है।श्रेष्ठ लोगो को उचित है कि इनको कभी न मानें। देखो सत्यग्रन्थों में यह कथा इस प्रकार लिखी है कि --

(मैं यहाँ संस्कृत के श्लोक नहीं लिख पा रहा हूँ केवल उनका हिन्दी अनुवाद ही लिख रहा हूँ।)

(इन्द्रस्य नु०) यहाँ सूर्य का इन्द्र नाम है। उसके किये हुए पराक्रमों को हम लोग कहते हैं, जोकि परम ऐश्वर्य होने का हेतु बड़ा तेजधारी है। वह अपनी किरणों से 'वृत्र' अर्थात मेघ को मारता है। जब वह मरके पृथ्वी में गिर पड़ता है, तब अपने जलरूप शरीर को सब पृथ्वी में फैला देता है। फिर उससे अनेक बड़ी-२ नदी परिपूर्ण होके समुद्र में जा मिलती हैं। कैसी वे नदी हैं कि पर्वत और मेघों से उत्पन्न होके जल ही बहने के लिए होती हैं। जिस समय इन्द्र मेघरूप वृत्रासुर को मार के आकाश से पृथ्वी में गिरा देता है, तब वह पृथ्वी में सो जाता है।।१।।


फिर वही मेघ आकाश में से नीचे गिरके पर्वत अर्थात मेघमण्डल का पुनः आश्रय लेता है। जिसको सूर्य्य अपनी किरणों से फिर हनन करता है। जैसे कोई लकड़ी को छील के सूक्ष्म कर देता है। वैसे ही वह मेघ को भी बिन्दु-बिन्दु करके पृथ्वी में गिरा देता है और उसके शरीररूप जल सिमट-सिमट कर नदियों के द्वारा समुद्र को ऐसे प्राप्त होते हैं, कि जैसे अपने बछड़ों से गाय दौड़ के मिलती हैं।।२।।

जब सूर्य्य उस अत्यन्त गर्जित मेघ को छिन्न-भिन्न करके पृथ्वी में ऐसे गिरा देता है कि जैसे कोई मनुष्य आदि के शरीर को काट काट कर गिराता है, तब वह वृत्रासुर भी पृथ्वी पर मृतक के समान शयन करने वाला हो जाता है।।३।।

'निघण्टु' में मेघ का नाम वृत्र है(इन्द्रशत्रु)--वृत्र का शत्रु अर्थात निवारक सूर्य्य है,सूर्य्य का नाम त्वष्टा है, उसका संतान मेघ है, क्योंकि सूर्य्य की किरणों के द्वारा जल कण होकर ऊपर को जाकर वाहन मिलके मेघ रूप हो जाता है। तथा मेघ का वृत्र नाम इसलिये है कि वृत्रोवृणोतेः० वह स्वीकार करने योग्य और प्रकाश का आवरण करने वाला है।

वृत्र के इस जलरूप शरीर से बड़ी-बड़ी नदियाँ उत्पन्न होके अगाध समुद्र में जाकर मिलती हैं, और जितना जल तालाब व कूप आदि में रह जाता है वह मानो पृथ्वी में शयन कर रहा है।।५।।

वह वृत्र अपने बिजली और गर्जनरूप भय से भी इन्द्र को कभी जीत नहीं सकता । इस प्रकार अलंकाररूप वर्णन से इन्द्र और वृत्र ये दोनों परस्पर युद्ध के सामान करते हैं, अर्थात जब मेघ बढ़ता है, तब तो वह सूर्य्य के प्रकाश को हटाता है, और जब सूर्य्य का ताप अर्थात तेज बढ़ता है तब वह वृत्र नाम मेघ को हटा देता है। परन्तु इस युद्ध के अंत में इन्द्र नाम सूर्य्य ही की विजय होती है।

(वृत्रो ह वा०) जब जब मेघ वृद्धि को प्राप्त होकर पृथ्वी और आकाश में विस्तृत होके फैलता है, तब तब उसको सूर्य्य हनन करके पृथ्वी में गिरा देता है। उसके पश्चात वह अशुद्ध भूमि , सड़े हुये वनस्पति, काष्ठ, तृण तथा मलमुत्रादि युक्त होने से कहीं-कहीं दुर्गन्ध रूप भी हो जाता है। तब समुद्र का जल देखने में भयंकर मालूम पड़ने लगता है। इस प्रकार बारम्बार मेघ वर्षता रहता है।(उपर्य्युपय्यॅति०)--अर्थात सब स्थानों से जल उड़ उड़ कर आकाश में बढ़ता है। वहां इकट्ठा होकर फिर से वर्षा किया करता है। उसी जल और पृथ्वी के सयोंग से ओषधी आदि अनेक पदार्थ उत्पन्न होते हैं।उसी मेघ को 'वृत्रासुर' के नाम से बोलते हैं।

वायु और सूर्य्य का नाम इन्द्र है । वायु आकाश में और सूर्य्य प्रकाशस्थान में स्थित है। इन्हीं वृत्रासुर और इन्द्र का आकाश में युद्ध हुआ करता है कि जिसके अन्त में मेघ का पराजय और सूर्य्य का विजय निःसंदेह होता है।

इस सत्य ग्रन्थों की अलंकाररूप कथा को छोड़ कर मूर्खों के समान अल्पबुद्दी वाले लोगो ने ब्रह्मा-वैवर्त्त और श्रीमद्भागवतादि ग्रन्थों में मिथ्या कथा लिख रखी हैं उनको श्रेष्ठ पुरुष कभी न मानें।

7 टिप्‍पणियां:

Lalit ने कहा…

Sir Jee, satya vachan. Bas ek jigyaasaa aur hai-- kaise Dadhichi ki asthi daan ki katha judi वृत्रासुर ke saath? Thoda iss par bhi prakaash daalein. Main aapki ahilya ki katha se bhi sahmat hoon, haalaanki poori tarah nahi parantu haan yeh meri avdharana ki 85-90% pushti awashya karataa hai. Saath hi maine 'KRUTYA' ke baare mein bhi padha hai, thoda usaka bhi interpretation jaroori hai. Ek hi baar mein itane saare prashnon ke liye kshamaapraarthee hoon lekin kya karoon, bachapan mein suni-padhi kahaniyon ka asali marm ab dheere-dheere pata chal raha hai aap jaison se. Haardik sadhuvaad

सौरभ आत्रेय ने कहा…

@Lalit

जिस प्रकार राम को अहल्या के साथ जोड़ दिया गया उसी प्रकार दधिची को वृत्रासुर के साथ और भी कितनी सारी कथायें इसी प्रकार बनाई गयी हैं जिनका ना कहीं सत्य ग्रन्थों में वर्णन है और ना वो युक्तिपूर्ण और प्रामाणिक हैं.

मैंने इन्द्र और अहल्या की कथा में टिप्पणी के माध्यम से एक उदाहरण भी दिया है -- कि वर्तमान में एक साईं बाबा नाम के भगवान की पूजा बहुत अधिक हो रही है जिनके नाम से अनेक चमत्कारी कहानिया जबरदस्त तरीके से प्रचारित की गयी और फलस्वरूप लोगो ने उनको पूजना शुरू कर दिया. मतलब यह है की भगवान की मार्केटिंग करने के लिए अनेक प्रकार से कथायें बनाई जाती हैं, उस कथित भगवान के साथ बहुत सी अच्छी बातों के उपदेश सत्य ग्रन्थों से लेकर जोड़े जाते हैं और उसको समाज में भगवान के रूप में प्रस्तुत किया जाता है. यह भी एक व्यपार हो गया है. हो सकता है बहुत से लोगो की आस्था को ठेस पहुंचे अनेक बातें हैं लेकिन फिर भी मैं उनसे एक छोटी सी बात पूंछना चाहता हूँ -- जिस समय साईं बाबा जवान थे उस समय देश की स्तिथि और आज भी कितनी खराब है तो क्यों उन्होंने शिरडी या उसके आस-पास में ही लोगो उद्धार किया क्यों न देश को और बल्कि पूर्ण विश्व को इस असत्य, छल कपट और अन्यायपूर्ण परिस्तिथि से बहार निकाला, भगवान तो छोडो यदि कोई सच्चा सन्त भी है वो पूर्ण समाज के और राष्ट्र के उद्दार के लिए कार्य करेगा ना कि किसी झुण्ड या समुदाय को बनाके उसमें अपने आप को पुजवायेगा.
कहने का तात्पर्य यह है भगवान के नाम पर यह सब एक धन्धा बना डाला है और कुछ भी नहीं है. जिसके कारन हिन्दू धर्म को और इस पुण्य भूमि को अत्यधिक क्षति हुई है.

श्रीराम और श्रीकृष्ण तो वैसे ही आदरणीय और हमारे गौरवशाली इतिहास के पात्र हैं उनके साथ अच्छाईयां और उनके अच्छे उपदेश पहले से ही जुड़े हुए सत्य में ही हैं उनके बारे में अयुक्तिपूर्ण अप्रमाणिक कहानिया जोड़ने की कोई आवश्यकता ही नहीं है.

'KRUTYA' से आपका क्या तात्पर्य है मैं कुछ समझ नहीं पा रहा हूँ थोडा स्पष्ट करें और देवनागरी में लिखेंगे तो थोड़ा अच्छा रहेगा.

अनाम ने कहा…

sai baba bhagwan nahin ho sakta. Sawaal yeh hai ki saibaba vaale jotth chalaa ke dharm par aakraman kar rahe hain. Sawaal yeh nahin hai ki shankaracharyawaroopaanandji ne yah kabhi nahin kaha ki saibaba ko bhagwaan maan ne par pratibandh hai. Hinduo mein maan-ne...na maan-ne ka swaatantrya hai. Swarupanandji ne itna hi kaha ki saibaba koi bhagwaan nahin. Lekin kisi ko maan-ne se pratibandhit nahin kiye. Ulte chor-saibaba-vaale-andhe log, kotwal-swarupanandji ko daante vala haal hai. Yahi spasht karta hai...doodh ka doodh aur paani ka paani.
Asstha-shraddha ka arth hai..ur rajju (rassi) ko rajju. Yatha-arth gyaan ko hi shraddha kehte hain...anarth-ulte (agyaan) ko shradhha nahin kehte. Yah bhi bhandafod karna chahiye.
Vaise luchh dalaal kehte hain ki saibaba ki mannaagwan hain. LEKIN...karodo dusro ki mannat nahin fali...fal nahin mila...uska kya? arthaat: fal mila koi anya kaaran se..aur thop diya saibaba pe..Isko andhkaar-mithyavaad kehte hain. Lekin isko saiababa vaale andhon ki fauj..."shraddha" kehti hain. Bolo!
Zara musalmaan bankar dikhaayein... Sab pataa chal jaayega ki saibaba kya hain...bhagwaan hai ya nahin. Fir bolke dikhaayein...bakwaas...jo abhi karte hain yeh saibaba vaale paakhandi.
Bolo na?! Bura lagaa na? lagaa na?
Zara "shaastraarth" karne ko toh aayein. Inko (sai-vaalo ko)toh "shaastraarth" kya hota hai...yeh bhi nahin maalum. Yeh andhkaario-dahshatgardo-aatankvaadio ko. Haan...yeh aatankvaadi hamlaavar hain..hamaare hi andar kille-durg banaa ke...sulaaye rakhke... yeh hinduo par sufiwaad ke naam pe hamla hai....in continuation of 1200 year old story of invasion thru deceit and brutality. Yeh aatankvaadi hain...eh islam ko madad karne vaale hain. Yeh hindu-ghaati...paatki...ghaatki...kroor...chhali...atyaachaari...dhongi...bhadve-gaddaar-vishwasghaati hain....yeh saibaba vaale...yeh adharmi hain.

अनाम ने कहा…

Sorry pichhli tippani mein...antim pankti mein shaayad bhool thi. Mera kehne ka aashay yeh tha ki: ...
"Yeh saibaba vaale log...hinduo ke viruddh...dharm-viruddh, raashtra-viruddh hain. Yeh sai vaale log...hinduo ka ghaat karnevaale... hindu-ghaati hain. Yeh sai vaale log paatki...kroor...chhali... atyaachaari... dhongi... dhoort... bhadve-gaddaar-vishwasghaati, andh vishwaasi etc. hain.... yeh saibaba vaale... yeh adharmi hain, saibaba vaale"
Aise padhein.
Yeh blog vaale bhi bhosdi ke(Saurabh Aatreya bhi) ullu ke patthe hain... aatankvaadi hain. Kisi ne tippani likhi ho toh usko sudhaar nahin sakte likhne vaale. Saurabh..."yeh blog muze de de ...thakur...".
Aise ullu-k-patthe... blog chalaane vaale chutiyo ki bhi koi kami nahin hai. Tippani dene waale jaayein bhaad mein...aisa yeh blog-chalaane valo ka maan-na hota hai. Yeh blog chalaane vaale...kum-se-kum...yeh...Saurabh ke jaise log nikhattu hote hain.

अनाम ने कहा…

Fir se madarchod Saurabh ke kaaran se,meri pichhli tippani mein sudhaar nahin kar sakta.
Socho...kitna anarth aur sabko galat msg jata hai...galat typing ko sudhaar na sakne se.! Toh pichhli tippani mein mere kehne ka aashay..(pehli kuchh panktiyon mein) yeh tha ki:
"Sawaal yeh hai ki saibaba vaale jooth chalaa ke dharm par aakraman kar rahe hain. Sawaal yeh nahin hai ki shankaracharya swaroopanandji ne saibaba ke bhagwaan ho ne ka khandan kiya. Swaroopaanandji ne yah kabhi bhi nahin kaha ki saibaba ko bhagwaan maan ne par pratibandh hai. Kya maan-na ya nahin maan-na...ismein hindutva aur hinduo mein swatantrata hai. Shankaracharyaji ne pratibandh toh koi nahin lagaya ...na kuchh vaisa bola. Varna...islamio ki tarah saibaba valo ki tarah....xy z daalte. Kaat-jalaa-balaatkaar -loot, badnaami-apmaan etc. karke upar pahuncha diya hota..saibaba valo ko.
Aur saibaba vaale shankaracharyaji ko gaaliyaan aur apmaan de rahe hain?! Yh hai doodh ka doodh...aur paani ka paani.
Aur bhai...secularism-azadi ki baat hai na? kya maan-na ya nahin maan-na? aur karna...nahin karna? "aastha-shraddha-privacy-nijitva" ka vishay hai na? Toh zara Saudi ya pakistan jaa ke ye log vahaan....
saibaba ka mandir banaa ke...
bhes banaa ke ghoomte...
loudspeakers bajaate... "sai-sai-sai-sai"...
moorti rakh-pooja karke...
chillate ki sai hi allah aur paygambar hai...
chillaate ki sab ka sai (paygambar) ek...
sabne sai ka cholapehn ne ka...
prasaad baant-te...
sai mandir ki tarf sir zhukaate aur praarthna karte-padhte hindi mein...
Kaabaa mein jaa ke sai ki dhun-deep-aarti-dhol-baajaa bajaate...
dhoom chalaate..har galli mein....
Bhai..yeh toh ek step aur aage badhaane ki baat hai na? saibaba valo ki baat ko support karne ki baat hai na? hum saibaba ki kathayein-pooja etc. ka kahaan virodh kar rahe hain?! Bolo! Shankaracharyaji...yahi toh keh rahe hain. Ki maan-ne ya na maan-ne ki azadi hai. Kaun rokta hai? Shankaracharyaji ne toh pratibandh nahin lagaya. Zara Saudi jaayein...saibaba vaale...bhes banaa ke... hum tumhaare saath hain... !! Saale... haraami-dusht-mithya ahankari-andhkaari-ghaatki-paatki--dhoort-paakhandi-vyabhichaari.. andh-vishwaasi... gaddaar... vishwaasghaati kahin ke...

अनाम ने कहा…

dusht-mithya ahankari-andhkaari,,,dhoort-paakhandi-vyabhichaari.. andh-vishwaasi....sai vaale.
Fir se madarchod Saurbh ke kaaran agli tippani ki antim line sudhaar nahin saka. Saale madarchod ne yahaan aisa koi praavdhaan hi nahin rakkha hai....Aise..yeh...hain apne samaaj sudhaarak ban-ne ka ddhong rachne--rachaane-waale! Yeh islamio-isaaio-secularo se bhi badtar hain! ye traas-vaadi hain. Ye...is tarah se logo ko traas dete hai...(Aajaa...fasaajaa vala khel hai yeh Saurabh ka...chaahe label kuchh bhi maare)

अनाम ने कहा…

Saale... haraami-dusht-mithya ahankari-andhkaari-ghaatki-paatki--dhoort-paakhandi-vyabhichaari.. andh-vishwaasi... gaddaar... vishwaasghaati kahin ke...yaani sai vaale. 30 minute barbaad...ek line sudhaarne keliye...after posting...YEH HAI: the great circus-fracas-of Saurabh...