रविवार, 28 फ़रवरी 2010

दयानंद जी ने क्या खोजा क्या पाया (भाग ३)

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भाग २ से आगे क्रमशः

. "हरित शाक के खाने में जीव का मारना उनको पीड़ा पहुंचनी क्योंकर मानते हो? भला जब तुमको पीड़ा प्राप्त होती प्रत्यक्ष नहीं दिखती और जो दिखती तो हमको दिखलाओ।´ (सत्यार्थप्रकाश, दशमसमुल्लास, पृष्‍ठ 313) - आज पहली क्लास का बच्चा भी जानता है कि पेड़-पौधों पर अनगिनत सूक्ष्म जीवाणु वास करते हैं और खुद पेड़-पौधे भी Living things (जीवित वस्तुओं) में आते हैं। ऐसी विज्ञान विरूद्ध मान्यतओं को ज्ञान कहा जायेगा अथवा अज्ञान?

समीक्षा – यहाँ उन्होंने हरित शाक को कष्ट न होने की बात की है उनमें जीवन नहीं है ऐसा कब कहा जो तुम फिर प्रसंग से काट कर पेड़ पौधो के जीवन की बात कर रहे हो. वैसे यह एक पूर्ण अलग विषय है लिखने के लिए क्योंकि यह बात हमेशा एक मुद्दा रहती है कि मनुष्य शाकाहारी है या माँसाहारी है. उपरोक्त वर्णित पॉइंट में यह मुद्दा ही नहीं है पर मैं इस पर अभी और शोध करके भविष्य में लिखूंगा अभी के लिए मैं यह कहना चाहूँगा ईश्वर ने प्रत्येक जीव के लिए भोजन व्यवस्था की है जिस प्रकार शेर आदि मांसाहारी जीवो के लिए अन्य जीव खाने का क्रम रखा है उसी प्रकार मनुष्य आदि प्राकृतिक शाकाहारी है. और पेड़-पौधों से उत्पन्न जिन सूक्ष्म जीवाणुओं के कष्ट की बात तुम कर रहे हो उनका प्राकृतिक जीवन चक्र ही ऐसा है और उन्हें कष्ट नहीं होता है और इसी तरह पेड़ पौधे आदि का जीवन भी परार्थ होता है और यदि पेड़ पौधों को कष्ट होने की बात मान भी लें तो ऐसे तो एक व्याघ्र या शेर द्वारा मारे हुए जीव को भी दुःख होता है बल्कि सभी परजीवी किसी न किसी दूसरे जीव का अहित करते ही हैं और इस प्रकार तो ईश्वर भी दोषी हो जाता है कि एक को बिना कारण कष्ट देता है और दुसरे को सुख, इस प्रकार प्रत्येक भोजन श्रृंखला ही अन्याय पूर्ण हो जाती है. जबकि ईश्वर की बनायीं व्यवस्था कभी गलत नहीं होती और जीवों को जन्म उनके कर्मों के आधार पर ही मिलता है यदि यह न मानोगे तो ईश्वर को दोषी होने से नहीं बचा पाओगे. पूरी भोजन और जीव श्रंखला उनके कर्मों के निमित्त है पर उस से यह नहीं मान सकते कि एक हत्यारे को क्षमा दी जा सकती है क्योंकि मृत व्यक्ति की हत्या होना उसके पूर्व कर्मों के अनुसार था तो इसका उत्तर यह है कि जानवरों द्वारा दूसरे जीवों को मारा जाना उनके प्राकृतिक व्यवहार और भोजन श्रृंखला के अंतर्गत आता है पर मनुष्य द्वारा की गयी जीव हत्या प्रकृति विरुद्ध पाप है यदि स्वरक्षा न हो तो किन्तु हरित शाक आदि खाना प्राकृतिक है. अब इसमें बहुत लोग तर्क देंगे कि नहीं मनुष्य तो स्वभावतः मांसाहारी है और उसमें डार्विन का तर्कहीन, आधुनिक वैज्ञानिकों द्वारा खंडित सिद्दांत रखेंगे. और यह भी बात भी रखेंगे कि यदि मनुष्य प्राकृतिक शाकाहारी ही है तो वो मांस कैसे पचा सकता है. डार्विन के सिद्धांत को इसी तरीके से पोइंट्स बनाकर उसकी भी समीक्षा यहाँ की जायेगी और जिस प्रकार कुत्ता प्राकृतिक रूप से मांसाहारी है किन्तु वो शाकाहार पर भी जी लेता है उसी प्रकार मनुष्य भी प्राकृतिक रूप से शाकाहारी है और मांस भक्षण पर भी जी लेता है इस तरह की विशेषता कुछ जीवों में पाई जाती है. फिलहाल के लिए अभी एक बात पर ध्यान देना कि सभी मांसाहारी जीव जीभ से पानी पीते हैं जबकि शाकाहारी अपने होंठों से जोकि उनके पृथक प्राकृतिक व्यवहार को दर्शाता है. इस विषय पर और भी आगे के किसी लेख में सभी आरोपों के खंडन के साथ लिखूंगा समझ लेना वहां से किन्तु इसमें विज्ञान विरुद्ध कुछ भी नहीं है.

. क्या `नियोग´ की व्यवस्था ईश्वर ने दी है?

समीक्षा – इसका उत्तर मैं अपने एक पहले के लेख में दे चुका हूँ वहां देख लो. http://satyagi.blogspot.com/2009/11/blog-post.html

१०. इसी प्रकार हालाँकि स्वामी जी ने शूद्रों को भी थोड़ी बहुत राहत पहुंचाई है लेकिन फिर भी उन्हें अन्य वर्णों से नीच ही माना है। दयानन्द जी खुद भी `शूद्र´ और उसके कार्य को लेकर भ्रमित हैं। उदाहरणार्थ - सत्यार्थप्रकाश, पृष्‍ठ 50 पर `निर्बुद्धि और मूर्ख का नाम शूद्र´ बताते हैं और पृष्‍ठ 73 पर `शूद्र को सब सेवाओं में चतुर, पाक विद्या में निपुण´ भी बताते हैं। क्या कोई मूर्ख व्यक्ति, चतुर और निपुण हो सकता है? क्या बुद्धि और कला कौशल से युक्त होते ही उसका `वर्ण´ नहीं बदल जायेगा? क्या ऊंचनीच को मानते हुए भेदभाव रहित प्रेमपूर्ण, समरस और उन्नति के समान अवसर देने वाला समाज बना पाना संभव है? बच्चों को शिक्षा देने में भेदभाव नहीं करना चाहिए - `ब्राह्मण तीनों वर्ण ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैष्‍य, क्षत्रिय क्षत्रिय और वैष्‍य तथा वैश्य एक वैश्य वर्ण को यज्ञोपवीत कराके पढ़ा सकता है और जो कुलीन शुभ लक्षण युक्त शूद्र हो तो उसको मन्त्रसंहिता छोड़के सब शास्त्र पढ़ावे, शूद्र पढे़ परन्तु उसका उपनयन न करे। (सत्यार्थप्रकाश, तृतीय0 पृष्‍ठ 31) - अगर बचपन में ही ऊंचनीच की दीवारें खड़ी कर दी जायेंगी तो बड़े होकर तो ये दीवारें और भी ज्यादा ऊंची हो जायेंगी, फिर समाज उन्नति कैसे करेगा?

समीक्षा – वाह भई वाह क्या वाक्छल है तुम्हारा, तुमने अपनी पुस्तक ऐसे लिखी हैं कि कहीं की ईट कहीं का रोड़ा भानुमती ने कुनबा जोड़ा. पहले वक्तव्य में उन्होंने शुद्र की विद्या और ज्ञान-विज्ञान के सन्दर्भ में तुलना की है और दूसरे में उन्होंने यह बताया है कि शुद्र व्यक्तियों के कौन-कौन से कार्य हैं. क्या मैं एक बाल काटने वाले नाई जो कि बाल काटने में बहुत ही चतुर और निपुण है को एक बुद्धिमान ज्ञानी व्यक्ति कह सकता हूँ. और यदि कह सकते हैं तो उसको मंत्री पद, डॉक्टर या सोफ्टवेयर इंजिनियर बना देते हैं. हमारे यहाँ ऑफिस में एक एक शर्माजी आते थे जो अपने चपरासी के कार्य में बहुत चतुर और निपुण है उनको भेज देता हूँ आपके पास कुरान की व्याख्या के लिए क्योंकि आपके अनुसार तो वो ज्ञानी भी होंगे क्योंकि वो चतुर और निपुण है. वास्तव में आज यही दौर चल रहा है जिनकी बुद्धि बाल काटने, खाना बनाने, सफाई आदि सेवा कार्यों की है वो ही इस देश कि बाग-डोर संभाले हुए हैं अन्यथा क्षत्रिय होते तो तुम जैसे लोगो की इस तरह की हिम्मत और ध्रष्टता नहीं होती की हमारे घर में ही रह कर हमारी ही संस्कृति और सत्य ज्ञान की बुराई और असत्य का साथ देने वाले दुश्मनों की तारीफ़.

यज्ञोपवीत और उपनयन संस्कार इसलिए कराया जाता था ताकि बालक पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए शिक्षा ग्रहण करे, शुद्र अर्थात कम बुद्धि बालक को इसलिए मना किया है क्योंकि उससे इन संस्कारों और ब्रह्मचर्य के खंडन का डर रहता है और कम बुद्धि बालक मंत्र्सहिंताओं के अर्थ का अनर्थ कर सकता है जैसे कालांतर में शुद्र लोगो (मूर्खों) ने वाम मार्ग चलाया और वेदों में मांस भक्षण इत्यादि कुकर्म लिखे हैं ऐसा प्रचार किया क्योंकि उनकी सामर्थ्य ही नहीं थी इनका भावार्थ समझने की इसीलिए तो कहते हैं बन्दर के हाथ में दर्पण देना खतरनाक होता है और यहाँ बचपन में कोई ऊंच-नीच की दीवार नहीं खड़ी की जाती थी सबको एक जैसा ही सम्मान मिलता था पर बुद्धि के अनुरूप ही व्यक्ति को शिक्षा और कार्य सोंपा जाता था. तुम्हारी कम और धुर्त बुद्धि इसको ऊंच-नीच की दीवार मानती है जबकि यह न्यायपूर्ण है. पहले बालक को ३ दिन सभी विषयों और विद्याओं के बारे में बताया जाता था और फिर उसकी रुचि और ज्ञान के अनुसार उसको विद्या ग्रहण कराई जाती थी.

११. स्वामी जी की कल्पना और सौर मण्डल ''इसलिए एक भूमि के पास एक चन्द्र और अनेक चन्द्र अनेक भूमियों के मध्य में एक सूर्य रहता है।'' (सत्यार्थप्रकाश, पृश्ठ 156) यह बात भी पूरी तरह ग़लत है। स्वामी जी ने सोच लिया कि जैसे पृथ्वी का केवल एक उपग्रह `चन्द्रमा´ है। इसी तरह अन्य ग्रहों का उपग्रह भी एक-एक ही होगा। The Wordsworth Encylopedia, 1995 के अनुसार ही मंगल के 2, नेप्च्यून के 8, बृहस्पति के 16 व शानि के 20 उपग्रह खोजे जा चुके थे। आधुनिक खोजों से इनकी संख्या में और भी इज़ाफा हो गया । सन् 2004 में अन्तरिक्षयान वायेजर ने दिखाया कि शानि के उपग्रह 31 से ज्यादा हैं। (द टाइम्स ऑफ इण्डिया, अंक 2-07-04, मुखपृष्ठर) इसके बाद की खोज से इनकी संख्या में और भी बढ़ोतरी हुई है। अंतरिक्ष अनुसंधानकर्ताओं ने ऐसे तारों का पता लगाया है जिनका कोई ग्रह या उपग्रह नहीं है। ‘PSR 1913+16 नामक प्रणाली में एक दूसरे की परिक्रमा करते हुए दो न्यूट्रॉन तारे हैं।´ (समय का संक्षिप्त इतिहास, पृष्ठप 96, ले। स्टीफेन हॉकिंग संस्करण 2004, प्रकाषक: राजकमल प्रकाशन प्रा। लि0, नई दिल्ली-2)`खगोलविदों ने ऐसी कई प्रणालियों का पता लगाया है, जिनमें दो तारे एक दूसरे की परिक्रमा करते हैं। जैसे CYGNUS X-1सिग्नस एक्स-1´ (पुस्तक उपरोक्त, पृष्ठ 100) वेदों में विज्ञान सिद्ध करने के लिए स्वामी जी ने जो नीति अपनाई है उससे वेदों के प्रति संदेह और अविश्वास ही उत्पन्न होता है। क्या इससे खुद स्वामी जी का विश्वास भी ख़त्म नहीं हो जाता है?

समीक्षा - एक भूमि के पास एक चन्द्र और अनेक चन्द्र अनेक भूमियों के मध्य एक सूर्य रहता है इससे यह कहाँ मतलब निकलता है कि प्रत्येक ग्रह के साथ एक ही चन्द्र है वाक्य का द्वितीय भाग से स्पष्ट होता है अनेक चन्द्र भी हैं और अनेक भूमियाँ भी और यह वाक्य सौर मंडल के बारे में कहा गया है ना कि सभी लोको के बारे में हाँ सभी सौर मंडल इसी प्रकार के होते हैं यह उनका मंतव्य हो सकता है। यहाँ एक चन्द्र की बात हमारी पृथ्वी के सन्दर्भ में कही गयी है सभी ग्रहों के बारे में नहीं और आपने यहाँ फालतू में अपने ज्ञान का दिखावटी प्रदर्शन किया है जिसकी यहाँ पर कोई आवश्यकता नहीं है.

उपसंहार – मैंने लेखक के लगाये हुए महत्त्वपूर्ण सभी आरोपों की समीक्षा कर दी है फिर भी यदि कोई गलती से कोई पॉइंट छूट गया हो तो आप इस समीक्षा से समझ सकते हैं की इस पुस्तक का कोई भी आरोप सत्य नहीं है. अब मैं इस बकवास पुस्तक को अधिक महत्व न देते हुए बस यही इस समीक्षा का अंत करना चाहूँगा इन सब बातो के साथ लेखक ने कुरान को बेवकूफी के साथ सत्य वैज्ञानिक पुस्तक सिद्ध किया हुआ है और कुछ हमारे वैदिक धर्मशास्त्रों को वेदविरुद्ध बताया है, आर्य समाज और वेदांत को अलग-२ मत बताया है, पुनर्जन्म को वेद विरुद्ध और अतार्किक बताया है जबकि किसी बात का लेखक ने कोई संतोषपूर्ण तर्क नहीं दिया है. मिथ्या अनर्गल प्रलापों के साथ यह पुस्तक बुद्धि के दिवालिएपन से अधिक और कुछ नहीं है. बेहूदा, अतार्किक, इधर-उधर से वाक्य उठाकर उनको सन्दर्भरहित पेश करके अपने प्रयोजन कुरान को श्रेष्ठ को सिद्ध किया है. यह उन बकवास पुस्तकों में से एक है जिनका ये लोग दिन रात प्रचार कर रहे हैं. कुरान को धरती का अजर अमर और अक्षय ग्रन्थ बताया गया है. मैं यहाँ कुरान की समीक्षा करने के बजाय केवल पाठकों से एक विनती करूँगा कि वो कुरान पढ़ें और इस धरती के अजर अमर ग्रन्थ की सत्यता से परिचित हों. मैं प्रयास करूँगा कि अब आगे से इनकी मिथ्या बकवास भरी बातों पर अधिक ध्यान न देकर वैदिक धर्म के बारे में लिखूंगा क्योंकि ये लोग तो अपनी अनाप-शनाप बकते ही रहते हैं पर लोगो को जागरूक रहना चाहिए ये इनका मूर्खता भरा बोद्धिक जेहाद है ईसाई मिशनरियों की तरह जिसमें कभी-कभी हिंदुओं में कुछ मुर्ख लोग इनके और तथाकथित सेकुलर्स के झांसे में आ जाते हैं. मैं पुनर्जन्म, शाकाहार आदि विषयों पर पर इनकी अतार्किक बकवास बातों पर ध्यान न देते हुए वैदिक धर्म के विचार रखना अधिक पसंद करूँगा तब पाठक निर्णय स्वयं ही सत्य-असत्य का निर्णय ले सकते हैं.

शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2010

दयानंद जी ने क्या खोजा क्या पाया (भाग २)

वैसे तो यह गुमनाम पुस्तक समीक्षा के काबिल भी नहीं है किन्तु ऐसी कुतर्कों भरी अनेक पुस्तकें नेट पर प्रचारित की जा रहीं है इसीलिए एक का खंडन करने से आप समझ सकते हैं बाकी सब भी इसी तरह की बकवास से भरी पढ़ी हैं। मैं इस पुस्तक के मुख्य वक्तव्य नंबरवाइज लिख कर उनकी समीक्षा कर रहा हूँ और अंत में अपना निष्कर्ष रखूंगा आप लोग कृपया अपने-२ निष्कर्ष टिप्पणियों द्वारा व्यक्त करें। वैसे मैं इस भाग के पश्चात एक भाग और कुछ शेष पॉइंट्स के साथ लिखूंगा।

सबसे पहले तो यह कहना चाहूँगा इस पुस्तक में एक बात को कई बार दोहराया गया है तो उन बातों की समीक्षा बार-२ नहीं दोहराई जाएगी। तो संक्षिप्त में लेखक के मुख्य आक्षेप निम्न प्रकार हैं।

. दयानंद जी ने अपने हत्यारे को क्षमा प्रदान क़ी जबकि उन्हीके अनुसार "अपराधी को क्षमा करना अपराध को बढ़ावा देना है क्योंकि जो पाप क्षमा करे तो उसका न्याय नष्‍ट हो जाये और सब मनुश्य महापापी हो जायें। क्योंकि क्षमा की बात सुन ही के उनको पाप करने में निर्भयता और उत्साह हो जाये। जैसे राजा अपराधियों के अपराध क्षमा कर दे तो वे उत्साहपूर्वक अधिक-अधिक बड़े-बड़े पाप करें। क्योंकि राजा अपना अपराध क्षमा कर देगा और उनको भी भरोसा हो जाए कि राजा से हम हाथ जोड़ने आदि चेश्टा कर अपने अपराध छुड़ा लेंगे और जो अपराध नहीं करते वे भी अपराध करने से न डर कर पाप करने में प्रवृत्त हो जायेंगे। इसलिए सब कर्मों का फल यथावत देना ही ईश्वर का काम है क्षमा करना नहीं।" दयानन्द जी द्वारा अपने अपराधी को क्षमा कर देने की यह पहली घटना नहीं है बल्कि अनगिनत मौकों पर उन्होंने अपने सताने वालों और हत्या का प्रयास करने वालों को क्षमा किया है। `फरूखाबाद में आर्यसमाज के एक सभासद की कुछ दुष्‍टों ने पिटाई कर दी। लोगों ने स्कॉट महोदय से उसे दण्ड दिलाया । पर स्वामीजी को रूचिकर न लगा। उन्होंने स्कॉट महोदय तथा सभासदों से कहा - ''चोट पहुंचाने वाले को इस तरह दण्डित करना आपकी मर्यादा के खिलाफ है। महात्मा किसी को पीड़ा नहीं देते, अपितु दूसरों की पीड़ा हरते हैं।''

समीक्षा- इस बात का अपनी इस पुस्तक में इन महोदय ने बार-२ वर्णन किया है की दयानंद जी ने अपने हत्यारे को क्षमा कर दिया जिस कारण उनके ग्रन्थ पढने योग्य नहीं हैं। वैसे तो इस बात को मैंने भी सुना है कि उन्होंने ऐसा किया था। इसमें हम २ बात कह सकते हैं एक तो ऐसा ही हुआ था और दूसरे यह उनके कुछ शिष्यों द्वारा उनको अत्यधिक अनावश्यक रूप से दयालू प्रचारित करने के लिए किया गया हो। यदि उन्होंने क्षमा ही किया था तो इसमें मैं यह कहूँगा की उनकी इस एक बात के कारण उनके द्वारा लिखित सभी ग्रन्थ असत्य नहीं हो जाते जबकि वो एक अखंड ब्रहमचारी सन्यासी थे और संभव है वो व्यक्ति जिसने जहर दिया था उनके हत्या के प्रयोजन में एक मुर्ख मोहरा मात्र था इसको जानते हुए उन्होंने उसको क्षमा कर दिया कि इसमें इतना बुद्धि-विवेक ही नहीं है समझने का इसने मुझे मारकर इस राष्ट्र का कितना अहित कर दिया है। जैसे कि एक पागल हत्यारे को आज भी एक कोर्ट उसको सजा देकर छोड़ देता है उसी प्रकार उन्होंने भी उसको छोड़ दिया तो जिस प्रकार कोर्ट का निर्णय अन्याय पूर्ण नहीं है उसी प्रकार उनका निर्णय भी अन्याय पूर्ण नहीं कहा जा सकता। वास्तविकता क्या थी ये पूर्णतयः स्पष्ट नहीं है और बाकी के तुम्हारे द्वारा कथित अनगिनत मौके मनगढ़ंत ही हैं और हो सकता है एकआदि मौके पर उन्होंने सामने वाले के शेष व्यक्तित्व को देख कर उसके ह्रदय परिवर्तन की द्रष्टि से ऐसा किया भी हो। वैसे भी पाठक आगे की समीक्षा से समझ सकते हैं कि तुम्हारा उद्देश्य क्या है और तुम कितने सत्यवान और ज्ञानवान हो।

. माता, पिता, आचार्य, अतिथि और पुरुष के लिए पत्नी की अहमियत बताते हुए स्वामी जी कहते हैं- `ये पाँच मूर्तिमान् देव जिनके संग से मनुष्‍यदेह की उत्पित्त, पालन, सत्यशिक्षा, विद्या और सत्योपदेश को प्राप्ति होती है। ये ही परमेश्वर को प्राप्त होने की सीढ़ियाँ हैं।´ (सत्यार्थप्रकाश, एकादशसमुल्लास, पृष्‍ठ 216) माता-पिता को छोड़कर तो वो खुद ही भागे थे। विवाह उन्होंने किया नहीं इसलिए पत्नी भी नहीं थी। वो खु़द दूसरों पर आश्रित थे और न ही कभी उन्होंने कुछ कमाया तो अतिथि सेवा का मौका भी उन्होंने खो दिया। सीढ़ी के चार पाएदान तो उन्होंने खुद अपने हाथों से ही तोड़ डाले। आचार्य की सेवा उन्होंने ज़रुर की, लेकिन कभी-कभी ऐसा कुछ कर जाते थे कि या तो आचार्य पाठशाला से उनका नाम ही काट देता था या जितना ज्यादा ज़ोर से हो सकता था उनके डण्डा जमा देता था, जिनके निशान उनके शारीर पर हमेशा के लिए छप जाते थे।

समीक्षा- तुम लोगो में जब किसी बात की बुद्धि ही नहीं है समझने की तो अपनी अधिक अक्ल ना ही लगाओ तो बेहतर है- आपके अनुसार दयानंद जी ने स्वयं अपने कहे का पालन नहीं किया अरे तुमने केवल अपनी सिद्धांत विरुद्ध बात कह डाली। माता-पिता को छोड़ कर यदि उन्होंने संन्यास लिया था और विवाह नहीं किया तो इसका यह अर्थ कहाँ निकलता है की वो इनका सम्मान नहीं करते थे जैसे कि चोरी करना पाप है यह कहने के लिए मुझे चोर बनना आवश्यक नहीं है। उन्होंने ही कई बार यह भी कहा है की यदि मनुष्य ब्रह्मचर्य आश्रम से सीधा संन्यास आश्रम लेता है तो सर्वोत्तम है किन्तु ऐसा करना हर मनुष्य के वश में नहीं है ऐसा तीव्र वैरागी पुरुष कोई विरला ही होता है जैसे के वो स्वयं भी थे। सन्यासी से अधिक सब जगत और जीवों की महत्ता को और कोई नहीं समझ सकता। यदि इसमें कोई यह शंका करता है की यदि संन्यास लेना सर्वोत्तम है तो गृहस्त और वानप्रस्थ आश्रम छोड़ कर सभी संन्यास लेने लगें तो संसार का उच्छेद ही हो जायेगा तो उनको मैं यह बता दू जिस प्रकार अध्यनरत मनुष्य में ज्ञान की ग्राहकता ३ प्रकार की होती है उत्तम, मध्यम, निकृष्ट उसी प्रकार से संन्यास लेने की क्षमता हर किसी में संभव नहीं है बहुत ही कम व्यक्ति अखंड बृह्मचर्य का पालन करते हुए धारणा, ध्यान और सबीज समाधि से होते हुए निर्बीज समाधि तक कि यात्रा तय करते है और वास्तविक संन्यास ले सकते हैं इसीलिए इस संसार का उच्छेद कभी नहीं होगा और जितना इस ब्रह्माण्ड में जड़ है उतना चेतन भी है। अतिथि यहाँ इस प्रकरण में किसको कहा गया है यदि तुमने हिन्दू शास्त्र पढ़े होते तो ऐसा न होता, तुमने एक सूक्त भी सुना होगा अतिथि देवोभवः जिसका लोग सन्दर्भ और प्रसंग काट कर किसी के लिए भी प्रयोग करते हैं वो वास्तव में एक विद्वान सन्यासी पुरुष के लिए ही लिखा है क्योंकि जिसके आने की कोई तिथि नहीं होती उसको अतिथि कहते हैं अर्थात वो विद्वान निष्कपटी, सबकी उन्नति चाहने वाला, जगत में भ्रमण करता हुआ सब को सत्य उपदेश से सुख करता रहे ऐसा सन्यासी उसको अतिथि कहते हैं क्योंकि वो व्यक्ति ज्ञान प्रदान करता है इसीलिए देवता कहलाता है और हमें हमेशा उस ज्ञानी पुरुष का सत्कार करना चाहिए। आज कोई यदि धूर्त, मुर्ख या कैसा भी बहारी या विदेशी व्यक्ति चाहे वो घर में तुम्हारे आग लगा दे को अतिथि का पद देकर कहते हैं मेहमान तो भगवान् का रूप होता है क्योंकि हमारे शास्त्रों में लिखा है अतिथि देवोभवः, अरे भाई लोगो पहले तो भगवान् के पद से तुम किसी को भी नहीं सुशोभित कर सकते चाहे वो तुम्हारे उपरोक्त वर्णित पंचदेव में से ही क्यों ना हो फिर आजकल के कथित अतिथि का क्या कहें। भगवान् का पर्यावाची देवता नहीं है किन्तु हाँ भगवान् देवता है यह कह सकते हैं। देवता शब्द संस्कृत की द्र धातु से निकलता है जिसका अर्थ होता हैं देना या प्रदान करने वाला । उदाहरण के तौर पर सूर्य देवता है क्योंकि वो पूरे सौरमंडल को प्रकाश देता है, गुरु देवता होता है क्योंकि वो शिक्षा प्रदान करता है, माता-पिता देवता हैं क्योंकि वो इस मनुष्य देह को जन्म देते हैं, पृथ्वी देवता है क्योंकि वो हमें रहने के लिए स्थान, भोजन इत्यादि देती है। इसी प्रकार से आपको समझना चाहिए देवता, भगवान् नहीं होता पर भगवान देवता होता है। किसी लोक हित और संन्यास के महान उद्देश्य के लिए यदि माँ बाप भी आड़े आते हैं तो उनको छोड़ने में कोई बुराई नहीं है और इसी प्रकार अविवाहित रहने में। उन्होंने लोगो को पंचदेव पूजा का महत्व बताया कि पञ्च फलों आदि की पूजा से कुछ हांसिल नहीं होता और ना ही उस बात का हमारे सत्य शास्त्रों में वर्णन है वो पञ्च देव माता, पिता, आचार्य, अतिथि(विद्वान् पुरुष) और पति के लिए पत्नी तथा पत्नी के के लिए पति पांच देव हैं शास्त्रों में वर्णित हैं जिनका सत्कार आवश्यक है और जो तुमने बाकी की मनगढ़ंत बकवास लिखी है उसका कोई उत्तर देना आवश्यक नहीं है।

. दयानन्दजी एक वेदमन्त्र का अर्थ समझाते हुए कहते हैं- `इसीलिए ईश्वर ने नक्षत्रलोकों के समीप चन्द्रमा को स्थापित किया।´ (ऋग्वेदादि0, पृष्‍ठ 107) "परमेश्वर ने चन्द्रमा को पृथ्वी के पास और नक्षत्रलोकों से बहुत दूर स्थापित किया है, यह बात परमेश्वर भी जानता है और आधुनिक मनुष्‍य भी। फिर परमेश्वर वेद में ऐसी सत्यविरूद्ध बात क्यों कहेगा?" इससे यह सिद्ध होता है कि या तो वेद ईश्वरीय वचन नहीं है या फिर इस वेदमन्त्र का अर्थ कुछ और रहा होगा और स्वामीजी ने अपनी कल्पना के अनुसार इसका यह अर्थ निकाल लिया । इसकी पुष्टि एक दूसरे प्रमाण से भी होती है, जहाँ दयानन्दजी ने यह तक कल्पना कर डाली कि सूर्य, चन्द्र और नक्षत्रादि सब पर मनुष्‍यदि गुज़र बसर कर रहे हैं और वहाँ भी वेदों का पठन-पाठन और यज्ञ हवन, सब कुछ किया जा रहा है और अपनी कल्पना की पुष्टि में ऋग्वेद (मं0 10, सू0 190) का प्रमाण भी दिया है- "जब पृथिवी के समान सूर्य, चन्द्र और नक्षत्र वसु हैं पश्चात उनमें इसी प्रकार प्रजा के होने में क्या सन्देह? और जैसे परमेश्वर का यह छोटा सा लोक मनुश्यादि सृष्टि से भरा हुआ है तो क्या ये सब लोक शून्‍य होंगे?" (सत्यार्थ।, अश्टम। पृ। 156) क्या यह मानना सही है कि ईश्वरोक्त वेद व सब विद्याओं को यथावत जानने वाले ऋषि द्वारा रचित साहित्य के अनुसार सूर्य व चन्द्रमा आदि पर मनुष्‍य आबाद हैं और वो घर-दुकान और खेत खलिहान में अपने-अपने काम धंधे अंजाम दे रहे हैं?

समीक्षा - आप फिर वहीँ प्रलाप करते नज़र आ रहे हैं और बेफिजूल कि बात कर रहे हैं और वाक्यों को अपने सन्दर्भ से हटा भी रहे हैं। उन्होंने यह कहा है कि जिस प्रकार पृथ्वी पर एक जीव के शरीर में पृथ्वी तत्व कि अत्यधिकता होती है उसी प्रकार सूर्यादि लोको पर तैजस तत्व की अत्यधिकता से बने हुए जीव संभव हैं और ये घर-दुकान, खेत खलियान आदि बातों की आप स्वयं मिथ्या कल्पना कर रहे हैं उन्होंने ऐसा कुछ नहीं कहा है। जीवन क्या है यह अभी तक आज के वैज्ञानिको की समझ नहीं आया है वो अक्सर अपनी थियोरीज़ का स्वयं ही समर्थन-खंडन करते रहते हैं। इसीलिए यदि ब्रह्मांड की वैचित्रियता और स्रष्टि के मूल तत्वों से आप परिचित हों तो जीवन किस रूप में कहाँ हो सकता है यह आपकी समझ में आ जाता। क्योंकि जीवन के बारे में इस लेख का विषय नहीं है इसलिए मैं यहाँ अधिक नहीं लिखता आगे के लेखो में लिखूंगा। इस स्रष्टि में कोई भी वस्तु निष्प्रयोजन नहीं है चंद्रमाओं का पृथ्वी आदि लोको के लिए महत्त्व है यह बात भी यहाँ बताई जा रही है और यह बात आज के वैज्ञानिक भी दबे स्वरों में ही सही पर स्वीकार रहे हैं तो इसमें उन्होंने क्या गलत कह दिया।

. परमेश्वर का कोई भी काम निष्‍प्रयोजन नहीं होता तो क्या इतने असंख्य लोकों में मनुष्‍यादि सृष्टि न हो तो सफल कभी हो सकता है? (सत्यार्थ0, अश्टम0 पृ0 156)स्वामी जी ने परमेश्वर की सफलता को सूर्य, चन्द्रमा और नक्षत्रों पर मनुष्‍यादि के निवास पर निर्भर समझा है। इन लोकों में अभी तक तो किसी मनुष्‍यादि प्रजा का पता नहीं चला, तो क्या परमेश्वर को असफल और निष्‍प्रयोजन काम करने वाला समझ लिया जाये? या यह माना जाए कि स्वामी जी इन सब लोकों की उत्पत्ति से परमेश्वर के वास्तविक प्रयोजन को नहीं समझ पाए? अत: ज्ञात हुआ कि स्वामी जी ईश्वर, जीव और प्रकृति के बारे में सही जानकारी नहीं रखते थे। एक शोधकर्ता को यह शोभा नहीं देता कि वह वेदों के वास्तविक मन्तव्य को जानने समझने के बजाए उनके भावार्थ के नाम पर अपनी कल्पनाएं गढ़कर लोगों को गुमराह करे ।

समीक्षा - यदि आज के वैज्ञानिक लोगो को ये पता नहीं चलता कि पृथ्वी गोल है तो क्या पृथ्वी चपटी हो जाती मतलब यदि उन्हें मनुष्यों जैसी प्रजा या कोई जीव अभी तक किसी लोक में नहीं मिला तो वहां जीव हैं ही नहीं ऐसा कैसे मान लें जबकि इस ब्रह्माण्ड की अनंतता का आपको जरा सा भी अहसास हों तो आज के वैज्ञानिकों की जानकारी उसके समक्ष कितनी है इसका भी आपको अहसास हों जाता। मनुष्य कितना ही जान ले पर वो इस ब्रह्माण्ड के आगे अति सूक्ष्म ही है और यह ब्रह्माण्ड उस ईश्वर के आगे। मैं आज के वैज्ञानिक बातो का विरोधी नहीं हूँ और ना ही उनके ज्ञान का क्योंकि मैं एक हिन्दू आर्य हूँ जो कभी ज्ञान का विरोध नहीं करता हाँ किन्तु कुतर्कों का समर्थक नहीं हूँ और चालबाजी का भी नहीं। मैं केवल आप जैसे लोगो का संशय मिटाने का प्रयास कर रहा हूँ।

. आकाश में सर्दी-गर्मी होती है, सर्दी से परमाणु जम जाते हैं, भाप से मिलकर किरण बलवाली होती है । क्योंकि आकाश के जिस देश में सूर्य के प्रकाश को पृथ्वी की छाया रोकती है, उस देश में शीत भी अधिक होती है। फिर गर्मी के कम होने और शीतलता के अधिक होने से सब मूर्तिमान पदार्थो के परमाणु जम जाते हैं। उनको जमने से पुष्टि होती है और जब उनके बीच में सूर्य की तेजोरूप किरणें पड़ती हैं तो उनमें से भाप उठती है। उनके योग से किरण भी बलवाली होती है।´ (ऋग्वेदादिभाष्‍यभूमिका पृष्‍ठ 145 व 146) सर्दी-गर्मी धरती पर होती है आकाश में नहीं और वह भी पृथ्वी द्वारा सूर्य के प्रकाश को रोकने की वजह से नहीं बल्कि सूर्य की परिक्रमा करते हुए पृथ्वी जब सूर्य से दूर होती है तो सर्दी होती है और जब अपेक्षाकृत निकट होती है तो गर्मी होती है। और न ही सर्दी से परमाणु जमते हैं। जब स्वयं बर्फ के ही परमाणु जमे हुए नहीं होते तो अन्य पदार्थो के क्या जमेंगे? पता नहीं परमाणु के सम्बन्ध में स्वामी जी की कल्पना क्या है? भाप से मिलकर प्रकाश को भला क्या बल मिलेगा? यह वेदों का कथन है या स्वयं स्वामी जी की कल्पना?

समीक्षा - आकाश में भी तापमान में अंतर होता है अर्थात सर्दी-गर्मी भी होती है।"आकाश के जिस देश में सूर्य के प्रकाश को पृथ्वी की छाया रोकती है, उस देश में शीत भी अधिक होती है।" मुर्ख व्यक्ति देश का अर्थ होता है स्थान अर्थात उनका तात्पर्य यह है कि आकाश के जिस स्थान में सूर्य के प्रकाश को पृथ्वी की छाया रोकती है, उस स्थान में शीत भी अधिक होती है तो इसमें क्या गलत है। वहां के आकाश और पृथ्वी पर सभी मुर्तिमानों के परमाणु जम जाते हैं और जब उनके बीच में सूर्य की तेज रूप किरण पड़ती है तब उनमें भाप उठती है, उनके योग से किरण भी बलवाली होती है जैसे जल में सूर्य का प्रतिबिम्ब अत्यन्त चमकता है अंतिम अंडरलाइन वाक्य क्यों छोड़ दिया आपने और जिस प्रकार चंद्रमा से परिवर्तित सूर्य की किरण से ओषधियाँ आदि पुष्ट होती हैं अर्थात वो परिवर्तित किरण बलवाली होती है अर्थात किरण बलवाली का तात्पर्य वो किरणे पृथ्वी को पुष्ट करती हैं अर्थात उन किरणों का इस पृथ्वी के वन, ओषधियों और सभी जीवों के लिए महत्त्व है। अर्थ का अनर्थ करना कोई तुम जैसे धूर्तो से सीखे। और जिस सर्दी-गर्मी के वार्षिक चक्र का तुम उदाहरण यहाँ दे रहे हो उसका इस प्रकरण से कोई लेना-देना ही नहीं है, ये तुम्हारा कुतर्क है। यहाँ परमाणु जमने का तात्पर्य है मूर्तिमान अर्थात स्थूल पदार्थो का जमना। यह लोक में बोला ही जाता है की पानी से बर्फ जम गया कोई उसकी रासायनिक प्रक्रिया की प्रत्येक बार व्याखा नहीं करता की परमाणु नहीं जमते वो करीब आ जाते हैं इत्यादि जैसे कोई ये पूंछे यह सड़क कहाँ जा रही है और तुम उत्तर देने लगो सड़क कोई व्यक्ति या जीव है जो कहीं को आता जाता है ये सड़क तो यहीं की यहीं रहती है कहीं नहीं आती-जाती अब पूछने वाला व्यक्ति तुम्हे मुर्ख ही समझेगा कि किस बेवकूफ से पाला पड़ा है, उसी प्रकार तुम यहाँ पदार्थ के जमने में परमाणु प्रक्रिया को बता कर वाक्य के भावार्थ को नष्ट करने का प्रयास कर रहे हो।

.सबसे सूक्ष्म टुकड़ा अर्थात जो काटा नहीं जाता उसका नाम परमाणु, साठ परमाणुओं से मिले हुए का नाम अणु, दो अणु का एक द्वयणुक जो स्थूल वायु है तीन द्वयणुक का अग्नि, चार द्वयणुक का जल, पांच द्वयणुक की पृथिवी अर्थात तीन द्वयणुक का त्रसरेणु और उसका दूना होने से पृथ्वी आदि दृश्य पदार्थ होते हैं। इसी प्रकार क्रम से मिलाकर भूगोलादि परमात्मा ने बनाये हैं। (सत्यार्थ प्रकाश, अश्टम। पृ।152) पहले माना जाता था कि परमाणु अविभाज्य है परन्तु अब परमाणु को तोड़ना संभव है। स्वयं भारत की ही धरती पर कई `परमाणु रिएक्टर´ इसी सिद्वान्त के अनुसार ऊर्जा उत्पादन करते हैं। अत: यह सृष्टि नियम के प्रतिकूल कल्पना मात्र है। दरअस्ल यह कोई वैदिक सिद्धान्त नहीं है बल्कि एक दार्शनिक मत है। आग, पानी, हवा और पृथ्वी की संरचना का वर्णन भी विज्ञान विरूद्ध है। उदाहरणार्थ चार द्वयणुक मिलने से नहीं बल्कि हाइड्रोजन के दो और ऑक्सीजन का एक अणु कुल 3 अणुओं के मिलने से जल बनता है। इसी तरह पृथ्वी भी पांच द्वयणुक से नहीं बनी है बल्कि कैल्शियम, कार्बन, मैग्नीज़ आदि बहुत से तत्वों से बनी है और हरेक तत्व की आण्विक संरचना अलग-अलग है। यही हाल वायु और अग्नि का भी है। यदि स्वामी जी के मत को मान लिया जाता तो देश की सारी उन्नति ठप्प हो जाती। उनके विचार आज प्रासंगिक नहीं रह गय हैं। समय ने उन्हें रद्द कर दिया है। जिन लोगों को म्लेच्छ कहकर हेय समझा गया, देश के वैज्ञानिकों ने उन्नति करने के लिए उन्हीं का अनुकरण किया। यदि प्रकृति के विषय में अभारतीयों का ज्ञान सत्य और श्रेष्‍ठ हो सकता है तो फिर ईश्वर और जीव के विषय में क्यों नहीं हो सकता?

समीक्षा - जिस परमाणु को विभाजित करने कि बात आप कर रहे हैं उसको पहली ही पंक्ति में कहा है पदार्थ का वह कण जिसको काटा न जा सके उसको परमाणु कहते हैं, जिस परमाणु की आप बात कर रहे हैं वो शास्त्र में "तन्मात्र" कहलाता है पदार्थ का वो अंतिम कण जिसमें पदार्थ की प्रतीति या अनुभूति या उसका मूल गुण बना रहे जैसे की सभी तत्वों लोहा , कार्बन आदि के परमाणु भिन्न होते हैं। यहाँ उस तन्मात्र अर्थात उस आधुनिक कथित परमाणु का वर्णन नहीं है जिसको आप सोच रहे हैं यहाँ उस से भी आगे के सिद्धांत की बात कही गयी है जोकि अभी आधुनिक वैज्ञानिकों को खोजना है, अग्नि, वायु, जल, पृथ्वी और आकाश तत्व को आप क्या समझते हैं इसका अंदाज़ा भी मुझे हो गया है। सुनों अग्नि तत्व का मतलब ऊष्मा है चाहे वो किसी भी पदार्थ में क्यों न हो जैसे उदाहरण के तौर पर लोहे , जल आदि में उष्णता अग्नि तत्व की होती है आप इस अग्नि तत्व को साधारण अग्नि मात्र समझते हैं ऐसे ही मूर्तिमान पदार्थो में स्थूलता पृथ्वी तत्व के कारण आती है चाहे वो कोई भी तत्व हो, ग्रह हो , नक्षत्र आदि हो। इसी प्रकार अन्य मूल तत्व भी हैं तुम इनको लोक में प्रयोग होने वाले अलग अर्थों में लेते हो जबकि शास्त्र में ये ५ मूल तत्व उन २४ मूल जड़ तत्वों के अंतर्गत आते हैं जो स्रष्टि प्रक्रिया के आरम्भ में बनते हैं इनको समझने के लिए बुद्दी का स्तर ऊचां चाहिए जो तुम लोगो के पास नहीं है इसीलिए तुम लोग अपनी अक्ल न ही लगाओ तो ही अच्छा है। हमारे शास्त्रों से ही पूरे विश्व में ज्ञान फैला है जिसको अपनाकर और देशो ने तरक्की की है हमें उनकी नक़ल नहीं बस अपना खोया हुआ स्वाभिमान और आत्मविश्वास पाना है । इस मैकाले शिक्षा पद्दति और पूर्व में मुगलों और अंग्रेजों द्वारा यहाँ के शास्त्रों, पुस्तकालयों आदि को नष्ट करके कितना नुक्सान इस राष्ट्र को हुआ है इसकी वर्तमान स्तिथि देख कर अनुमान हो जाता है। किन्तु फिर भी वेद और कुछ शास्त्र बचे हुए हैं और यदि लोगो ने द्रढ़ता और पुरषार्थ दिखाया तो एक दिन यह देश अपने खोये हुए स्वाभिमान और आत्म विश्वास को पा लेगा फिर तुम जैसे कठमुल्लों और छदम सेकुलर फौज को गायब होते देर नहीं लगेगी और यह राष्ट्र दिन दूनी रात चोगनी तरक्की करेगा।

."सूर्य किसी लोक या केन्द्र के चारों ओर नहीं घूमता जो सविता अर्थात सूर्य ।।। अपनी परिधि में घूमता रहता है किन्तु किसी लोक के चारों ओर नहीं घूमता।" (यजुर्वेद, 033:मं। 43/सत्यार्थ0, अष्‍टम। पृ। 155) - यह बात भी सृष्टि नियम के विरूद्ध है। एक बच्चा भी आज यह जानता है कि सूर्य न केवल अपनी धुरी पर बल्कि किसी केन्द्र के चारों ओर भी पूरे सौर मण्डल सहित चक्कर लगा रहा है। तब सृष्टिकर्ता परमेश्वर अपनी वाणी वेद में असत्य बात क्यों कहेगा? देखिये - `सूर्य अपनी धुरी पर 27 दिन में एक चक्कर पूरा करता है।

समीक्षा - फिर से छल और कुतर्क यहाँ इस प्रकरण में एक प्रश्न "सूर्य ग्रहों अथवा लोकों के चारो तरफ घूमता है या लोक अथवा ग्रह उसके चारो तरफ घूमते हैं" के उत्तर में कहा गया है कि सूर्य किसी लोक या केंद्र के चारो तरफ नहीं घूमता बल्कि ये लोक अथवा ग्रह सूर्य के चारो और घूमते हैं और सूर्य अपनी परिधि पर घूमता है जिस केंद्र का आप यहाँ उदाहरण दे रहे हैं उसका कोई प्रसंग ही नहीं आया वहां पर क्यों आप अपने छल से लोगो को बहकाने का असफल प्रयास कर रहे हैं।

इन आरोपों के अलावा और भी आरोप हैं जो यहाँ छूट गए हैं उनका उत्तर अगले भाग में दिया जायेगा थोडा धैर्य रखिये।

बुधवार, 3 फ़रवरी 2010

दयानंद जी ने क्या खोजा क्या पाया (भाग १)

मुस्लिम लोगो को और कुछ हिन्दुओं को भी भारतीय या हिन्दू संतो में सबसे अधिक समस्या मह्रिषी दयानंद सरस्वती जी से होती है, काफी लोगो पता है कि ऐसा क्यों है पर फिर भी बहुत से लोग अनभिज्ञ हैं. किसी गुमनाम लेखक डॉ अनवर जमाल ने एक पुस्तक ही लिख डाली "दयानंद जी ने क्या खोजा क्या पाया" और एक सरफिरा उमर कैरानवी इन्टरनेट पर उसके प्रचार में दिन रात तत्पर है.और भी कुछ लोग लगे हैं इस प्रचार में और इसके साथ-२ मुहम्मदसाहब को हिन्दू धर्म ग्रंथो के अनुसार अंतिम अवतार घोषित करने लगे हैं ताकि हिन्दू भी उनके छलावों में आ कर उनके असत्य को सत्य मान ले. ये लोग हिन्दू धर्म ग्रंथो में से कुछ शब्द और वक्तव्य ऐसे निकालते हैं जैसे "मकान" और "दुकान" में से कान निकाल कर उसकी व्याखा करने लगे. उदाहरण के तौर पर मेरे पास एक फॉरवर्ड होकर ईमेल आई जिसमें एक पॉवर पॉइंट प्रेसिंटेशन में एक स्थान पर एक वैदिक मन्त्र में एक शब्द "अहमिधि" को हाई लाइट करके यह बताया गया है कि देखो वेदों में भी लिखा है "उस अंतिम अवतार का नाम अहमद होगा और वो ईश्वर से मजहबी नियम लेगा और वो सत्य से परिपूर्ण होंगे". एक स्थान पर भविष्य पुराण में महामद शब्द को दिखा कर दर्शाया गया है.

अब एक बुद्दिमान व्यक्ति को तो इनका मिथ्या प्रचार और बुद्धि का दिवालियापन नज़र में आता है किन्तु कुछ हिन्दू अवश्य भ्रम और शंका में पद कर सोचने लगते हैं कहीं ऐसा वास्तव में तो नहीं है और आधुनिक रिलिजन सेकुलर उनकी शंका में आग में घी का कार्य करते हैं, हालाँकि अभी हिन्दुओं पर इनके दुष्प्रचार का इतना असर नहीं दिखता किन्तु जैसे केंसर का अगर पहले ही स्टेज पर निदान आवश्यक है उसी प्रकार इनको रोकना आवश्यक है. सर्वप्रथम तो उन शसंकित हिन्दुओं को आत्म मंथन करना चाहिए की क्या कभी किसी मान्य वैदिक पुस्तक के भाष्यार्थ में किसी विद्वान ने कहीं इस तरह की बाते लिखीं है, क्या इस्लाम के जन्म से पहले कोई ऐसा विद्वान नहीं हुआ जो वैदिक पुस्तकों के इस मंतव्य को समझ सका कि अहमद या मोहम्मद नाम का अवतार होगा, हाल तो हमारी किसी भी मान्य प्रमाणिक पुस्तक में अवतारवाद को ही मान्यता ही नहीं है और जिस भविष्य पुराण कि ये व्याखा करते फिरते हैं वो वैसे भी कोई हिन्दुओं की प्रमाणिक पुस्तक नहीं है तो उसमें या अन्य पुराणों का उदाहरण देना ही गलत है. किन्तु मुझे इतना आभास भी है कि इन पुराणों में भी ऐसा नहीं लिखा और ये उनकी भी गलत व्याखा करते हैं. वैदिक संस्कृत का जिन्हें अ ब स भी नहीं पता वो वेदों के मंत्रो कि व्याखा करने निकले हैं. जैसे जाकिर नाईक जैसे जोकर वैदिक पुस्तकों के पृष्ठ नंबर, अध्याय नंबर ऐसे बोलते हैं जैसे उन्हें हिन्दू धर्म ग्रंथों का कितना गहन अध्यन किया हुआ है. ऐसे इस्लामिक वकीलों जो तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश करते हैं यदि हिन्दू अपने विद्वानों की बातों को छोड़ कर इन पर विश्वास करेगा वो इस नरकीय मूड़ता भरे अंधविश्वास में जा फंसेगा. मैंने रवि शंकर जी और जाकिर नाइक जी के यू ट्यूब पर एक डीबेट कांसेप्ट ऑफ़ गोड देखी और मुझे ये आश्चर्य हुआ कि रवि शंकर जी जिनको लोग श्री श्री रवि शंकर जी बोलते हैं जाकिर नाइक के कुतर्को का ढंग से उत्तर ही नहीं दे पाए, तभी मुझे अहसास हुआ हम हिन्दुओं के इन धार्मिक गुरुओं के ज्ञान और साहस का जो एक चालाक लोमड़ी से भी मात खा गए और दुःख के साथ कहना पड़ता है न ही वो हिन्दुओं के दर्शन को जनता के सामने ढंग से रख पाए बल्कि जाकिर नाइक ने कुरान को अपने उलटे-सीधे कुतर्को से ईश्वरीय पुस्तक घोषित करके रवि शंकर जी को उसकी एक प्रति की भेंट दे दी.

खैर मैं बात दयानंद सरस्वती जी क़ी कर रहा था. उनके द्वारा लिखित सत्यार्थ प्रकाश के १४वें अध्याय में मुस्लिम मजहब ग्रन्थ कुरान की संक्षिप्त में समीक्षा की गयी है जिसमें कुरान की मिथ्या बातों का खंडन किया गया है और कहा है जैसे हांडे में कुछ चावल देखकर ही पूरे चावलों के कच्चे या पकने का पता लग जाता है उसी प्रकार बुद्धिमान व्यक्ति को इन बातों को पढ़कर समझ जाना चाहिए कि यह पुस्तक ईश्वरीय नहीं हो सकता. वैसे इस पुस्तक में १३वें अध्याय में इसाई मत का और ११वें व १२वें में अनेक हिन्दू सम्प्रदायों की मिथ्या बातों का भी तर्कपूर्ण खंडन है और पूरी पुस्तक में हिन्दुओं के वास्तविक सनातन, वैदिक अथवा हिन्दू धर्म के वास्तविक दर्शन और सिद्दांतों को अत्यंत तर्कपूर्ण तरीके से श्रेष्ठ घोषित किया गया है जोकि किसी भी साम्प्रदायिक व्यक्ति को आराम से यह बात पचती नहीं है. इसमें हिन्दुओं के आधुनिक अनेक सम्प्रदायों के मूल पर भी तर्कपूर्ण प्रहार किया गया है जिस कारण यह पुस्तक अनेक निष्टावान हिन्दुओं को भी हज़म नहीं होती है किन्तु एक बुद्दिमान व्यक्ति इसको निष्पक्षता से पढ़े तो इस पुस्तक को न केवल बार-२ पढता है वरन हिन्दू समाज में फैले अनेक कुरीतियों , अंधविशवासों आदि के मूल को समझ जाता है और वास्तविक वैदिक दर्शन के ज्ञान के प्रकाश को देख कर स्तब्ध और चमत्कृत हो जाता है और वास्तविक संतुष्टि उसको प्राप्त होती है.

सहस्रों वर्षो के पश्चात् लगता है दयानंद सरस्वती जी ने अनेक मतों का विश्लेषण करके जनता के आगे सत्य वैदिक दर्शन रखा है अन्यथा आधुनिक हिन्दू संत तो सभी मतों को सामान शिक्षा वाले बताते-२ नहीं थकते जबकि विश्व में अनेकों मतों के मध्य कितना संघर्ष है यह कोई आम व्यक्ति भी जानता है यदि सभी मत सत्य मानवता भरी समान शिक्षा देने वाले होते तो विभिन्न मत ही क्यों होते, भिन्नता है तभी तो मतभेद है अन्यथा एकमत ही न होता.

समय की अनुपलब्धता के कारण मैं अभी यह लेखन यहीं समाप्त कर रहा हूँ शेष बाद में

गुरुवार, 21 जनवरी 2010

मिथ्या प्रचारको को मेरा सन्देश

मैंने अभी हाल ही में ये ध्यान दिया है कुछ मुस्लिम ब्लोगकर्ता अपने ब्लॉग पर और अपनी टिप्पणियों के माध्यम से कुछ पुस्तकों का प्रचार बड़े ही लगन और परिश्रम से कर रहे हैं, उन पुस्तकों से उधृत बातों का वो अपने कुतर्कों में भी स्थान-स्थान पर वर्णन करते हैं। वैसे तो मैं उनके इन अनर्गल प्रलापों पर ध्यान नहीं देता किन्तु मुझे जब बड़ा आश्चर्य होता है कि उनके इस काम में कुछ हिन्दू भी योगदान दे रहे हैं। मुझे हिन्दू, मुस्लिम या इसाई से कोई बैर नहीं है किन्तु लोगो के कुतर्कों और मनगढ़ंत से आपत्ति है चाहे वो हिन्दू हो , मुस्लिम हो या इसाई, किन्तु जब कोई हिन्दू अपने धर्म से अन्भिज्ञ होकर कुतर्क का साथ देता है तो ऐसा लगता है कि इन मुस्लिम ब्लोगकर्ता का उद्देश्य पूर्ण हो गया, हालाँकि मैं जनता हूँ इन हिन्दुओं में अधिकतर हिन्दू न हो कर नए रिलिजन राष्ट्र विरोधी तथा हिन्दू विरोधी सेकुलरिज्म से आते हैं पर फिर भी इन लोगो की बातों में कुछ भोले हिन्दू फंस ही जाते हैं। तो इस कारण मैं इनकी इन बेसिरपैर की बातों से भरी पुस्तकों की उन बातों का जिसका ये प्रचार कर रहे हैं उसको तार्किकता की कसौटी पर रखने का समय-२ पर अपने ब्लॉग द्वारा प्रयास करूंगा। मेरे एक लेख पर टिप्पणी द्वारा छोड़े गए हाइपरलिंक से खुली एक पुस्तक "दयानंद ने क्या खोजा क्या पाया" जोकि किसी डॉ। अनवर जमाल द्वारा लिखित है उसकी संकीर्ण और मुर्खता भरी बातों को यहाँ रख कर उसकी समीक्षा भी करूंगा और कुछ मुस्लिम ब्लोग्कर्ताओं द्वारा मिथ्या प्रचारित कि हिन्दू धर्म ग्रंथो में लिखा है मोहम्मद साहब अंतिम अवतार हैं उसको भी तर्क की कसौटी पर रखा जायेगा। दयानंद सरस्वती से मुसलमानों को क्यों सबसे अधिक समस्या होती है जिन लोगो को ये नहीं पता ये बात भी मैं बताऊँगा। कृपया समय-समय पर अपने विचार टिप्पणियों के माध्यम से अवश्य दें।


मैं कोई आर्य समाज का पंजीकृत सदस्य नहीं हूँ और न ही इसकी कोई अनिवार्यता मानता हूँ बल्कि आर्य समाज हिन्दुओं की मूलभूत विचार धारा है वास्तव में दयानंद सरस्वती उसके प्रवर्तक न होकर पोषक हैं। जैसा की उन्होंने अपनी पुस्तक सत्यार्थ प्रकाश में स्वयं कहा है की मैं कोई नया मत नहीं चला रहा हूँ केवल सत्य को सामने रखने का मेरा उद्देश्य है। उस समय अंग्रेजो द्वारा यह बहुत अधिक प्रचारित किया जा रहा था कि आर्य एक जातिसूचक शब्द है और यह जाति बहार से भारत वर्ष में आई थी जिसने यहाँ के मूल निवासियों द्रविड़ पर आक्रमण किया और इस देश पर अधिकार कर लिया। इस असत्य के प्रचार से उनको लाभ यह हुआ कि एक तो भारत को २ वर्गों में विभाजित कर दिया और दूसरे लोगो के स्वाभिमान और देश प्रेम पर आघात किया, कुछ लोग इसको सत्य मानकर सोचने लगे की पहले हमारे पूर्वजों ने आक्रमण करके यहाँ अधिकार जमाया अब अंग्रेजों ने कर लिया तो क्या अंतर पड़ता है। अंग्रेजो की प्रतिनिधि कांग्रेस इसका प्रचार अब भी निरंतर करती आ रही है और इसके अलावा इतिहास के सारे असत्य तथ्य जोकि मैकाले पद्दति कहलाती है आज भी ज्यूँ के त्यूं भारत में पढाये जा रहे हैं। खैर अभी यहाँ इसके बारे में अधिक न लिखते हुए मैं यह बताना चाह रहा था की दयानंद सरस्वती ने आर्य समाज नाम उनके कुप्रचार के विरुद्ध ही चुना था की भारत में पूर्व-पश्चिम, उत्तर-दक्षिण में रहने वाले समस्त हिन्दू ही आर्य कहलाये जाते हैं न की कोई बहार से आक्रमणकारियों की टोली यहाँ पर आई थी। उन्होंने हिन्दुओं में फैले हुए अंधविश्वासों और पाखंडों को समाप्त करने की द्रष्टि से लोगो से कहा कि इन मुर्खता भरे क्रिया-कलापों को छोड़ कर हिन्दुओं के विद्वानों के समाज अथवा आर्य समाज में आ जाओ। उनके मरने के पश्चात् आर्य समाज में उसके नाम के विपरीत काफी सारे अविद्वान और चालाक लोग भी शामिल हो गए जैसे कि फिलहाल स्वामी अग्निवेश जैसे लोग हैं। बहुत से मुर्ख अपने को आर्य समाजी बताते हैं और कहते हैं कि हम हिन्दू ही नहीं हैं या फिर बहुत से गैर अनार्य समाजी कहते हैं कि आर्य समाज हिन्दुओं के विरुद्ध मत हैं। अब यहाँ इसे इन लोगो की नसम्झी, अज्ञानता या बुद्धि का दिवालियापन ही कह सकते हैं कि जिसने इस आर्य समाज कि नीव रखी उसकी बातों को अनसुना करके अनाप-शनाप बकते हैं। मैंने एक बात देखी है अधिकतर लोग सत्य का अन्वेषण कम और सुनी हुई बातों पर आसानी से विश्वास कर लेते हैं। मनुष्य को ईश्वर ने इतना बुद्धिमान तो बनाया है कि बिना तर्क के किसी बात को नहीं मानना चाहिए किन्तु फिर भी बहुत से व्यक्ति आसानी से गलत बातों को स्वीकार लेते हैं और कुछ मनुष्यों को आप कितना ही तर्क देलें वो फिर भी अपनी बात मनवाने के लिए कुतर्कों के सहारे हमेशा व्याकुल रहते है। सच में मानव कि बुद्धि बड़ी जटिल है और वो वोही मानना चाहती है जैसे उसको संस्कार मिले हैं चाहे सही या गलत और कुछ बुद्धिमान लोग ही उन गलत संस्कारों को ज्ञान से नाप-तौलते हैं अन्यथा बाकी तो सब भेड़-बकरियों कि तरह ही व्यवहार करते हैं।

जैसा की पूर्व में मैं १-२ बार पहले भी लिख चूका हूँ १२५ वर्ष पहले मह्रिषी दयानंद सरस्वती ने एक बात दिशाविहीन हिंदू जनता के बारे में कही थी की हिंदू एक लुप्त प्रायः वर्ग है। आज यह उनकी बात एक बुद्धिमान व्यक्ति फलित होते देख सकता है ऐसा उन्होंने क्यों कहा था। आज आर्यों या हिन्दुओं के अपने गृह भारत वर्ष में आतंकवादी घोषित किया जा रहा है और ये कार्य हिन्दुओं द्वारा ही हो रहा है। न अपने देश में वरन पूर्ण विश्व में इसको बड़े ही चालबाजी से प्रसारित किया जा रहा है। जो नेता आज तक आतंकवाद को मुस्लिम आतंकवाद कहने से डरते हैं वो आज हिंदू आतंकवाद कहने में बेहिचक गर्व महसूस करते हैं और ये हिंदू जनता मौन धारण किए हुए हाथ पर हाथ रख कर बैठी हुई है। ये तो ये बात हुई जैसे किसी के गृह में चोरी होने पर उसके गृह स्वामी पर ही आरोप मढ़ दे। सर्वप्रथम हिन्दुओं को आत्म मंथन विचार करना चाहिए की क्या सनातन धर्म या वैदिक धर्म या हिंदू धर्म का अनुसरण करने वाला एक आतंकवादी हो सकता है। कुछ सेकुलर लोग महाभारत को भी आतंकवाद की संज्ञा देते हैं क्युकी श्री कृष्ण ने इसको धर्म युद्ध कहा था। इसी प्रकार गुरु गोविन्द सिंह को भी आतंकवादी करार देते हैं उनकी मुर्खता के तो कहने ही क्या। मैं एक बात उनलोगों से पूछना चाहता हूँ की उनको धर्म का अर्थ भी पता है या नही उनकी अल्प और संकीर्ण बुद्धि धर्म, मजहब और रिलिजन को पर्यावाची शब्द समझती है जबकि धर्म और बाकि सब में धरती आकाश का अंतर्भेद है। सनातन या हिंदू धर्मं मनुष्य को मनुष्यत्व के मूल भूत सिद्धांत जैसे की ब्रहमचर्य, ईश्वर ध्यान, समाधी सज्जनों से प्यार, न्याय, दुष्टों को दंड, सभी जीवधारियों पर दया भाव आदि अनेक जीवन के सिद्धांतों के साथ-२, विज्ञान, गणित और जगत रहस्यों को समझाता या सिखाता है।


वादी-प्रतिवादी किसी बात पर शास्त्रार्थ करते हैं तो उनका उद्देश्य सत्य को जानना और उसका निर्धारण करना होता है। और इस शास्त्रार्थ या तर्क-वितर्क के कुछ नियम होते हैं जभी निष्पक्षता से सत्य का निर्धारण संभव होता है अन्यथा वो मुर्खता भरा प्रलाप ही होता है। उदाहरण के तौर पर कोई यदि ये कहे कि जल में उष्णता होती है अर्थात स्वाभाव से जल गर्म होता है क्योंकि लोग बोलते हैं पानी या जल से मैं जल गया हूँ तो उसके उत्तर में मैं यह कहता हूँ लोक व्यवहार में ऐसा बोलते हैं कि पानी या जल से मैं जल गया हूँ किन्तु उस जल में उष्णता अग्नि की ही होती है क्योंकि बिना अग्नि के संपर्क में आये बिना जल में उष्णता नहीं आ सकती जैसे गर्म लोहे की छड़ी में दाहकता भी अग्नि की होती है लोहे की नहीं और ये हम प्रत्यक्ष अनुभव भी कर सकते हैं और यदि ऐसा नहीं है तो आप मुझे इसका प्रमाण दीजिये। अब प्रतिवादी को पता है की सामने वाला सही कह रहा है किन्तु फिर भी अपनी बात मनवाने के लिए मैं ये कह रहा है ऐसा नहीं है मैंने तो जल के प्राकृतिक गर्म स्रोत देखे हैं मैं नहीं मानता या फिर ये कहने लगे की बड़ा ज्ञानी बनते हो तो ईश्वर को सिद्ध करके दिखाओ या यह कहने लगे की तुम्हारे धर्म में तो ऐसा या वैसा लिखा है या फिर कोई और बात विषय के अनुरूप न कहके कुछ भी कहने लगे तो सबसे पहले तो गर्म स्रोत वाली बात को कह कर वह अपनी पहली बात को ही दोहरहा रहा है जबकि उसका तर्क पहले ही दिया जा चुका और उसकी दूसरी बात सिद्धांतविरुद्ध बात कहलाती है इसका मतलब है प्रतिवादी के पास कोई तर्क नहीं है और वह विषय से हटा रहा है और सत्य को स्वीकारना नहीं चाहता अर्थात वो हार गया है। इसके अलावा और भी कुछ नियम हैं किन्तु मैं उनको यहाँ अभी इसी लेख में नहीं लिखता। यहाँ ब्लॉग जगत में अधिकतर इन्ही नियमों का उलंघन होता है।मैं यहाँ यह इसलिए लिख रहा हूँ कि बहुत से लोग ऐसा प्रयास करेंगे या कर सकते हैं किन्तु बुद्धिमान व्यक्ति को उनके छल भरे कुतर्कों को समझना चाहिए।

मैं समय न मिलने और कुछ व्यक्तिगत कारणों से बहुत ही कम लिख पा रहा हूँ पर मैंने अब यह सोचा है की कम से कम प्रत्येक सप्ताहन्त में एक लेख अवश्य लिखने का प्रयास करूँगा। यह लेख पहले से ही बहुत लम्बा हो गया है इसीलिए इसको यहीं समाप्त करते हुए अगले भविष्य में कुछ पुस्तकों की तर्कसंगत समीक्षा के साथ-२ ऐसे पहलूँओं पर विचार डालूँगा जो काफी चर्चित हैं विवादस्पद रहते हैं जैसे "शाकाहारी या मासांहारी", "क्या ईश्वर है", "क्या मूर्तिपूजा छोड़ने से हिन्दू मुस्लिम हो जायेंगे", "क्या मूर्तिपूजा महत्वपूर्ण है", "अहिंसा परमोधर्मः, सर्वधर्मसमभावः, अतिथिदेवोभवः का भावार्थ" आदि अनेक ऐसे प्रवाद हैं जिनका निदान होना आवश्यक है। और सोचता हूँ जाकिर नाइक जैसे वकीलों की बातो का भी खंडन होना आवश्यक है तो उस पर भी लिखने की इच्छा है। मैं अपने लेखो में सदा यह प्रयास करूंगा की प्रत्येक बात तर्कपूर्ण हो और आशा करता हूँ लोगो को यह कार्य पसंद आएगा।

रविवार, 15 नवंबर 2009

नियोग व्यवस्था

आजकल इन्टरनेट कुछ ब्लोग्स आदि पर वैदिक धर्म को नियोग का नाम लेकर उसका बड़ा मजाक उड़ाया जाता है मैंने एक मुस्लिम ब्लोग्कर्ता के नियोग संबधी लेख पर एक टिप्पणी की थी जोकि उसने कुछ दिन बाद वहां से डिलीट कर दी ये अच्छा रहा कि वो टिप्पणी मैंने अपने गूगल डोक्युमेंट में सेव कर ली थी तो मैंने सोचा क्यों न मैं उसको अपने ब्लॉग पर प्रकाशित करता हूँ ताकि लोगो की इस बारे में भ्रान्ति दूर हो सके. प्रतीक्षा रहेगी कि आप लोग इस बारे में क्या सोचते हैं?

उस ब्लोग्कर्ता के अनुसार

शीर्षक:क्या `नियोग´ जैसी शमर्नाक व्यवस्था ईश्वर ने दी है?
शनिवार, ३१ अक्तूबर २००९

हिन्दू धर्म में विधवा औरत और विधुर मर्द को अपने जीवन साथी की मौत के बाद पुनर्विवाह करने से वेदों के आधार पर रोक और बिना दोबारा विवाह किये ही दोनों को `नियोग´ द्वारा सन्तान उत्पन्न करने की व्यवस्था है। एक विधवा स्त्री बच्चे पैदा करने के लिए वेदानुसार दस पुरूषों के साथ `नियोग´ कर सकती है और ऐसे ही एक विधुर मर्द भी दस स्त्रियों के साथ `नियोग´ कर सकता है। बल्कि यदि पति बच्चा पैदा करने के लायक़ न हो तो पत्नि अपने पति की इजाज़त से उसके जीते जी भी अन्य पुरूष से `नियोग´ कर सकती है। हिन्दू धर्म के झंडाबरदारों को इसमें कोई पाप नज़र नहीं आता।
क्या वाक़ई ईश्वर ऐसी व्यवस्था देगा जिसे मानने के लिए खुद वेद प्रचारक ही तैयार नहीं हैं?
ऐसा लगता है कि या तो वेदों में क्षेपक हो गया है या फिर `नियोग´ की वैदिक व्यवस्था किसी विशेष काल के लिए थी, सदा के लिए नहीं थी । ईश्वर की ओर से सदा के लिए किसी अन्य व्यवस्था का भेजा जाना अभीष्ट था।
अब सवाल है कि कौन सी व्यवस्था अपनी जाये ? इसका सीधा सा हल है पुनर्विवाह की व्यवस्था
जी हाँ, केवल पुनर्विवाह के द्वारा ही विधवा और विधुर दोनों की समस्या का सम्मानजनक हल संभव है।
ईश्वर ने क़ुरआन में यही व्यवस्था दी है।

मेरा उत्तर -

नियोग व्यवस्था को लोग गलत तरीके से समझते हैं सबसे पहले तो मैं कहना चाहूँगा कि वैदिक या हिन्दू धर्म में अपनी पत्नी के सिवाय दूसरी स्त्री से सम्बन्ध तो दूर मन से सोचना भी पाप है और ऐसा ही स्त्री के लिए है. अब यदि स्त्री का पति, या पुरुष की पत्नी कोई मर जाता है तो सबसे पहले तो उसको ब्रह्मचर्य के पालन की आज्ञा है किन्तु यदि वो व्यक्ति या स्त्री उस श्रेणी में नहीं आते हैं और संतान उत्पत्ति चाहते हैं तो समाज की सहमती से विवाह के समान नियोग व्यवस्था है. और इस व्यवस्था का उद्देश्य सिर्फ संतान उत्पत्ति करना ही होता है वैसे भी हमारे धर्म के अनुसार वैवाहिक जीवन में भी स्त्री-पुरुष का शारीरिक सम्बन्ध केवल संतान पैदा करने के लिए ही होना चाहिए और इतना न कर सकें तो कम से कम होना चाहिए किन्तु उनको प्यार से रहना चाहिए जैसे कोई प्रेमी-प्रेमिका हो. और ये आजकल दीखता भी है प्रेमी-प्रेमिका में प्यार होता है जब तक उनके बीच शारीरिक सम्बन्ध न हो एक आकर्षण में बंधे होते हैं वो, किन्तु विवाह के पश्चात उनका ध्येय केवल शारीरिक सम्बन्ध रह जाता है इस कारण ही प्रेम में कमी आ जाती है और आकर्षण विकर्षण में परिवर्तित होने लगता है . वैदिक धर्म ये नहीं कहता कि विवाह में शारीरिक सम्बन्ध वर्जित है किन्तु उसका उद्देश्य केवल संतान उत्पत्ति के लिए प्रेमपूर्वक ही हो तो उनके मध्य बेहतर सम्बन्ध और शुद्ध प्रेम रहता है. ये बात आपको शायद अजीब लग रही हो क्योंकि आज कल तो केवल सेक्स को ही प्रेम माना जाता है पर साथ-२ आप ये भी देख सकते हैं कि आज-कल के वैवाहिक जीवन में कितने ही राड़-द्वेष-क्लेश उत्पन्न हो चुके हैं, कितने विवाह-विच्छेद होने लगे हैं.

नियोग व्यवस्था विवाह की तरह ही है किन्तु उसका नाम नियोग इसलिए रखा गया है ताकि समाज में अव्यवस्था न हो. उदाहरण के तौर पर स्त्री के पति की मौत के पश्चात पति की आर्थिक संपत्ति पर पत्नी का अधिकार होता है और यदि वह पुनर्विवाह करती है तो उसके पूर्व पति की संपत्ति भी नए पति की हो जायेगी जिस कारण अव्यवस्था फैलेगी इस कारण इसको नियोग नाम दिया गया जोकि विवाह की भांति समाज के सहमती से ही संतान उत्पत्ति के लिए होता है किन्तु इसमें स्त्री के पूर्व पति की संपत्ति पर नियोगित पुरुष का अधिकार नहीं होता है. यदि नियोगित पुरुष भी मर जाये और स्त्री दूसरी संतान पैदा करना चाहे तो उसी प्रकार से समाज की सहमती से दुसरे व्यक्ति को नियोगित किया जाता है. इसमें नियम यह है कि विधवा स्त्री के साथ वो ही नियोगित होगा जिसकी पत्नी मर चुकी है और इसी तरह से किसी व्यक्ति के लिए भी. विवाहित व्यक्ति या स्त्री का नियोग उसी अवस्था में संभव है यदि उनमें से एक संतान उत्पत्ति के लायक नहीं है और वो संतान चाहते हैं तो सर्व सहमति से पति या पत्नी किसी से विवाह की भांति नियोग कर सकते हैं किन्तु उनकी संतान के माता-पिता वैवाहिक पति-पत्नी ही होंगे. छिपकर सम्बन्ध बनाने से बेहतर है आपसी सहमती से हो वरना वो व्यभिचार कि श्रेणी में आता है. वैदिक मतानुसार ये माना जाता है और ये सही लगता भी है यदि कोई व्यक्ति अपनी पत्नी से या स्त्री अपने पति से शारीरिक सम्बन्ध बना चुके हैं और उनमें से किसी एक मर जाने पर पुनर्विवाह में सात्विक प्रेम की कमी रहेगी क्योंकि उनका सम्बन्ध अपने पूर्व पति या पत्नी से हो चुका है और शुद्ध प्रेम विवाह की सबसे पहली कसौटी है, इस कारण नियोग एक आपातकालीन व्यवस्था है संतान उत्पत्ति के लिए है जो विवाह की भांति समाज की सहमती से होती है, यह व्यवस्था समाज में व्यभिचार को और सामाजिक व्यवस्था को रोकने के लिए है. ये बहुत से लोगो को पहली बार में गलत लग सकती है किन्तु गहराई से अनुसंधान करके सोचो तो इसमें बुराई नज़र नहीं आती. पर यह व्यवस्था एक आदर्श समाज में ही चल सकती है नाकि आजकल इस व्यभिचारी समाज में जिसमें विवाह के पश्चात भी आदमी इधर-उधर व्यभिचार के लिए भटकता रहता है और विवाह का प्रयोजन केवल शारीरिक सम्बन्ध तक ही सीमित रहता है, तो आज के हिसाब से पुनर्विवाह ही बेहतर विकल्प है क्योंकि जब पहले में ही शुद्ध प्रेम नहीं है तो दूसरे के बारे में क्या सोचें. इसी कारण महर्षि दयानंद ने भी अपने काल में अनेक विधवाओं का पुनर्विवाह करवाया जो कि समाज के द्वारा शोषित हो रही थी.

इसको आप एक तरह का पुनर्विवाह भी कह सकते हैं जिसमें नाम और कुछ नियमों का अंतर है. आप इसी बात से अनुमान लगा सकते हैं कि नियोगित पुरुष भी स्त्री का पति ही कहलाता है. जिस प्रकार विवाह में समाज की सहमती से पुरुष और स्त्री के शारीरिक सम्बन्ध करने कि अनुमति मिल जाती है और उससे किसी को घृणा नहीं होती उसी प्रकार इसमें भी पुरुष और स्त्री के साथ समाज की सहमती होती है तो इसमें क्या घृणा वाली बात है किन्तु यह एक आपातकालीन अवस्था है जैसे कि मैंने यहाँ पूर्व में वर्णित किया है और आज कि द्रष्टि से पुनर्विवाह ही सही है और यह हिन्दू धर्म कि विशेषता भी है कि समय के अनुसार विद्वानों द्वारा कुछ सामाजिक परिवेश को देखते हुए बदलाव किया जा सकता है क्योंकि हम लोग लकीर के फ़कीर नहीं है. किन्तु यह भी सत्य है कि यह व्यवस्था तार्किक है किन्तु आज समयानुकूल नहीं है. बुराई करने वाले तो अपने अनुसार चीजों का अर्थ लगा लेते हैं और बेढंगी व्याखा करते हैं उनका कोई इलाज संभव नहीं है. सब से मजे की बात यह है कि बुराई करने वाले भी अधिकतर चरित्रहीन और व्यभिचारी ही होते हैं. आज मनुष्य की यह स्तिथि है कि अपने चरित्र में लाख बुराइयां हो किन्तु अपने को श्रेष्ठ घोषित करने में और दूसरों पर ऊँगली उठाने में वो कभी पीछे नहीं रहेगा.

एक बात और नियोगित पुरुष या स्त्री को चुनने से पहले विवाह कि भांति उनकी इच्छा भी इसमें आवश्यक है इसको बलात किसी पर थोपा नहीं जा सकता जैसे कि कालान्तर में कुछ समाज के लोगो ने इसका अपनी अय्याशी के लिए फायदा उठाने का प्रयास किया है. नियोग व्यवस्था में बहुत लोग देवर का गलत अर्थ सोचते हैं उनके अनुसार देवर केवल पूर्व पति का छोटा भाई ही होता है क्यूंकि लोक-व्यवहार में देवर पति के छोटे भाई को ही बोला जाता है किन्तु शास्त्र में देवर का अर्थ दूसरे पति के लिए होता है वो कोई भी सर्वसहमति से पति के समान चुना हुआ नियोगित पुरुष होता है. जिस प्रकार कई स्थानों पर शास्त्रों में ईश्वर को अग्नि, आकाश, इन्द्र आदि नामों से प्रसंगवश पुकारा जाता है किन्तु उन शब्दों का लोक-व्यवहार में अलग अर्थ भी होता है. तो शब्दों के अर्थ कि निश्चितता के लिए उसके प्रसंग पर अवश्य ध्यान देना चाहिए नहीं तो अर्थ का अनर्थ हो जाता है.

शनिवार, 10 अक्टूबर 2009

साँख्य दर्शन

अनेक शताब्दियों से यह प्रवाद रहा है की महर्षि कपिल अनीश्वरवादी थे और उनके द्वारा लिखित सांख्य दर्शन इश्वर को नहीं मानता। परन्तु साँख्य दर्शन का गंभीर तर्कपूर्ण अध्यन इस परिणाम पर नहीं पहुँचता तो यह प्रश्न यह उठता है इस प्रवाद का रहस्य क्या होगा। साँख्य शास्त्र के साथ कपिल का नाम आदि काल से जुडा हुआ है। इस बात में समस्त भारतीय दर्शन निर्विवाद रूप से एकमत है की साँख्य के प्रवक्ता आदि विद्वान परम ऋषि कपिल है। कपिल के अनंतर साँख्य दर्शन में अनेक ऐसे आचार्य हें हैं जिन्होंने इस विषय में कपिल के विचारों से अपना मतभेद प्रस्तुत किया है। उनमें से एक मुख्य आचार्य वार्षगण्य है। उसका कोई ग्रन्थ उपलब्ध नहीं है पर साँख्य के व्याख्या ग्रंथो में उसके कतिपय उद्धृत सन्दर्भ उपलब्ध होते हैं जिनके अनुसार वार्षगण्य के विचारों का ज्ञान प्राप्त होता है उसका एक सन्दर्भ युक्तिदिपिका में उद्धृत है जिसके अनुसार आदिसर्ग में प्रधान की प्रवृत्ति चेतना रहित हुआ करती है इससे स्पष्ट है प्रकृति की प्रवृत्ति में चेतन प्रेरणा की अपेक्षा स्वीकार नहीं करता, यह मान्यता जगत के प्रति ईश्वर के नियंत्रण को हटा देती है। भारतीय साहित्य पर साँख्य के अनुपम प्रभाव का लाभ उठाने की भावना से अनीश्वरवादी बोद्ध विद्वानों ने अपने उदय काल में वार्षगण्य के इस सिद्दांत का साँख्य के नाम से प्रचार किया जो कालांतर में साँख्य के प्रवक्ता कपिल के होने से कपिल पर आरोपित हो गया। उसके पश्चात उक्त विचार के प्रभाव में मध्य-कालिक विद्वानों द्वारा साँख्य के ईश्वरासिद्धेः सूत्र के वास्तविक आर्थ समझने में भ्रान्ति हो जाने के कारण इस विचार को काफी हवा दी गयी और इस आधार पर कपिल को अनीश्वरवादी मान लिया गया।

वस्तुतः कपिल इस साँख्य सूत्र में जड़ प्रकृति को जगत का मूल उपादान स्वीकार करने के कारण ईश्वर को जगत का केवल अधिष्ठाता व नियंता मानते हैं। इसी कारण प्रकृति के अतिरिक्त ईश्वर तथा अन्य किसी तत्व को जगत के उपादान होने का निषेध किया गया है। ईश्वरासिद्धेः सूत्र में भी जगत के उपादानभूत ईश्वर को असिद्ध बताया है। सर्वजगतनियंता ईश्वर का यहाँ निषेध नहीं है। पूर्वापर प्रसंग के अनुसार यह अर्थ किस प्रकार स्पष्ट होता है यह उस सूत्र के प्रकरण से ही पता चल जाता है। साँख्य के अन्य प्रसंगों में भी ईश्वर के जगतनियंता व अधिष्ठाता होने तथा प्रकृति के जगादुत्पादन होने का विस्तृत वर्णन है।

जिस प्रकार किसी घड़े के निर्मित होने में 3 कारण होते हैं पहला उपदान कारण जोकि यहाँ मिटटी है दूसरा निमित्त कारण जोकि यहाँ कुम्भकार है अथवा ज्ञान या चेतन है और तीसरा कारण है घड़े का प्रयोजन अथवा निर्माण का उद्देश्य जोकि यहाँ अन्य घड़े के उपयोगकर्ता हैं। इन ३ मुख्य कारणों के अलावा सहायकभूत कारण जोकि यहाँ चाक, पानी आदि हैं और उनके भी 3 ही मुख्य कारण होते हैं उपादान, निमित्त और प्रयोजन। उसी प्रकार जगत का एक कारण प्रकृति-उपादान दूसरा सर्वज्ञ ईश्वर-निमित्त और प्रयोजन - अनंत आत्माएं हैं और आत्मा को अविवेक होने के कारण ईश्वर आत्माओं के लिए प्रकृति से जगत निर्मित कर देता है किन्तु स्वयं इन सबसे मुक्त होता है।

सत्व , रजस् और तमस् ये ३ प्रकार के मूल तत्व हैं इनकी साम्यवस्था का नाम प्रकृति है अर्थात जब ये तत्व कार्यरूप में परिणित नहीं होते, प्रत्युत मूल कारण रूप में अवस्थित रहते हैं तब इनका नाम प्रकृति है। समस्त कार्य की कारणरूप अवस्था का नाम प्रकृति है। इस प्रकार कार्यमात्र का मूल उपादान होने से गौण रूप में भले इसे एक कहा जाये ,पर प्रकृति नाम का एक व्यक्ति रूप में कोई तत्व नहीं है। कार्यमात्र के उपादान कारण की मूल भूत स्तिथि 'प्रकृति'है। समस्त वैषम्य अथवा द्वन्द्व विकृति अवस्था में संभव हो सकते है, इसलिए प्रकृति स्वरूप को साम्य अवस्था कहकर स्पष्ट किया जाता है। इस प्रकार मूल तत्व ३ वर्ग में विभक्त है और वह संख्या में अनंत है । जब चेतन की प्रेरणा से उसमें क्षोभ होता है तब वे मूल तत्व कार्योन्मुख हो जाते हैं । अर्थात कार्यरूप में परिणित होने के लिए तत्पर हो जाते हैं। तब उनकी अवस्था साम्य न रह कर वैषम्य की और अग्रसर होती है तब उनका जो प्रथम परिणाम है उसका नाम महत् होता है। इसीको बुद्धि या प्रधान कहते हैं।

यहाँ से सर्ग का आरम्भ होता है महत् से अंहकार आदि और तत्व बनते चले जाते हैं (यहाँ विवरण देने से लेख काफी लम्बा हो जायेगा)। इनमें मूल प्रकृति केवल उपादान, तथा महत् आदि तेईस पदार्थ उसके विकार हैं। ये चौबीस अचेतन जगत है। इसके अतिरिक्त पुरुष अर्थात चेतन तत्व है। इस प्रकार चौबीस अचेतन और पच्चीसवां पुरुष चेतन है। चेतन तत्व भी २ वर्गों में विभक्त है, एक परमात्मा दूसरा जीवात्मा। परमात्मा एक है जीवात्मा अनेक, अर्थात संख्या की द्रष्टि से अनंत हैं। ये हैं वे समस्त तत्व जिनके वास्तविक स्वरुप को पहचान कर अचेतन तथा चेतन के भेद का साक्षात्कार करना है।

बहुत लोग साँख्ययोग को एक साथ जोड़ कर देखते हैं और उसको एक ही पुस्तक या दर्शन समझते हैं। साँख्य के साथ योग का नाम इसलिए लिया जाता है जैसे हम भौतिक-रसायन, जीव-वनस्पति विज्ञानं आदि विषयों को जोड़ी में रखते हैं अन्यथा साँख्य दर्शन एवं योग दर्शन दोनों अलग पुस्तकें हैं और एक दुसरे की पूरक हैं। इसी प्रकार हम न्याय-वैशेषिक (न्याय दर्शन , वैशेषिक दर्शन ) और वेदांत-मीमांसा (वेदांत दर्शन अथवा ब्रह्मसूत्र , मीमांसा दर्शन ) का नाम लेते हैं पर वो सभी हैं अलग -अलग पुस्तकें। साँख्य योग में जगत के उन मूल तत्वों की संख्यात्मक विवेचना की है जो नेत्रों से दिखाई नहीं देते किन्तु जगत के मूल कारण में वो ही तत्व मुख्य होते हैं। और मोक्ष क्या है और उसकी प्राप्ति कैसे होती है इन सब बातो का भी उसमें उत्तर है । साँख्य को पढने मात्र से ही यह तत्व भेद्ज्ञान नहीं होता जब तक योग दर्शन के अनुरूप सबीज और निर्बीज समाधि तक नहीं पंहुचा जाये। इन तत्वों, आत्मा और इश्वर का साक्षात्कार केवल पढने मात्र या साधारण ज्ञान प्राप्त करने से नहीं होता है इसके लिए उच्च कोटि का पुरषार्थ चाहिए।

इससे स्पष्ट है की वास्तविक सांख्य सिद्दांत अकाल में ही किस प्रकार भ्रान्ति-घटाओं में आच्छादित होते रहे हैं। आचार्य उदयवीर शास्त्री के भाष्य में उनको विच्छिन्न कर वास्तविकताओं को स्पष्ट किया गया है। विवेकशील पाठक मनन करने पर स्वयं अनुभव कर सत्य का निर्धारण कर सकते हैं ।

रविवार, 3 मई 2009

गाँधी परिवार अथवा खान परिवार

गाँधी परिवार का परिचय जब भी किसी कांग्रेसी अथवा मीडिया द्वारा देशवासियों को दिया गया है अथवा दिया जाता है,तब वह फिरोज गाँधी तक जाकर ही यकायक रुक सा जाता है फिर बड़ी सफाई के साथ अचानक उस परिचय का हैंडिल एक विपरीत रास्ते की और घुमाकर नेहरु वंश की और मोड़ दिया जाता है। फिरोज गाँधी भी अंततः किसी के पुत्र तो होंगे ही। उनके पिता कौन थे ? यह बतलाना आवश्यक नहीं समझा जाता। फिरोज गाँधी का परिचय पितृ पक्ष से काट कर क्यों ननिहाल के परिवार से बार-बार जोड़ा जाता रहा है, यह एक ऐसा रहस्य है जिसे नेहरु परिवार के आभा-मंडल से ढक कर एक गहरे गढे में मानो सदैव के लिए ही दफ़न कर दिया गया है।

यह कैसा आश्चर्य है की पंथ निरपेक्षता(मुस्लिम प्रेम) की अलअम्बरदार कांग्रेस के द्वारा भी आखिर यह गर्वपूर्वक क्यों नहीं बतलाया जाता की फिरोज गाँधी एक पारसी युवक नहीं अपितु एक मुस्लिम पिता के पुत्र थे। और फिरोज गाँधी का मूल नाम फिरोज गाँधी नहीं फिरोज खान था जिसको एक सोची समझी कूटनीति के अर्न्तगत फिरोज गाँधी करा दिया गया था।

फिरोज गाँधी मुसलमान थे और जीवन पर्यन्त मुसलमान ही बने रहे। उनके पिता का नाम नवाब खान था जो इलाहबाद में मोती महल (इशरत महल) के निकट ही एक किराने की दूकान चलाते थे । इसी सिलसिले में (रसोई की सामग्री पहुंचाने के सिलसिले में) उनका मोती महल में आना जाना लगातार रहता था। फिरोज खान भी अपने पिता के साथ ही प्रायः मोती महल में जाते रहते थे। वहीँ पर अपनी समवयस्क इन्द्रा प्रियदर्शनी से उनका परिचय हुआ और धीरे-धीरे जब यह परिचय गूढ़ प्रेम में परिणत हुआ तब फिरोज खान ने लन्दन की एक मस्जिद में इन्द्रा को मैमूदा बेगम बनाकर उनके साथ निकाह पढ़ लिया।

गाँधी और नेहरु के अत्यधिक विरोध किये जाने के फलस्वरूप भी जब यह निकाह संपन्न हो ही गया तब समस्या 'खान' उपनाम को लेकर आ खड़ी हुई। अंततः इस समस्या का हल नेहरु के जनरल सोलिसिटर श्री सप्रू के द्वारा निकाला गया। मिस्टर सप्रू ने एक याचिका और एक शपथ पत्र न्यायालय में प्रस्तुत करा कर 'खान' उपनाम को 'गाँधी' उपनाम में परिवर्तित करा दिया।इस सत्य को केवल पंडित नेहरु ने ही नहीं अपितु सत्य के उस महान उपासक तथाकथित माहत्मा कहे जाने वाले मोहन दास करम चाँद गाँधी ने भी इसे राष्ट्र से छिपा कर सत्य के साथ ही एक बड़ा विश्वासघात कर डाला।

गाँधी उपनाम ही क्यों - वास्तव में फिरोज खान के पिता नवाब खान की पत्नी जन्म से एक पारसी महिला थी जिन्हें इस्लाम में लाकर उनके पिता ने भी उनसे निकाह पढ़ लिया था। बस फिरोज खान की माँ के इसी जन्मजात पारसी शब्द का पल्ला पकड़ लिया गया। पारसी मत में एक उपनाम गैंदी भी है जो रोमन लिपि में पढ़े जाने पर गाँधी जैसा ही लगता है। और फिर इसी गैंदी उपनाम के आधार पर फिरोज के साथ गाँधी उपनाम को जोड़ कर कांग्रेसियों ने उस मुस्लिम युवक फिरोज खान का परिचय एक पारसी युवक के रूप में बढे ही ढोल-नगाढे के साथ प्रचारित कर दिया। और जो आज भी लगातार बड़ी बेशर्मी के साथ यूँ ही प्रचारित किया जा रहा है।