शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2010

दयानंद जी ने क्या खोजा क्या पाया (भाग २)

वैसे तो यह गुमनाम पुस्तक समीक्षा के काबिल भी नहीं है किन्तु ऐसी कुतर्कों भरी अनेक पुस्तकें नेट पर प्रचारित की जा रहीं है इसीलिए एक का खंडन करने से आप समझ सकते हैं बाकी सब भी इसी तरह की बकवास से भरी पढ़ी हैं। मैं इस पुस्तक के मुख्य वक्तव्य नंबरवाइज लिख कर उनकी समीक्षा कर रहा हूँ और अंत में अपना निष्कर्ष रखूंगा आप लोग कृपया अपने-२ निष्कर्ष टिप्पणियों द्वारा व्यक्त करें। वैसे मैं इस भाग के पश्चात एक भाग और कुछ शेष पॉइंट्स के साथ लिखूंगा।

सबसे पहले तो यह कहना चाहूँगा इस पुस्तक में एक बात को कई बार दोहराया गया है तो उन बातों की समीक्षा बार-२ नहीं दोहराई जाएगी। तो संक्षिप्त में लेखक के मुख्य आक्षेप निम्न प्रकार हैं।

. दयानंद जी ने अपने हत्यारे को क्षमा प्रदान क़ी जबकि उन्हीके अनुसार "अपराधी को क्षमा करना अपराध को बढ़ावा देना है क्योंकि जो पाप क्षमा करे तो उसका न्याय नष्‍ट हो जाये और सब मनुश्य महापापी हो जायें। क्योंकि क्षमा की बात सुन ही के उनको पाप करने में निर्भयता और उत्साह हो जाये। जैसे राजा अपराधियों के अपराध क्षमा कर दे तो वे उत्साहपूर्वक अधिक-अधिक बड़े-बड़े पाप करें। क्योंकि राजा अपना अपराध क्षमा कर देगा और उनको भी भरोसा हो जाए कि राजा से हम हाथ जोड़ने आदि चेश्टा कर अपने अपराध छुड़ा लेंगे और जो अपराध नहीं करते वे भी अपराध करने से न डर कर पाप करने में प्रवृत्त हो जायेंगे। इसलिए सब कर्मों का फल यथावत देना ही ईश्वर का काम है क्षमा करना नहीं।" दयानन्द जी द्वारा अपने अपराधी को क्षमा कर देने की यह पहली घटना नहीं है बल्कि अनगिनत मौकों पर उन्होंने अपने सताने वालों और हत्या का प्रयास करने वालों को क्षमा किया है। `फरूखाबाद में आर्यसमाज के एक सभासद की कुछ दुष्‍टों ने पिटाई कर दी। लोगों ने स्कॉट महोदय से उसे दण्ड दिलाया । पर स्वामीजी को रूचिकर न लगा। उन्होंने स्कॉट महोदय तथा सभासदों से कहा - ''चोट पहुंचाने वाले को इस तरह दण्डित करना आपकी मर्यादा के खिलाफ है। महात्मा किसी को पीड़ा नहीं देते, अपितु दूसरों की पीड़ा हरते हैं।''

समीक्षा- इस बात का अपनी इस पुस्तक में इन महोदय ने बार-२ वर्णन किया है की दयानंद जी ने अपने हत्यारे को क्षमा कर दिया जिस कारण उनके ग्रन्थ पढने योग्य नहीं हैं। वैसे तो इस बात को मैंने भी सुना है कि उन्होंने ऐसा किया था। इसमें हम २ बात कह सकते हैं एक तो ऐसा ही हुआ था और दूसरे यह उनके कुछ शिष्यों द्वारा उनको अत्यधिक अनावश्यक रूप से दयालू प्रचारित करने के लिए किया गया हो। यदि उन्होंने क्षमा ही किया था तो इसमें मैं यह कहूँगा की उनकी इस एक बात के कारण उनके द्वारा लिखित सभी ग्रन्थ असत्य नहीं हो जाते जबकि वो एक अखंड ब्रहमचारी सन्यासी थे और संभव है वो व्यक्ति जिसने जहर दिया था उनके हत्या के प्रयोजन में एक मुर्ख मोहरा मात्र था इसको जानते हुए उन्होंने उसको क्षमा कर दिया कि इसमें इतना बुद्धि-विवेक ही नहीं है समझने का इसने मुझे मारकर इस राष्ट्र का कितना अहित कर दिया है। जैसे कि एक पागल हत्यारे को आज भी एक कोर्ट उसको सजा देकर छोड़ देता है उसी प्रकार उन्होंने भी उसको छोड़ दिया तो जिस प्रकार कोर्ट का निर्णय अन्याय पूर्ण नहीं है उसी प्रकार उनका निर्णय भी अन्याय पूर्ण नहीं कहा जा सकता। वास्तविकता क्या थी ये पूर्णतयः स्पष्ट नहीं है और बाकी के तुम्हारे द्वारा कथित अनगिनत मौके मनगढ़ंत ही हैं और हो सकता है एकआदि मौके पर उन्होंने सामने वाले के शेष व्यक्तित्व को देख कर उसके ह्रदय परिवर्तन की द्रष्टि से ऐसा किया भी हो। वैसे भी पाठक आगे की समीक्षा से समझ सकते हैं कि तुम्हारा उद्देश्य क्या है और तुम कितने सत्यवान और ज्ञानवान हो।

. माता, पिता, आचार्य, अतिथि और पुरुष के लिए पत्नी की अहमियत बताते हुए स्वामी जी कहते हैं- `ये पाँच मूर्तिमान् देव जिनके संग से मनुष्‍यदेह की उत्पित्त, पालन, सत्यशिक्षा, विद्या और सत्योपदेश को प्राप्ति होती है। ये ही परमेश्वर को प्राप्त होने की सीढ़ियाँ हैं।´ (सत्यार्थप्रकाश, एकादशसमुल्लास, पृष्‍ठ 216) माता-पिता को छोड़कर तो वो खुद ही भागे थे। विवाह उन्होंने किया नहीं इसलिए पत्नी भी नहीं थी। वो खु़द दूसरों पर आश्रित थे और न ही कभी उन्होंने कुछ कमाया तो अतिथि सेवा का मौका भी उन्होंने खो दिया। सीढ़ी के चार पाएदान तो उन्होंने खुद अपने हाथों से ही तोड़ डाले। आचार्य की सेवा उन्होंने ज़रुर की, लेकिन कभी-कभी ऐसा कुछ कर जाते थे कि या तो आचार्य पाठशाला से उनका नाम ही काट देता था या जितना ज्यादा ज़ोर से हो सकता था उनके डण्डा जमा देता था, जिनके निशान उनके शारीर पर हमेशा के लिए छप जाते थे।

समीक्षा- तुम लोगो में जब किसी बात की बुद्धि ही नहीं है समझने की तो अपनी अधिक अक्ल ना ही लगाओ तो बेहतर है- आपके अनुसार दयानंद जी ने स्वयं अपने कहे का पालन नहीं किया अरे तुमने केवल अपनी सिद्धांत विरुद्ध बात कह डाली। माता-पिता को छोड़ कर यदि उन्होंने संन्यास लिया था और विवाह नहीं किया तो इसका यह अर्थ कहाँ निकलता है की वो इनका सम्मान नहीं करते थे जैसे कि चोरी करना पाप है यह कहने के लिए मुझे चोर बनना आवश्यक नहीं है। उन्होंने ही कई बार यह भी कहा है की यदि मनुष्य ब्रह्मचर्य आश्रम से सीधा संन्यास आश्रम लेता है तो सर्वोत्तम है किन्तु ऐसा करना हर मनुष्य के वश में नहीं है ऐसा तीव्र वैरागी पुरुष कोई विरला ही होता है जैसे के वो स्वयं भी थे। सन्यासी से अधिक सब जगत और जीवों की महत्ता को और कोई नहीं समझ सकता। यदि इसमें कोई यह शंका करता है की यदि संन्यास लेना सर्वोत्तम है तो गृहस्त और वानप्रस्थ आश्रम छोड़ कर सभी संन्यास लेने लगें तो संसार का उच्छेद ही हो जायेगा तो उनको मैं यह बता दू जिस प्रकार अध्यनरत मनुष्य में ज्ञान की ग्राहकता ३ प्रकार की होती है उत्तम, मध्यम, निकृष्ट उसी प्रकार से संन्यास लेने की क्षमता हर किसी में संभव नहीं है बहुत ही कम व्यक्ति अखंड बृह्मचर्य का पालन करते हुए धारणा, ध्यान और सबीज समाधि से होते हुए निर्बीज समाधि तक कि यात्रा तय करते है और वास्तविक संन्यास ले सकते हैं इसीलिए इस संसार का उच्छेद कभी नहीं होगा और जितना इस ब्रह्माण्ड में जड़ है उतना चेतन भी है। अतिथि यहाँ इस प्रकरण में किसको कहा गया है यदि तुमने हिन्दू शास्त्र पढ़े होते तो ऐसा न होता, तुमने एक सूक्त भी सुना होगा अतिथि देवोभवः जिसका लोग सन्दर्भ और प्रसंग काट कर किसी के लिए भी प्रयोग करते हैं वो वास्तव में एक विद्वान सन्यासी पुरुष के लिए ही लिखा है क्योंकि जिसके आने की कोई तिथि नहीं होती उसको अतिथि कहते हैं अर्थात वो विद्वान निष्कपटी, सबकी उन्नति चाहने वाला, जगत में भ्रमण करता हुआ सब को सत्य उपदेश से सुख करता रहे ऐसा सन्यासी उसको अतिथि कहते हैं क्योंकि वो व्यक्ति ज्ञान प्रदान करता है इसीलिए देवता कहलाता है और हमें हमेशा उस ज्ञानी पुरुष का सत्कार करना चाहिए। आज कोई यदि धूर्त, मुर्ख या कैसा भी बहारी या विदेशी व्यक्ति चाहे वो घर में तुम्हारे आग लगा दे को अतिथि का पद देकर कहते हैं मेहमान तो भगवान् का रूप होता है क्योंकि हमारे शास्त्रों में लिखा है अतिथि देवोभवः, अरे भाई लोगो पहले तो भगवान् के पद से तुम किसी को भी नहीं सुशोभित कर सकते चाहे वो तुम्हारे उपरोक्त वर्णित पंचदेव में से ही क्यों ना हो फिर आजकल के कथित अतिथि का क्या कहें। भगवान् का पर्यावाची देवता नहीं है किन्तु हाँ भगवान् देवता है यह कह सकते हैं। देवता शब्द संस्कृत की द्र धातु से निकलता है जिसका अर्थ होता हैं देना या प्रदान करने वाला । उदाहरण के तौर पर सूर्य देवता है क्योंकि वो पूरे सौरमंडल को प्रकाश देता है, गुरु देवता होता है क्योंकि वो शिक्षा प्रदान करता है, माता-पिता देवता हैं क्योंकि वो इस मनुष्य देह को जन्म देते हैं, पृथ्वी देवता है क्योंकि वो हमें रहने के लिए स्थान, भोजन इत्यादि देती है। इसी प्रकार से आपको समझना चाहिए देवता, भगवान् नहीं होता पर भगवान देवता होता है। किसी लोक हित और संन्यास के महान उद्देश्य के लिए यदि माँ बाप भी आड़े आते हैं तो उनको छोड़ने में कोई बुराई नहीं है और इसी प्रकार अविवाहित रहने में। उन्होंने लोगो को पंचदेव पूजा का महत्व बताया कि पञ्च फलों आदि की पूजा से कुछ हांसिल नहीं होता और ना ही उस बात का हमारे सत्य शास्त्रों में वर्णन है वो पञ्च देव माता, पिता, आचार्य, अतिथि(विद्वान् पुरुष) और पति के लिए पत्नी तथा पत्नी के के लिए पति पांच देव हैं शास्त्रों में वर्णित हैं जिनका सत्कार आवश्यक है और जो तुमने बाकी की मनगढ़ंत बकवास लिखी है उसका कोई उत्तर देना आवश्यक नहीं है।

. दयानन्दजी एक वेदमन्त्र का अर्थ समझाते हुए कहते हैं- `इसीलिए ईश्वर ने नक्षत्रलोकों के समीप चन्द्रमा को स्थापित किया।´ (ऋग्वेदादि0, पृष्‍ठ 107) "परमेश्वर ने चन्द्रमा को पृथ्वी के पास और नक्षत्रलोकों से बहुत दूर स्थापित किया है, यह बात परमेश्वर भी जानता है और आधुनिक मनुष्‍य भी। फिर परमेश्वर वेद में ऐसी सत्यविरूद्ध बात क्यों कहेगा?" इससे यह सिद्ध होता है कि या तो वेद ईश्वरीय वचन नहीं है या फिर इस वेदमन्त्र का अर्थ कुछ और रहा होगा और स्वामीजी ने अपनी कल्पना के अनुसार इसका यह अर्थ निकाल लिया । इसकी पुष्टि एक दूसरे प्रमाण से भी होती है, जहाँ दयानन्दजी ने यह तक कल्पना कर डाली कि सूर्य, चन्द्र और नक्षत्रादि सब पर मनुष्‍यदि गुज़र बसर कर रहे हैं और वहाँ भी वेदों का पठन-पाठन और यज्ञ हवन, सब कुछ किया जा रहा है और अपनी कल्पना की पुष्टि में ऋग्वेद (मं0 10, सू0 190) का प्रमाण भी दिया है- "जब पृथिवी के समान सूर्य, चन्द्र और नक्षत्र वसु हैं पश्चात उनमें इसी प्रकार प्रजा के होने में क्या सन्देह? और जैसे परमेश्वर का यह छोटा सा लोक मनुश्यादि सृष्टि से भरा हुआ है तो क्या ये सब लोक शून्‍य होंगे?" (सत्यार्थ।, अश्टम। पृ। 156) क्या यह मानना सही है कि ईश्वरोक्त वेद व सब विद्याओं को यथावत जानने वाले ऋषि द्वारा रचित साहित्य के अनुसार सूर्य व चन्द्रमा आदि पर मनुष्‍य आबाद हैं और वो घर-दुकान और खेत खलिहान में अपने-अपने काम धंधे अंजाम दे रहे हैं?

समीक्षा - आप फिर वहीँ प्रलाप करते नज़र आ रहे हैं और बेफिजूल कि बात कर रहे हैं और वाक्यों को अपने सन्दर्भ से हटा भी रहे हैं। उन्होंने यह कहा है कि जिस प्रकार पृथ्वी पर एक जीव के शरीर में पृथ्वी तत्व कि अत्यधिकता होती है उसी प्रकार सूर्यादि लोको पर तैजस तत्व की अत्यधिकता से बने हुए जीव संभव हैं और ये घर-दुकान, खेत खलियान आदि बातों की आप स्वयं मिथ्या कल्पना कर रहे हैं उन्होंने ऐसा कुछ नहीं कहा है। जीवन क्या है यह अभी तक आज के वैज्ञानिको की समझ नहीं आया है वो अक्सर अपनी थियोरीज़ का स्वयं ही समर्थन-खंडन करते रहते हैं। इसीलिए यदि ब्रह्मांड की वैचित्रियता और स्रष्टि के मूल तत्वों से आप परिचित हों तो जीवन किस रूप में कहाँ हो सकता है यह आपकी समझ में आ जाता। क्योंकि जीवन के बारे में इस लेख का विषय नहीं है इसलिए मैं यहाँ अधिक नहीं लिखता आगे के लेखो में लिखूंगा। इस स्रष्टि में कोई भी वस्तु निष्प्रयोजन नहीं है चंद्रमाओं का पृथ्वी आदि लोको के लिए महत्त्व है यह बात भी यहाँ बताई जा रही है और यह बात आज के वैज्ञानिक भी दबे स्वरों में ही सही पर स्वीकार रहे हैं तो इसमें उन्होंने क्या गलत कह दिया।

. परमेश्वर का कोई भी काम निष्‍प्रयोजन नहीं होता तो क्या इतने असंख्य लोकों में मनुष्‍यादि सृष्टि न हो तो सफल कभी हो सकता है? (सत्यार्थ0, अश्टम0 पृ0 156)स्वामी जी ने परमेश्वर की सफलता को सूर्य, चन्द्रमा और नक्षत्रों पर मनुष्‍यादि के निवास पर निर्भर समझा है। इन लोकों में अभी तक तो किसी मनुष्‍यादि प्रजा का पता नहीं चला, तो क्या परमेश्वर को असफल और निष्‍प्रयोजन काम करने वाला समझ लिया जाये? या यह माना जाए कि स्वामी जी इन सब लोकों की उत्पत्ति से परमेश्वर के वास्तविक प्रयोजन को नहीं समझ पाए? अत: ज्ञात हुआ कि स्वामी जी ईश्वर, जीव और प्रकृति के बारे में सही जानकारी नहीं रखते थे। एक शोधकर्ता को यह शोभा नहीं देता कि वह वेदों के वास्तविक मन्तव्य को जानने समझने के बजाए उनके भावार्थ के नाम पर अपनी कल्पनाएं गढ़कर लोगों को गुमराह करे ।

समीक्षा - यदि आज के वैज्ञानिक लोगो को ये पता नहीं चलता कि पृथ्वी गोल है तो क्या पृथ्वी चपटी हो जाती मतलब यदि उन्हें मनुष्यों जैसी प्रजा या कोई जीव अभी तक किसी लोक में नहीं मिला तो वहां जीव हैं ही नहीं ऐसा कैसे मान लें जबकि इस ब्रह्माण्ड की अनंतता का आपको जरा सा भी अहसास हों तो आज के वैज्ञानिकों की जानकारी उसके समक्ष कितनी है इसका भी आपको अहसास हों जाता। मनुष्य कितना ही जान ले पर वो इस ब्रह्माण्ड के आगे अति सूक्ष्म ही है और यह ब्रह्माण्ड उस ईश्वर के आगे। मैं आज के वैज्ञानिक बातो का विरोधी नहीं हूँ और ना ही उनके ज्ञान का क्योंकि मैं एक हिन्दू आर्य हूँ जो कभी ज्ञान का विरोध नहीं करता हाँ किन्तु कुतर्कों का समर्थक नहीं हूँ और चालबाजी का भी नहीं। मैं केवल आप जैसे लोगो का संशय मिटाने का प्रयास कर रहा हूँ।

. आकाश में सर्दी-गर्मी होती है, सर्दी से परमाणु जम जाते हैं, भाप से मिलकर किरण बलवाली होती है । क्योंकि आकाश के जिस देश में सूर्य के प्रकाश को पृथ्वी की छाया रोकती है, उस देश में शीत भी अधिक होती है। फिर गर्मी के कम होने और शीतलता के अधिक होने से सब मूर्तिमान पदार्थो के परमाणु जम जाते हैं। उनको जमने से पुष्टि होती है और जब उनके बीच में सूर्य की तेजोरूप किरणें पड़ती हैं तो उनमें से भाप उठती है। उनके योग से किरण भी बलवाली होती है।´ (ऋग्वेदादिभाष्‍यभूमिका पृष्‍ठ 145 व 146) सर्दी-गर्मी धरती पर होती है आकाश में नहीं और वह भी पृथ्वी द्वारा सूर्य के प्रकाश को रोकने की वजह से नहीं बल्कि सूर्य की परिक्रमा करते हुए पृथ्वी जब सूर्य से दूर होती है तो सर्दी होती है और जब अपेक्षाकृत निकट होती है तो गर्मी होती है। और न ही सर्दी से परमाणु जमते हैं। जब स्वयं बर्फ के ही परमाणु जमे हुए नहीं होते तो अन्य पदार्थो के क्या जमेंगे? पता नहीं परमाणु के सम्बन्ध में स्वामी जी की कल्पना क्या है? भाप से मिलकर प्रकाश को भला क्या बल मिलेगा? यह वेदों का कथन है या स्वयं स्वामी जी की कल्पना?

समीक्षा - आकाश में भी तापमान में अंतर होता है अर्थात सर्दी-गर्मी भी होती है।"आकाश के जिस देश में सूर्य के प्रकाश को पृथ्वी की छाया रोकती है, उस देश में शीत भी अधिक होती है।" मुर्ख व्यक्ति देश का अर्थ होता है स्थान अर्थात उनका तात्पर्य यह है कि आकाश के जिस स्थान में सूर्य के प्रकाश को पृथ्वी की छाया रोकती है, उस स्थान में शीत भी अधिक होती है तो इसमें क्या गलत है। वहां के आकाश और पृथ्वी पर सभी मुर्तिमानों के परमाणु जम जाते हैं और जब उनके बीच में सूर्य की तेज रूप किरण पड़ती है तब उनमें भाप उठती है, उनके योग से किरण भी बलवाली होती है जैसे जल में सूर्य का प्रतिबिम्ब अत्यन्त चमकता है अंतिम अंडरलाइन वाक्य क्यों छोड़ दिया आपने और जिस प्रकार चंद्रमा से परिवर्तित सूर्य की किरण से ओषधियाँ आदि पुष्ट होती हैं अर्थात वो परिवर्तित किरण बलवाली होती है अर्थात किरण बलवाली का तात्पर्य वो किरणे पृथ्वी को पुष्ट करती हैं अर्थात उन किरणों का इस पृथ्वी के वन, ओषधियों और सभी जीवों के लिए महत्त्व है। अर्थ का अनर्थ करना कोई तुम जैसे धूर्तो से सीखे। और जिस सर्दी-गर्मी के वार्षिक चक्र का तुम उदाहरण यहाँ दे रहे हो उसका इस प्रकरण से कोई लेना-देना ही नहीं है, ये तुम्हारा कुतर्क है। यहाँ परमाणु जमने का तात्पर्य है मूर्तिमान अर्थात स्थूल पदार्थो का जमना। यह लोक में बोला ही जाता है की पानी से बर्फ जम गया कोई उसकी रासायनिक प्रक्रिया की प्रत्येक बार व्याखा नहीं करता की परमाणु नहीं जमते वो करीब आ जाते हैं इत्यादि जैसे कोई ये पूंछे यह सड़क कहाँ जा रही है और तुम उत्तर देने लगो सड़क कोई व्यक्ति या जीव है जो कहीं को आता जाता है ये सड़क तो यहीं की यहीं रहती है कहीं नहीं आती-जाती अब पूछने वाला व्यक्ति तुम्हे मुर्ख ही समझेगा कि किस बेवकूफ से पाला पड़ा है, उसी प्रकार तुम यहाँ पदार्थ के जमने में परमाणु प्रक्रिया को बता कर वाक्य के भावार्थ को नष्ट करने का प्रयास कर रहे हो।

.सबसे सूक्ष्म टुकड़ा अर्थात जो काटा नहीं जाता उसका नाम परमाणु, साठ परमाणुओं से मिले हुए का नाम अणु, दो अणु का एक द्वयणुक जो स्थूल वायु है तीन द्वयणुक का अग्नि, चार द्वयणुक का जल, पांच द्वयणुक की पृथिवी अर्थात तीन द्वयणुक का त्रसरेणु और उसका दूना होने से पृथ्वी आदि दृश्य पदार्थ होते हैं। इसी प्रकार क्रम से मिलाकर भूगोलादि परमात्मा ने बनाये हैं। (सत्यार्थ प्रकाश, अश्टम। पृ।152) पहले माना जाता था कि परमाणु अविभाज्य है परन्तु अब परमाणु को तोड़ना संभव है। स्वयं भारत की ही धरती पर कई `परमाणु रिएक्टर´ इसी सिद्वान्त के अनुसार ऊर्जा उत्पादन करते हैं। अत: यह सृष्टि नियम के प्रतिकूल कल्पना मात्र है। दरअस्ल यह कोई वैदिक सिद्धान्त नहीं है बल्कि एक दार्शनिक मत है। आग, पानी, हवा और पृथ्वी की संरचना का वर्णन भी विज्ञान विरूद्ध है। उदाहरणार्थ चार द्वयणुक मिलने से नहीं बल्कि हाइड्रोजन के दो और ऑक्सीजन का एक अणु कुल 3 अणुओं के मिलने से जल बनता है। इसी तरह पृथ्वी भी पांच द्वयणुक से नहीं बनी है बल्कि कैल्शियम, कार्बन, मैग्नीज़ आदि बहुत से तत्वों से बनी है और हरेक तत्व की आण्विक संरचना अलग-अलग है। यही हाल वायु और अग्नि का भी है। यदि स्वामी जी के मत को मान लिया जाता तो देश की सारी उन्नति ठप्प हो जाती। उनके विचार आज प्रासंगिक नहीं रह गय हैं। समय ने उन्हें रद्द कर दिया है। जिन लोगों को म्लेच्छ कहकर हेय समझा गया, देश के वैज्ञानिकों ने उन्नति करने के लिए उन्हीं का अनुकरण किया। यदि प्रकृति के विषय में अभारतीयों का ज्ञान सत्य और श्रेष्‍ठ हो सकता है तो फिर ईश्वर और जीव के विषय में क्यों नहीं हो सकता?

समीक्षा - जिस परमाणु को विभाजित करने कि बात आप कर रहे हैं उसको पहली ही पंक्ति में कहा है पदार्थ का वह कण जिसको काटा न जा सके उसको परमाणु कहते हैं, जिस परमाणु की आप बात कर रहे हैं वो शास्त्र में "तन्मात्र" कहलाता है पदार्थ का वो अंतिम कण जिसमें पदार्थ की प्रतीति या अनुभूति या उसका मूल गुण बना रहे जैसे की सभी तत्वों लोहा , कार्बन आदि के परमाणु भिन्न होते हैं। यहाँ उस तन्मात्र अर्थात उस आधुनिक कथित परमाणु का वर्णन नहीं है जिसको आप सोच रहे हैं यहाँ उस से भी आगे के सिद्धांत की बात कही गयी है जोकि अभी आधुनिक वैज्ञानिकों को खोजना है, अग्नि, वायु, जल, पृथ्वी और आकाश तत्व को आप क्या समझते हैं इसका अंदाज़ा भी मुझे हो गया है। सुनों अग्नि तत्व का मतलब ऊष्मा है चाहे वो किसी भी पदार्थ में क्यों न हो जैसे उदाहरण के तौर पर लोहे , जल आदि में उष्णता अग्नि तत्व की होती है आप इस अग्नि तत्व को साधारण अग्नि मात्र समझते हैं ऐसे ही मूर्तिमान पदार्थो में स्थूलता पृथ्वी तत्व के कारण आती है चाहे वो कोई भी तत्व हो, ग्रह हो , नक्षत्र आदि हो। इसी प्रकार अन्य मूल तत्व भी हैं तुम इनको लोक में प्रयोग होने वाले अलग अर्थों में लेते हो जबकि शास्त्र में ये ५ मूल तत्व उन २४ मूल जड़ तत्वों के अंतर्गत आते हैं जो स्रष्टि प्रक्रिया के आरम्भ में बनते हैं इनको समझने के लिए बुद्दी का स्तर ऊचां चाहिए जो तुम लोगो के पास नहीं है इसीलिए तुम लोग अपनी अक्ल न ही लगाओ तो ही अच्छा है। हमारे शास्त्रों से ही पूरे विश्व में ज्ञान फैला है जिसको अपनाकर और देशो ने तरक्की की है हमें उनकी नक़ल नहीं बस अपना खोया हुआ स्वाभिमान और आत्मविश्वास पाना है । इस मैकाले शिक्षा पद्दति और पूर्व में मुगलों और अंग्रेजों द्वारा यहाँ के शास्त्रों, पुस्तकालयों आदि को नष्ट करके कितना नुक्सान इस राष्ट्र को हुआ है इसकी वर्तमान स्तिथि देख कर अनुमान हो जाता है। किन्तु फिर भी वेद और कुछ शास्त्र बचे हुए हैं और यदि लोगो ने द्रढ़ता और पुरषार्थ दिखाया तो एक दिन यह देश अपने खोये हुए स्वाभिमान और आत्म विश्वास को पा लेगा फिर तुम जैसे कठमुल्लों और छदम सेकुलर फौज को गायब होते देर नहीं लगेगी और यह राष्ट्र दिन दूनी रात चोगनी तरक्की करेगा।

."सूर्य किसी लोक या केन्द्र के चारों ओर नहीं घूमता जो सविता अर्थात सूर्य ।।। अपनी परिधि में घूमता रहता है किन्तु किसी लोक के चारों ओर नहीं घूमता।" (यजुर्वेद, 033:मं। 43/सत्यार्थ0, अष्‍टम। पृ। 155) - यह बात भी सृष्टि नियम के विरूद्ध है। एक बच्चा भी आज यह जानता है कि सूर्य न केवल अपनी धुरी पर बल्कि किसी केन्द्र के चारों ओर भी पूरे सौर मण्डल सहित चक्कर लगा रहा है। तब सृष्टिकर्ता परमेश्वर अपनी वाणी वेद में असत्य बात क्यों कहेगा? देखिये - `सूर्य अपनी धुरी पर 27 दिन में एक चक्कर पूरा करता है।

समीक्षा - फिर से छल और कुतर्क यहाँ इस प्रकरण में एक प्रश्न "सूर्य ग्रहों अथवा लोकों के चारो तरफ घूमता है या लोक अथवा ग्रह उसके चारो तरफ घूमते हैं" के उत्तर में कहा गया है कि सूर्य किसी लोक या केंद्र के चारो तरफ नहीं घूमता बल्कि ये लोक अथवा ग्रह सूर्य के चारो और घूमते हैं और सूर्य अपनी परिधि पर घूमता है जिस केंद्र का आप यहाँ उदाहरण दे रहे हैं उसका कोई प्रसंग ही नहीं आया वहां पर क्यों आप अपने छल से लोगो को बहकाने का असफल प्रयास कर रहे हैं।

इन आरोपों के अलावा और भी आरोप हैं जो यहाँ छूट गए हैं उनका उत्तर अगले भाग में दिया जायेगा थोडा धैर्य रखिये।

5 टिप्‍पणियां:

Mohammed Umar Kairanvi ने कहा…

आपकी पिछली पोस्‍ट इतनी बेकार थी कि अनवर साहब ने उस पर कुछ लिखना भी मुनासिब न जाना, इसकी खबर उनको कर दी है तब तक निचै दिये लिंकों पर विचार करो

दयानन्द जी ने क्या खोजा क्या पाया? Dr.-anwar-jamal-research
http://islaminhindi.blogspot.com/2009/10/dr-anwar-jamal-research.html


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विचार करें कि मुहम्मद सल्ल. कल्कि व अंतिम अवतार और बैद्ध मैत्रे, अंतिम ऋषि
(इसाई) यहूदीयों के भी आखरी संदेष्‍टा? हैं या यह big Game against Islam है?
antimawtar.blogspot.com (Rank-1 Blog) डायरेक्‍ट लिंक

अल्‍लाह का
चैलेंज पूरी मानव-जाति को

अल्‍लाह का
चैलेंज है कि कुरआन में कोई रद्दोबदल नहीं कर सकता

अल्‍लाह का
चैलेंजः कुरआन में विरोधाभास नहीं

अल्‍लाह का
चैलेंजः आसमानी पुस्‍तक केवल चार

अल्‍लाह का
चैलेंज वैज्ञानिकों को सृष्टि रचना बारे में

अल्‍लाह
का चैलेंज: यहूदियों (इसराईलियों) को कभी शांति नहीं मिलेगी


छ अल्लाह के चैलेंज सहित अनेक इस्‍लामिक पुस्‍तकें
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सौरभ आत्रेय ने कहा…

कैरानवी जी मेरी पोस्ट आप लोगो को अच्छी लग ही नहीं सकती तो इसमें कोई हैरानगी वाली कोई बात ही नहीं है और मेरे पास इन फ़ालतू की बकवास भरी पुस्तकों को पढ़ने के लिए समय नहीं है और ना ही मैं इन सबकी समीक्षा लिखने बैठूंगा क्योंकि समझदार को इशारा ही काफी है जिसका मैं पहले ही संकेत दे चुका हूँ. बस जो थोड़े बहुत पोइंट्स इस पोस्ट में रह गए हैं उनको समय निकाल कर जल्द ही लिखने का प्रयास करूँगा और उसके पश्चात इन बकवास पुस्तकों के बारे में लिखने के बजाय वैदिक धर्म पर ही अधिक लिखना पसंद करूँगा और उन्ही लेखो से समझदार लोग अंदाज़ा लगा लेंगे सत्य धर्म क्या है और मिथ्या मजहब क्या है. आप लोगो को तो समझाना ही बेकार है.

naval ने कहा…

aatre bhai, in logon men se kisi ne ek jagah yeh tippni ki thi ismen kiya sachhayi he yeh mene copi kar li thi

महात्मा गांधी जी ने दयानंद, सत्यार्थ प्रकाश ओर आर्य समाज के विषय में निम्नलिखित टिप्पणि की थीः ‘‘आर्यसमाज के बाइबिल सत्यार्थ प्रकाश को मैंने दो बार पढा, ऐसे महासुधारक की लिखी हुई इतनी निराशजनक पुस्तक मैंने दूसरी नहीं पढी, उनसे जानबूझकर या बिना जाने जैन धर्म, इसलाम, ईसाई मत और खुद हिंन्दू धर्म के अर्थ का अनर्थ हो गया, आर्य समाजी संकुचित हदय और झगडालू स्वभाव के होने के कारण अन्य मतावलंबियों के साथ और जब उन्हें दूसरा कोई न मिले तो आपस में झगडा करते हैं ‘‘यंग इंडिया, अप्रैल, 1924, प. माध्वाचार्य शस्त्री द्वारा पराजय पंचक, पृष्ठ 14 पर उदधृत’

उपरोक्त पेराग्राफ, पृष्ठ 639,
पुस्तकः क्या बालू की भीत पर खडा है हिंदू धर्म?
862 पृष्ठ मूल्य 175 रूपये
दिल्ली बुक क. , एम 12, कनाट सरकस, नई दिल्ली . 110001

MOHD ने कहा…

hate for none brother.

सौरभ आत्रेय ने कहा…

नवल जी , सबसे पहले तो मैं यह कहूँगा की मेरा गाँधी जी के कृत्यों से निष्कर्ष यह निकलता है कि वो एक महात्मा कहलाने लायक ही नहीं हैं तो संभव है उन्होंने यह कहा भी हो पर जहाँ तक मेरा अनुमान है उन्होंने भी ऐसा नहीं कहा है यह वक्तव्य माध्वाचार्य का मनगढ़ंत भी हो सकता है और वास्तव में ऐसा है भी तो उससे क्या फर्क पड़ता है सत्य, सत्य ही रहता है इन जैसे तथाकथित महात्माओं के कहने से नहीं बदलता.

न तो सत्यार्थ प्रकाश आर्य समाज या हिंदुओं की बाइबल है न कोई और हिंदू ग्रन्थ क्योंकि यदि किसी ने बाइबल पढ़ी हो तो ऐसा न बोले और यदि पढ़ कर ऐसा बोले तो वो मुर्ख है. मैंने अपने पहले भाग में लिखा ही था महर्षि दयानंद सरस्वती जी से बहुत लोग चिड़ते हैं उसमें ईसाई, मुस्लिम, साम्प्रदायिक हिंदू आदि सभी मतों के लोग हैं क्योंकि उन्होंने उनके मतों का विश्लेषण करके उनके अंधविश्वासों और मूर्खता भरे क्रिया-कलापों की जनता के आगे पोल खोली थी. उन्होंने हिंदू धर्म को उसकी वास्तविक दिशा वेदों और उनके अनुरूप वैदिक दर्शन को जनता के सामने रखा जो आज भी बहुत लोगो को नहीं पचता क्योंकि उनकी दुकानदारी पर जो प्रभाव पड़ता है. चूँकि आर्य समाज (तथाकथित कुछ आर्य समाजियों जैसे अग्निवेश जैसे महाबेवकूफों को छोड कर) ने सत्य का साथ दिया तो जाहिर है उन्हें बहुत लोग झगडालू और संकुचित भी बोलेंगे इससे सत्यता पर कोई प्रभाव नहीं पढ़ता. आप निष्पक्ष बुद्धि से सत्यार्थ प्रकाश और ऋग्वेदआदि पुस्तकें पढ़िए आपको सत्य के दर्शन अवश्य होंगे.