रविवार, 28 फ़रवरी 2010

दयानंद जी ने क्या खोजा क्या पाया (भाग ३)

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भाग २ से आगे क्रमशः

. "हरित शाक के खाने में जीव का मारना उनको पीड़ा पहुंचनी क्योंकर मानते हो? भला जब तुमको पीड़ा प्राप्त होती प्रत्यक्ष नहीं दिखती और जो दिखती तो हमको दिखलाओ।´ (सत्यार्थप्रकाश, दशमसमुल्लास, पृष्‍ठ 313) - आज पहली क्लास का बच्चा भी जानता है कि पेड़-पौधों पर अनगिनत सूक्ष्म जीवाणु वास करते हैं और खुद पेड़-पौधे भी Living things (जीवित वस्तुओं) में आते हैं। ऐसी विज्ञान विरूद्ध मान्यतओं को ज्ञान कहा जायेगा अथवा अज्ञान?

समीक्षा – यहाँ उन्होंने हरित शाक को कष्ट न होने की बात की है उनमें जीवन नहीं है ऐसा कब कहा जो तुम फिर प्रसंग से काट कर पेड़ पौधो के जीवन की बात कर रहे हो. वैसे यह एक पूर्ण अलग विषय है लिखने के लिए क्योंकि यह बात हमेशा एक मुद्दा रहती है कि मनुष्य शाकाहारी है या माँसाहारी है. उपरोक्त वर्णित पॉइंट में यह मुद्दा ही नहीं है पर मैं इस पर अभी और शोध करके भविष्य में लिखूंगा अभी के लिए मैं यह कहना चाहूँगा ईश्वर ने प्रत्येक जीव के लिए भोजन व्यवस्था की है जिस प्रकार शेर आदि मांसाहारी जीवो के लिए अन्य जीव खाने का क्रम रखा है उसी प्रकार मनुष्य आदि प्राकृतिक शाकाहारी है. और पेड़-पौधों से उत्पन्न जिन सूक्ष्म जीवाणुओं के कष्ट की बात तुम कर रहे हो उनका प्राकृतिक जीवन चक्र ही ऐसा है और उन्हें कष्ट नहीं होता है और इसी तरह पेड़ पौधे आदि का जीवन भी परार्थ होता है और यदि पेड़ पौधों को कष्ट होने की बात मान भी लें तो ऐसे तो एक व्याघ्र या शेर द्वारा मारे हुए जीव को भी दुःख होता है बल्कि सभी परजीवी किसी न किसी दूसरे जीव का अहित करते ही हैं और इस प्रकार तो ईश्वर भी दोषी हो जाता है कि एक को बिना कारण कष्ट देता है और दुसरे को सुख, इस प्रकार प्रत्येक भोजन श्रृंखला ही अन्याय पूर्ण हो जाती है. जबकि ईश्वर की बनायीं व्यवस्था कभी गलत नहीं होती और जीवों को जन्म उनके कर्मों के आधार पर ही मिलता है यदि यह न मानोगे तो ईश्वर को दोषी होने से नहीं बचा पाओगे. पूरी भोजन और जीव श्रंखला उनके कर्मों के निमित्त है पर उस से यह नहीं मान सकते कि एक हत्यारे को क्षमा दी जा सकती है क्योंकि मृत व्यक्ति की हत्या होना उसके पूर्व कर्मों के अनुसार था तो इसका उत्तर यह है कि जानवरों द्वारा दूसरे जीवों को मारा जाना उनके प्राकृतिक व्यवहार और भोजन श्रृंखला के अंतर्गत आता है पर मनुष्य द्वारा की गयी जीव हत्या प्रकृति विरुद्ध पाप है यदि स्वरक्षा न हो तो किन्तु हरित शाक आदि खाना प्राकृतिक है. अब इसमें बहुत लोग तर्क देंगे कि नहीं मनुष्य तो स्वभावतः मांसाहारी है और उसमें डार्विन का तर्कहीन, आधुनिक वैज्ञानिकों द्वारा खंडित सिद्दांत रखेंगे. और यह भी बात भी रखेंगे कि यदि मनुष्य प्राकृतिक शाकाहारी ही है तो वो मांस कैसे पचा सकता है. डार्विन के सिद्धांत को इसी तरीके से पोइंट्स बनाकर उसकी भी समीक्षा यहाँ की जायेगी और जिस प्रकार कुत्ता प्राकृतिक रूप से मांसाहारी है किन्तु वो शाकाहार पर भी जी लेता है उसी प्रकार मनुष्य भी प्राकृतिक रूप से शाकाहारी है और मांस भक्षण पर भी जी लेता है इस तरह की विशेषता कुछ जीवों में पाई जाती है. फिलहाल के लिए अभी एक बात पर ध्यान देना कि सभी मांसाहारी जीव जीभ से पानी पीते हैं जबकि शाकाहारी अपने होंठों से जोकि उनके पृथक प्राकृतिक व्यवहार को दर्शाता है. इस विषय पर और भी आगे के किसी लेख में सभी आरोपों के खंडन के साथ लिखूंगा समझ लेना वहां से किन्तु इसमें विज्ञान विरुद्ध कुछ भी नहीं है.

. क्या `नियोग´ की व्यवस्था ईश्वर ने दी है?

समीक्षा – इसका उत्तर मैं अपने एक पहले के लेख में दे चुका हूँ वहां देख लो. http://satyagi.blogspot.com/2009/11/blog-post.html

१०. इसी प्रकार हालाँकि स्वामी जी ने शूद्रों को भी थोड़ी बहुत राहत पहुंचाई है लेकिन फिर भी उन्हें अन्य वर्णों से नीच ही माना है। दयानन्द जी खुद भी `शूद्र´ और उसके कार्य को लेकर भ्रमित हैं। उदाहरणार्थ - सत्यार्थप्रकाश, पृष्‍ठ 50 पर `निर्बुद्धि और मूर्ख का नाम शूद्र´ बताते हैं और पृष्‍ठ 73 पर `शूद्र को सब सेवाओं में चतुर, पाक विद्या में निपुण´ भी बताते हैं। क्या कोई मूर्ख व्यक्ति, चतुर और निपुण हो सकता है? क्या बुद्धि और कला कौशल से युक्त होते ही उसका `वर्ण´ नहीं बदल जायेगा? क्या ऊंचनीच को मानते हुए भेदभाव रहित प्रेमपूर्ण, समरस और उन्नति के समान अवसर देने वाला समाज बना पाना संभव है? बच्चों को शिक्षा देने में भेदभाव नहीं करना चाहिए - `ब्राह्मण तीनों वर्ण ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैष्‍य, क्षत्रिय क्षत्रिय और वैष्‍य तथा वैश्य एक वैश्य वर्ण को यज्ञोपवीत कराके पढ़ा सकता है और जो कुलीन शुभ लक्षण युक्त शूद्र हो तो उसको मन्त्रसंहिता छोड़के सब शास्त्र पढ़ावे, शूद्र पढे़ परन्तु उसका उपनयन न करे। (सत्यार्थप्रकाश, तृतीय0 पृष्‍ठ 31) - अगर बचपन में ही ऊंचनीच की दीवारें खड़ी कर दी जायेंगी तो बड़े होकर तो ये दीवारें और भी ज्यादा ऊंची हो जायेंगी, फिर समाज उन्नति कैसे करेगा?

समीक्षा – वाह भई वाह क्या वाक्छल है तुम्हारा, तुमने अपनी पुस्तक ऐसे लिखी हैं कि कहीं की ईट कहीं का रोड़ा भानुमती ने कुनबा जोड़ा. पहले वक्तव्य में उन्होंने शुद्र की विद्या और ज्ञान-विज्ञान के सन्दर्भ में तुलना की है और दूसरे में उन्होंने यह बताया है कि शुद्र व्यक्तियों के कौन-कौन से कार्य हैं. क्या मैं एक बाल काटने वाले नाई जो कि बाल काटने में बहुत ही चतुर और निपुण है को एक बुद्धिमान ज्ञानी व्यक्ति कह सकता हूँ. और यदि कह सकते हैं तो उसको मंत्री पद, डॉक्टर या सोफ्टवेयर इंजिनियर बना देते हैं. हमारे यहाँ ऑफिस में एक एक शर्माजी आते थे जो अपने चपरासी के कार्य में बहुत चतुर और निपुण है उनको भेज देता हूँ आपके पास कुरान की व्याख्या के लिए क्योंकि आपके अनुसार तो वो ज्ञानी भी होंगे क्योंकि वो चतुर और निपुण है. वास्तव में आज यही दौर चल रहा है जिनकी बुद्धि बाल काटने, खाना बनाने, सफाई आदि सेवा कार्यों की है वो ही इस देश कि बाग-डोर संभाले हुए हैं अन्यथा क्षत्रिय होते तो तुम जैसे लोगो की इस तरह की हिम्मत और ध्रष्टता नहीं होती की हमारे घर में ही रह कर हमारी ही संस्कृति और सत्य ज्ञान की बुराई और असत्य का साथ देने वाले दुश्मनों की तारीफ़.

यज्ञोपवीत और उपनयन संस्कार इसलिए कराया जाता था ताकि बालक पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए शिक्षा ग्रहण करे, शुद्र अर्थात कम बुद्धि बालक को इसलिए मना किया है क्योंकि उससे इन संस्कारों और ब्रह्मचर्य के खंडन का डर रहता है और कम बुद्धि बालक मंत्र्सहिंताओं के अर्थ का अनर्थ कर सकता है जैसे कालांतर में शुद्र लोगो (मूर्खों) ने वाम मार्ग चलाया और वेदों में मांस भक्षण इत्यादि कुकर्म लिखे हैं ऐसा प्रचार किया क्योंकि उनकी सामर्थ्य ही नहीं थी इनका भावार्थ समझने की इसीलिए तो कहते हैं बन्दर के हाथ में दर्पण देना खतरनाक होता है और यहाँ बचपन में कोई ऊंच-नीच की दीवार नहीं खड़ी की जाती थी सबको एक जैसा ही सम्मान मिलता था पर बुद्धि के अनुरूप ही व्यक्ति को शिक्षा और कार्य सोंपा जाता था. तुम्हारी कम और धुर्त बुद्धि इसको ऊंच-नीच की दीवार मानती है जबकि यह न्यायपूर्ण है. पहले बालक को ३ दिन सभी विषयों और विद्याओं के बारे में बताया जाता था और फिर उसकी रुचि और ज्ञान के अनुसार उसको विद्या ग्रहण कराई जाती थी.

११. स्वामी जी की कल्पना और सौर मण्डल ''इसलिए एक भूमि के पास एक चन्द्र और अनेक चन्द्र अनेक भूमियों के मध्य में एक सूर्य रहता है।'' (सत्यार्थप्रकाश, पृश्ठ 156) यह बात भी पूरी तरह ग़लत है। स्वामी जी ने सोच लिया कि जैसे पृथ्वी का केवल एक उपग्रह `चन्द्रमा´ है। इसी तरह अन्य ग्रहों का उपग्रह भी एक-एक ही होगा। The Wordsworth Encylopedia, 1995 के अनुसार ही मंगल के 2, नेप्च्यून के 8, बृहस्पति के 16 व शानि के 20 उपग्रह खोजे जा चुके थे। आधुनिक खोजों से इनकी संख्या में और भी इज़ाफा हो गया । सन् 2004 में अन्तरिक्षयान वायेजर ने दिखाया कि शानि के उपग्रह 31 से ज्यादा हैं। (द टाइम्स ऑफ इण्डिया, अंक 2-07-04, मुखपृष्ठर) इसके बाद की खोज से इनकी संख्या में और भी बढ़ोतरी हुई है। अंतरिक्ष अनुसंधानकर्ताओं ने ऐसे तारों का पता लगाया है जिनका कोई ग्रह या उपग्रह नहीं है। ‘PSR 1913+16 नामक प्रणाली में एक दूसरे की परिक्रमा करते हुए दो न्यूट्रॉन तारे हैं।´ (समय का संक्षिप्त इतिहास, पृष्ठप 96, ले। स्टीफेन हॉकिंग संस्करण 2004, प्रकाषक: राजकमल प्रकाशन प्रा। लि0, नई दिल्ली-2)`खगोलविदों ने ऐसी कई प्रणालियों का पता लगाया है, जिनमें दो तारे एक दूसरे की परिक्रमा करते हैं। जैसे CYGNUS X-1सिग्नस एक्स-1´ (पुस्तक उपरोक्त, पृष्ठ 100) वेदों में विज्ञान सिद्ध करने के लिए स्वामी जी ने जो नीति अपनाई है उससे वेदों के प्रति संदेह और अविश्वास ही उत्पन्न होता है। क्या इससे खुद स्वामी जी का विश्वास भी ख़त्म नहीं हो जाता है?

समीक्षा - एक भूमि के पास एक चन्द्र और अनेक चन्द्र अनेक भूमियों के मध्य एक सूर्य रहता है इससे यह कहाँ मतलब निकलता है कि प्रत्येक ग्रह के साथ एक ही चन्द्र है वाक्य का द्वितीय भाग से स्पष्ट होता है अनेक चन्द्र भी हैं और अनेक भूमियाँ भी और यह वाक्य सौर मंडल के बारे में कहा गया है ना कि सभी लोको के बारे में हाँ सभी सौर मंडल इसी प्रकार के होते हैं यह उनका मंतव्य हो सकता है। यहाँ एक चन्द्र की बात हमारी पृथ्वी के सन्दर्भ में कही गयी है सभी ग्रहों के बारे में नहीं और आपने यहाँ फालतू में अपने ज्ञान का दिखावटी प्रदर्शन किया है जिसकी यहाँ पर कोई आवश्यकता नहीं है.

उपसंहार – मैंने लेखक के लगाये हुए महत्त्वपूर्ण सभी आरोपों की समीक्षा कर दी है फिर भी यदि कोई गलती से कोई पॉइंट छूट गया हो तो आप इस समीक्षा से समझ सकते हैं की इस पुस्तक का कोई भी आरोप सत्य नहीं है. अब मैं इस बकवास पुस्तक को अधिक महत्व न देते हुए बस यही इस समीक्षा का अंत करना चाहूँगा इन सब बातो के साथ लेखक ने कुरान को बेवकूफी के साथ सत्य वैज्ञानिक पुस्तक सिद्ध किया हुआ है और कुछ हमारे वैदिक धर्मशास्त्रों को वेदविरुद्ध बताया है, आर्य समाज और वेदांत को अलग-२ मत बताया है, पुनर्जन्म को वेद विरुद्ध और अतार्किक बताया है जबकि किसी बात का लेखक ने कोई संतोषपूर्ण तर्क नहीं दिया है. मिथ्या अनर्गल प्रलापों के साथ यह पुस्तक बुद्धि के दिवालिएपन से अधिक और कुछ नहीं है. बेहूदा, अतार्किक, इधर-उधर से वाक्य उठाकर उनको सन्दर्भरहित पेश करके अपने प्रयोजन कुरान को श्रेष्ठ को सिद्ध किया है. यह उन बकवास पुस्तकों में से एक है जिनका ये लोग दिन रात प्रचार कर रहे हैं. कुरान को धरती का अजर अमर और अक्षय ग्रन्थ बताया गया है. मैं यहाँ कुरान की समीक्षा करने के बजाय केवल पाठकों से एक विनती करूँगा कि वो कुरान पढ़ें और इस धरती के अजर अमर ग्रन्थ की सत्यता से परिचित हों. मैं प्रयास करूँगा कि अब आगे से इनकी मिथ्या बकवास भरी बातों पर अधिक ध्यान न देकर वैदिक धर्म के बारे में लिखूंगा क्योंकि ये लोग तो अपनी अनाप-शनाप बकते ही रहते हैं पर लोगो को जागरूक रहना चाहिए ये इनका मूर्खता भरा बोद्धिक जेहाद है ईसाई मिशनरियों की तरह जिसमें कभी-कभी हिंदुओं में कुछ मुर्ख लोग इनके और तथाकथित सेकुलर्स के झांसे में आ जाते हैं. मैं पुनर्जन्म, शाकाहार आदि विषयों पर पर इनकी अतार्किक बकवास बातों पर ध्यान न देते हुए वैदिक धर्म के विचार रखना अधिक पसंद करूँगा तब पाठक निर्णय स्वयं ही सत्य-असत्य का निर्णय ले सकते हैं.

4 टिप्‍पणियां:

EMRAN ANSARI ने कहा…

AADARNIYA AATRAY JI
aapko malum h ki kya kahtey h doctor anwar jamal aapkey baarey m aur aapki aapattiyo k barey m.
see below:
http://vedquran.blogspot.com/2010/03/aryan-method-of-breeding-156-24-20-1927.html
एक आदर्श आर्य के लिए जीवन में सोलह संस्कारों का पालन करना अनिवार्य है । उनमें से एक है गर्भाधान संस्कार । अब इसका पालन कोई कोई ज्ञानी टाइप ही करता है जबकि पहले इसका चलन अमीर आर्यों में आम था ।गर्भाधान संस्कार की दयानन्दी रीति”जिस रात गर्भाधान करना हो उस दिन हवन आदि करे और वहां निर्दिष्ट 20 मंत्रों से घी की आहुतियां दे। चारों दिशाओं में पुरोहित बैठें । इसके बाद घी दूध ‘शक्कर और भात मिलाकर छः आहुतियां अग्नि में डाले । तत्पश्चात आठ आहुतियां घी की दे । आठ आहुतियां घी की फिर दे । इसके बाद नौ आहुतियां दे । बाद में ताज़ा घी और मोहन भोग की चार आहुतियां दे । जो घी ‘शोष रहे उसे लेकर वधू स्नानागार में जाए और वहां पैर के नख से लेकर शिर पर्यंत सब अंगों पर मले । तत्पष्चात वह नहा धो कर हवन कुंड की प्रदक्षिणा करके सूर्य के दर्शन करे । बाद में पति उसके पिता पितामह आदि अन्य माननीय पुरुषों पिता की माता अन्य कुटुंबी और संबंधियों की वृद्ध स्त्रियों को नमस्कार करे । तत्पश्चात पुरोहितों को भोजन कराये और सत्कारपूर्वक उन्हें विदा करे । रात्रि में गर्भाधान क्रिया करे । जब वीर्य गर्भाषय में गिरने का समय आए तब दोनों स्थिर ‘शरीर प्रसन्नवदन मुख के सामने मुख नासिका के सामने नासिका आदि सब सूधा ‘शरीर रखे । वीर्य का प्रक्षेप पुरुष करे। जब वीर्य स्त्री के ‘शरीर में प्राप्त हो उस समय अपना पायु (गुदा) और योनींद्रिय को ऊपर संकुचित कर और वीर्य को खैंच कर स्त्री गर्भाशय में स्थिर करे । गर्भ स्थापित होने के दूसरे दिन सात आहुतियां दे । फिर ‘शांति आहुति देकर पूर्णाहुति दे ।” (संस्कार प्रकाश प्रथम संस्करण 1927 भाषा टीका संस्कार

सौरभ आत्रेय ने कहा…

तुम लोग अपनी सिद्धांत विरुद्ध बातों से नहीं मानोगे क्योंकि विषय है यहाँ पर क्या और क्या बकने लग गए, अब यदि मैं तुम्हारी इन सब बातों का उत्तर देता हूँ फिर तुम कोई और विषय के विपरीत बात सन्दर्भ-प्रसंग रहित उठाकर लाओगे या फिर जिस बात का जहाँ कोई भावार्थ नहीं है उसमें अपनी मोटी बुद्धि के अनुससार टांग घुसेड़ोगे.वास्तव में तुम और तुम्हारा अनवर जमाल टाइप बकवास लोग सत्यता से डरते हैं और तुम्हारे अंदर कूट-कूट कर जेहादी जहर भरा गया है जिसका इलाज अब कुछ नहीं है क्योंकि तुम्हारी गन्दी मोटी बुद्धि अपनी गन्दी हरकते करने से नहीं मानेगी.

मैं तुम्हारी इन बकवास बातो पर अब ध्यान देने वाला नहीं हूँ क्योंकि तुम लोग सत्य जानना चाहते ही नहीं हो बस तुम्हारा उद्देश्य हिंदुओं या आर्यो का विरोध करना है जिस में कोई नयी बात भी नहीं है ये तो दस्यु या म्लेच्छ लोग करते ही आये हैं. ये तो भविष्य ही बताएगा कि सत्य धर्म जीतेगा या जाहिलो का मजहब.

Satish Ravi ने कहा…

मैं आपको स्पष्ट रूप से धर्म का आइना दिखाना चाहता हु,,आर्य धर्म एक गहरा अंधकार से भरा हुआ कुंवा है जहा पे शुद्रो और नारियो के बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं है ,,,,,आर्य धर्म के अनुसार जाती कभी भी जन्म के आधार पे नहीं होती थी,वो तो कर्म के अनुसार ही होती थी...पर कुछ लोगो द्वारा अपने विशेषाधिकार को बचाने के लिए जन्म के आधार पे जाती का निर्धारण किया,जो की पूर्णतया गलत है....

chandra shekher ने कहा…

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