शनिवार, 6 मार्च 2010

सत्य का निर्धारण कैसे हो (न्यायदर्शनम् भाग १)

ऐसा लगता है इन्टरनेट पर भी कोई भी व्यक्ति कुछ भी कहने के लिए स्वतंत्र है चाहे वो सत्य हो या असत्य, तार्किक हो या अतार्किक। इस बात से बहुत से पाठक धुर्त और मुर्ख लोगो के असत्य के जाल में फंस जाते हैं जिस से सत्य की हानि होती है। नैट पर लोगो द्वारा छलना और छला जाना एक आम बात है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए सत्य और असत्य का निर्धारण कैसे हो मैं यहाँ इस लेख में कुछ तथ्यों को रखूंगा जो अध्यात्मिक सत्य को जांचने के साथ-२ आम जीवन के भी असत्य प्रलापों और धोखा-धड़ी को समझने में लोगो कि सहायता करेंगे। पाठकगण कृपया इन तथ्यों पर चिंतन करके अपनी आत्मनुभूति या अंतर्द्रष्टि से विवेकपूर्ण होकर किसी भी लेख का विवेचन करें और तभी उसके पश्चात कोई निर्णय लें। यह लेख समस्त मानवजाति के लिए आर्य हिंदू वैदिक सनातन धर्म के उस न्यायदर्शनम् के अनुरूप है जिसके रचियेता आदि विद्वान परमर्षि गौतम मुनि हैं । भारतीय वैदिक दर्शनों में गौतमीय न्याय दर्शन अर्थ-तत्व को समझने की प्रक्रियाओं का सर्वांगपूर्ण विवरण प्रस्तुत करता है।यह विवरण इतना वस्तुनिष्ठ है कि प्रारंभ से लेकर विचार के अंतिम स्तर तक इसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती। सभी वैदिक-अवैदिक दर्शनों को अपने मान्य सिद्धांत प्रस्तुत करते समय इस पद्दति का प्रयोग करना अपेक्षित होता है। वैसे तो न्याय-दर्शन का विषय अत्यंत दीर्घ आध्यत्मिक है किन्तु सामान्यजनों को जितना कम से कम तो जानना ही चाहिए उतना ही मैं यहाँ वर्णन करने का प्रयास करूँगा । मेरे विचार से इस न्याय-दर्शन का लोगो को ज्ञान होना अति आवश्यक है। क्योंकिं इस व्यभिचारी युग में छल अपने परमरूप में विद्यमान है जिसको समझने और लोगो को समझाने के लिए न्याय-दर्शन का ज्ञान अति-महत्त्वपूर्ण हो जाता है। लेख में मैं मन्त्र या सूक्त नहीं लिख रहा हूँ और मैं यहाँ प्रयास करूँगा जितना हो सकेगा इन तत्वों का विवेचन संक्षिप्त कर सकूं फिर भी जहाँ कुछ समझने के लिए अधिक आवश्यक होगा वहां पर थोड़ा विस्तृत हो सकता है।

किसी बात की सत्यता प्रमाण द्वारा होती है। प्रमाण प्रत्येक पदार्थ के ज्ञान का साधन है चाहे वो जीवन में प्रयुक्त होने वाले आम पदार्थ हों, कोई वाक्य हो, कोई विचार हो, आत्मतत्व हो या ईश्वर तत्व हो सभी के ज्ञान में प्रमाण आवश्यक है अन्यथा किसी विवेकशील व्यक्ति को संतुष्टि नहीं मिलती। जो पदार्थ प्रमाण से जाना जाता है वह सब प्रमेय कहा जाता है। प्रमाण की प्रवृत्ति प्रमेय में तभी होती है जब संशय अंकुरित होता है। अतः प्रमेय के अनंतर संशय आता है। संशय तभी जागृत होता है , जब व्यक्ति किसी विशिष्ट उद्देश्य से कहीं प्रवृत्त होना चाहता है अथवा उसका कोई प्रयोजन होता है। विशिष्ट प्रयोजन पहले किसी अनुकूल अनुभव के आधार पर उभरता है वो अनुकूल अनुभव दृष्टान्त कहा जाता है। उसके बल पर ही सिद्धांत प्रकाश में आता है। यह सब खेल जिन पर अवलंबित है वे अवयव कहलाते हैं उनके प्रसंग में उहापोह द्वारा कोई निर्णय निखार में आता है अर्थात तर्क और निर्णय आते हैं।

इस प्रकार के कथनोपकथन केवल ३ विद्याओं में संभव हैं, वो ३ विद्याएँ हैं वाद, जल्प और वितण्डा। इन विद्याओं में उत्तर की अपेक्षा पूर्व-२ (पहले आने वाले) श्रेष्ठ हैं अर्थात वितण्डा से श्रेष्ट जल्प है और सर्वश्रेष्ट वाद है। किसी बहस या चर्चाओं में दब आने पर व्यक्ति अपनी खाल को बचने के लिए दूषित प्रयोग करता है। ये दूषित प्रयोग भी ४ प्रकार के होते हैं, जिनको हेत्वाभास, छल, जाति और निग्रहस्थान पदों से अभिव्यक्त करते हैं। इनमें भी दूषण की द्रष्टि से पूर्व की अपेक्षा उतरोत्तर (बाद में आने वाले) निकृष्ट है अर्थात निग्रहस्थान सर्व-निकृष्ट है। सत्य-असत्य को जानने समझने के लिए इन १६ विद्याओं का जानना आवश्यक है। इस प्रकार ये सब विद्याएं सब धर्मों का आश्रय हैं।

क्रमशः

7 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

saurabh g saty ka nirdhaaran bad me karna ek haraami aapko yaad kar raha hai.pahle us se millo.

अनुनाद सिंह ने कहा…

बहुत अच्छी जानकारी।

किन्तु ध्यान रखिये कि आप यह 'बीन' 'भैसों' के लिये नहीं बजा रहे हैं। जिनका सम्पूर्ण दर्शन जिहाद, फतवा, बुरका, तलाक, काफिर, कत्ल तक ही सीमित है वे न्यायदर्शन के उच्च दर्शन को क्या समझ सकते हैं। जो एक अति सामान्य किताब को अपने कुएँ में बैठकर सर्वस्व मान बैठे हैं वे 'नेति-नेति' कहकर सतत 'सत्य की खोज' करने वाले और सहस्रों ग्रन्थों वाले धर्म का मर्म क्या समझेंगे?

केवल एक अनपढ़ रक्तपिपासु द्वारा द्वारा आतंक फैलाने के लिये खोजे गये सिद्धान्तों को आंख मूंदकर अन्तिम सत्य मानने वाले 'नैको मुनिर्यस्य वच: प्रमाणम्' (कोई भी मुनि नहीं है जिसका वचन अन्तिम सत्य है) जैसी विशाल मष्तिष्क वाली उदार और क्रिटिकल समझ के स्वामी कैसे बन सकते हैं? वे कैसे समझ सकते हैं कि कोई भी अच्छी चीज (चाहे वह सिद्धान्त ही क्यों न हो) तभी बन पाती है जब उसमें बहुत सारे मेधावी और प्रतिभासम्पन्न लोगों द्वारा योगदान देकर उसे शुद्ध से शुद्धतर बनाया जाता है।

safat alam taimi ने कहा…

यारो!यह साधु संत तुझे अपने घेरे में रख कर तुम सबको ठगना चाहते हैं, अपनी दुकान चमकाना चाहते हैं, हमारे पास कितने साधुओं ने इस्लाम स्वीकार किया है,जो आज यह डंके की चोट पर कह रहे हैं कि यह साधु ही लोगों को अपनी माया जाल में फंसा कर रखे हुए हैं यदि उन्होंने सत्य बता दिया होता तो आज लोग अपनी अमानत को अपना लिए होते। क्रोधित न हों बस डा0 वेद प्रकाश उपाध्याय, तथा डा0 एम ए श्री वास्तव की पुस्कतें पढ़ कर देख लें पता चल जाएगा कि हम सत्य से कितने दूर हैं और साधुओं नें हमें कैसे अपने जाल में फंसा रखा है। उन दोनों विद्वानों की पुस्तकों का सार यह है कि आज हिन्दू जिस कल्कि अवतार की प्रतीक्षा कर रहे हैं वह आ चुके, वही मुहम्मद सल्ल0 हैं। जी हाँ! अंधकार से निकलने का कोई रास्ता कल्कि अवतार को माने बिना नहीं मिल सकता।

सौरभ आत्रेय ने कहा…

@बेनामी जी
मैं अब इन लोगो को उत्तर कभी-२ देना ही पसंद करूँगा क्योंकि यदि मैं इनकी किसी भी बात का उत्तर देता हूँ तो ये लोग फिर से अपनी एक नयी बकवास ढूँढ कर लायेंगे और इसी तरह ये सिलसिला निरंतर चलता रहेगा जिसका कोई लाभ नहीं है. इसीलिए मैंने यहाँ न्याय दर्शन के अनुरूप एक संक्षिप्त लेखों की श्रंखला रखी है जिस से लोगो को निर्णय करने में आसानी हो और इनका छल अपने आप समझ आये.

@अनुनाद सिंह जी
मैं भी ये जानता हूँ की इन लोगो का कोई इलाज़ नहीं है और इस बीन को समझने की बुद्धि इन लोगो में है भी नहीं तो आप बिलकुल चिंतामुक्त रहिये और ऐसे ही उत्साहवर्धन करते रहिये. मुझे लगता है हिंदुओं को अपने धर्म के बारे में बताने में अधिक लाभ है जिससे वे किसी के बहकावे में न आयें. इनके मुंह लगने से कोई लाभ नहीं है क्योंकि अधिकतर इनकी बुद्धि इनके मजहब के अनुरूप अत्यधिक धुर्त और संकीर्ण है.

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

आखि़र एक आर्य नफ़रत में इतना अन्धा क्यों हो जाता है कि वह उन महापुरूषों पर भी बेहूदा टिप्पणी करने लगता है जिनकी महानता का गान केवल देश में ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में हो रहा है ? हिन्दू मुसलिम के बीच गिरती दीवारें और बढ़ता प्रेम देखकर इन्हें अपना अन्त क्यों दिखने लगता है? अपने ढहते हुए वर्चस्व को बनाये रखने की ख़ातिर कब तक ये लोगों को वर्ण व्यवस्था की ऊँचनीच की बेड़ियों में जकड़े रखने की नाकाम कोशिश करते रहेंगे ?
http://vedquran.blogspot.com/2010/03/black-fire-flag.html

सौरभ आत्रेय ने कहा…

अनवर जमाल जी आपके और आपके अनुयाइओ के इन मिथ्या प्रचारों और छल को लोग भली-भांति समझते हैं. ना तो मैंने किसी महापुरुष पर बेहूदा टिपण्णी की है और ना ही हिन्दू मुस्लिमों के बीच की दीवारें गिरी हैं और ना ही कोई प्रेम पनपा है. यदि ऐसा होगा तो सबसे अधिक ख़ुशी मुझ जैसे लोगो को होगी और अंत होगा भी तो आप जैसे लोगो का होगा क्योंकि आप साम्प्रदायिक लोगो की दुकानदारी बंद जो हो जाएगी. हिन्दू मुसलामानों के बीच प्रेम पनपे पर हिन्दुओं के स्वाभिमान को ठेस पहुंचाकर या छल और धोखे से नहीं बल्कि उनके सम्मान के साथ ये हम चाहते हैं. हमें ऐसी दीवार गिराने और प्रेम के पक्षधर नहीं हैं जैसे मनमोहन सिंह ने पकिस्तान के धुत्कारने पर भी वार्ता के लिए उसके आगे घुटने टेक दिए. आप जो हम हिन्दुओं और समस्त मानव जाति के कल्याणार्थ वेदों के दुष्प्रचार में लगे हैं और उसके बावजूद बेशर्मी से हिन्दू मुस्लिम प्रेम की बात कर रहे हैं, कोई हिन्दू इसको स्वीकार नहीं करेगा. आपने हिन्दू आर्य वैदिक सनातन धर्म को इस्लाम से जोड़कर और कुरान को अक्षय अजर अमर ग्रन्थ बताकर अपनी बुद्धिमत्ता का परिचय तो सबको दे ही दिया है इसीलिए मुझे आपकी बातों से कोई सरोकार नहीं है और तुम्हारा ये कुप्रचार और छल कोई काम नहीं आएगा और बस चंद आपके चेले ही आपकी तारीफ़ करेंगे और कोई नहीं.
यदि आप जैसे सभी लोग अपने ज्ञान चक्षु खोलकर अपने संकीर्णद्रष्टिदोष से अपने कुए के बहार निकल कर समुद्री जल देखें तो आपका भी कल्याण होगा. यदि आपके पास जेहादी आतंकवादियों की फौज है तो आप जैसे लोगो के फैलाए हुए कुचक्रों को समाप्त करने के लिए हिन्दुओं में अभिमन्युओं की कमी नहीं है. आगे-२ देखिये आपके कुचक्रों की धज्जियाँ कैसे उडती हैं बस हमें हिन्दुओं का खोया हुआ सिंहत्व जगाना है.

nitin tyagi ने कहा…

@saurabh ji

लात्तों के भुत बातों(ज्ञान) से नहीं ,जूतों से मानते हैं|