गुरुवार, 3 जून 2010

धर्म और विज्ञान तथा धर्म और राष्ट्र में कौन बड़ा ?

अक्सर लोग धर्म को ही सब चीजो की समस्या का मूल कारण बताते हैं। आपने बहुत बार ये वाक्य पढ़े या सुने होंगे -- शासन धर्म-निरपेक्ष होना चाहिये, धर्म से ऊपर उठकर भी सोचना चाहिये, धार्मिक कर्मकाण्डो में नहीं फंसना चाहिये, धर्म और विज्ञान मैं कौन श्रेष्ठ है, धर्म और राष्ट्र में कौन बड़ा है, इस्लाम धर्म, ईसाई धर्म-प्रचारक इत्यादि अनेक धर्म शब्द आधारित वाक्य हैं जो आजकल जीवन में प्रत्येक जगह सुनने को मिल ही जाते हैं। सबसे पहले हम धर्म और विज्ञान की बात करते है क्योंकि आजकल के बुद्दिजीवियों ने इन्हें आपस में शत्रु घोषित किया हुआ है।

विज्ञान क्या है –आधुनिक परिभाषा के अनुसार किसी विषय का विशेष ज्ञान विज्ञान है। उस विशेष ज्ञान के आधार पर कुछ प्राप्त करना या चीजो का समायोजन करके बना लेना वैज्ञानिक उपलब्धि कहलाती है जैसे कार , कम्प्यूटर, विमान इत्यादि। विज्ञान के बारे में अधिकतर लोग परिचित हैं तो उसकी अधिक व्याखा न करते हुये धर्म की संक्षिप्त में परिभाषा देकर उनकी तुलना करना अधिक बेहतर है।

धर्म क्या है – क्योंकि धर्म संस्कृत या हिंदी का शब्द है और वैदिक (हिंदू) पुस्तकों से ही इस शब्द की उत्पत्ति हुई है इसीलिए उन्ही पुस्तकों के अनुरूप उसके मूल ग्रंथों वेदों के अनुसार --परमेश्वर हम सभी मनुष्यों के लिये धर्म का उपदेश इस तरह से करता है कि – हे मनुष्यों ! जो पक्षपात रहित न्याय सत्याचरण से युक्त धर्म है, तुम लोग उसी को ग्रहण करो , उससे विपरीत कभी मत चलो, तुम लोग अपने यथार्थ ज्ञान को नित्य बढाते रहो जिससे तुम्हारा मन प्रकाशयुक्त होकर पुरूषार्थ को नित्य बढ़ावे, जिससे तुम लोग ज्ञानी होके नित्य आनंद में बने रहो और तुम लोगो को धर्म का ही सेवन करना चाहिये, अधर्म का नहीं। सक्षिप्त में इस परिभाषा के अनुसार धर्म वह है जो न्याय और सत्य है बाकी सब अधर्म है। उदाहरण के तौर पर एक न्यायधीश(Judge) यदि पक्षपातरहित निर्णय लेता है तो वह अपने धर्म का पालन करता है, माता-पिता, गुरु आदि बालक को सत्य ज्ञान का उपदेश करते हैं तो वो अपने धर्म का पालन करते हैं, एक वैज्ञानिक कुछ मानव उपकार हेतु आविष्कार करता है तो वह भी उसका कार्य धर्मान्तार्गत ही आता है।

हिंदू धर्म(वेदों) में अवयव रूप तो अनेक विषय हैं परन्तु उनमें से चार मुख्य हैं –(१) विज्ञान अर्थात सब पदार्थों को यथार्थ जानना, (२) दूसरा कर्म , (३) तीसरा उपासना, और (४) चौथा ज्ञान है। धर्म के अनुसार ‘विज्ञान’ उसको कहते हैं जो कर्म, उपासना और ज्ञान इन तीनों से यथावत उपयोग लेना और परमेश्वर से लेकर त्रणपर्यन्त पदार्थों का साक्षात बोधका होना उनसे यथावत उपयोग का करना, इससे यह विषय इन चारों में भी प्रधान है, क्योंकि इसी में वेदों का मुख्य तात्पर्य है। और यह भी २ प्रकार का है –एक तो परमेश्वर का यथावत ज्ञान और उसकी आज्ञा का बराबर पालन करना, और दूसरा यह है कि उसके रचे हुए सब पदार्थों के गुणों को यथावत विचार करके उनसे कार्य सिद्ध करना, अर्थात ईश्वर ने कौन-कौन से पदार्थ किस-किस प्रयोजन के लिये रचे हैं। और इन दोनों में से भी जो ईश्वर का प्रतिपादन है वो ही प्रधान है

आपने बहुत से निबंध आदि इस विषय पर पढ़े होंगे जो धर्म और विज्ञान के मतभेद को बताते हुए अंत में विज्ञान को श्रेष्ट सिद्ध कर देते हैं। पर वास्तव में वे लोग विज्ञान की तुलना धर्म का नाम लेकर किये जा रहे विभिन्न अंधविश्वासों और बहुत से क्रिया-कलापों से करते हैं, या तो वो धर्म से अनभिज्ञ हैं या फिर वे जान-बूझकर अपने को जल्दबाजी में श्रेष्ठ सिद्ध करना चाहते हैं। वेदों में बहुत सारी अतार्किक और असत्य बातें लिखी हैं और ये आज के समय में अप्रसांगिक हैं यह कहने वालो की संख्या हिंदुओं में ही अधिक मिल जायेगी कहीं और जाने की भी जरूरत नहीं है। इसका कारण अपने को श्रेष्ठ घोषित करने के लिये और अशिक्षा आदि के कारण विभिन्न प्रतिस्पर्धा से उपजे सैकड़ों मत (मजहब, रिलीजन, सम्प्रदाय आदि) हैं जिन सबकी नीव ही वैदिक सनातन धर्म के विरोध स्वरुप खड़ी है, यदि ये वेदों में वास्तविक जो सत्य लिखा है उसको बताएँगे तो इनकी कौन सुनेगा इसीलिए इन्होने हमेशा से ही वेदों का अत्यधिक दुष्प्रचार किया है और आज भी यहीं कारण है समस्त विश्व के मत आदि इस वैदिक सनातन संस्कृति को जड़ से मिटाने का अपना निरंतर प्रयास जारी किये हुए हैं।

धर्म कभी भी विज्ञान विरोधी नहीं है अपितु उससे ही विज्ञान निकला है, यह बात शायद आपको अजीब लगे क्योंकि धर्म और विज्ञान को आज मनुष्यों ने एक दूसरे का प्रतिस्पर्धी बना दिया है जबकि प्रामाणिक सत्यता कुछ और ही कहती है। धर्म कोई अपना किसी का निजी मत, सम्प्रदाय, मजहब या रिलीजन नहीं है जो एक मत के वर्ग के लिये ही होता है। धर्म समस्त मानव जाति के कल्याणार्थ हेतु होता है। हम सभी अपने दैनिक जीवन में कुछ ना कुछ धर्म का पालन करते ही हैं अन्यथा यदि मनुष्य धर्म का पालन ना करे तो उसका मानव शरीर भी व्यर्थ है। जैसे यदि हम अपने बालको को शिक्षा देकर अपने धर्म का पालन करते हैं। यह बात अलग है कि हम कुछ धर्मों का पालन करते हैं और कुछ का नहीं जोकि आज मानव के दुःख का यथार्थ कारण है।

धर्म के अनुसार विश्व के समस्त मनुष्य की एक जाति है जिसमें उसके बोद्धिक स्तर के अंतर के फलस्वरूप विभिन्न वर्गों में बाटा जा सकता है किन्तु धर्म, धर्म का पालन करने से किसी को नहीं रोकता। हम हिंदू लोग अपने बच्चे को कोई भी अच्छा कार्य करने के लिये जब भी प्रेरित करते हैं तो उसको समझाते हैं यह हमारा धर्म है कर्तव्य है। जैसे किसी भी जीव को बिना मतलब सताना नहीं चाहिये यह हम सब मनुष्यों का धर्म है किन्तु दुराचारी को दण्ड देना भी धर्म है। इसी प्रकार की शिक्षा लेकर जब बच्चा बड़ा होता है और दुनिया के बाकी लोगो के सम्पर्क में आता है जिनमें बहुतसे लोग अपने किसी निजी मत को ही मान्यता देते हैं चाहे उनकी मान्यता कुछ भी क्यों न हो, तब हम बालक से यह कहकर कि ये भी धर्म हैं, एक बहुत ही गंभीर और भारी गलती करते हैं जो आज इस राष्ट्र की सबसे मूल समस्या का कारण है। क्योंकि बालक को अब तक शिक्षित यह कह कर किया जाता है जो सत्य और न्याय है वही धर्म है किन्तु बालक उन मतों की मिथ्या बातों को धर्म मानकर उनके गलत संस्कारों, मिथ्या, व्यभिचार और अनेक असत्य बातों को भी धर्म या धार्मिक कार्यों की संज्ञा देने लगता है और अपने मन में उस निर्मल वास्तविक धर्म के संस्कारों को भी संशय की द्रष्टि से देखने लगता है। अब वह सत्य हो या असत्य सभी बातों को धर्म की संज्ञा देता है। उन असत्य बातों को धर्म मानकर जब वह कभी विचलित होता है तो नए अजीब संज्ञा अर्थविरोधी आदि शब्दों का प्रयोग करता है जैसे कि एक शब्द है ‘धर्मान्ध’। धर्म मानव के मन-मस्तिष्क को प्रकाशित करता है और प्रेरणा भी देता है न कि उसको अंधा बनाता है। यदि उसे धर्म और बाकी मतों में अंतर बताया जाता तो वह ऐसा कभी नहीं कहता वह उसको श्रेष्ठ धर्मयुक्त ही कहता और बाकी को मतान्ध या अंधविश्वास। यह सब बातें देखने और सुनने में बहुत छोटी लगती हैं किन्तु गहराई से देखने पर हिंदू धर्म की दुर्दशा का कारण आपको दिखाई दे जायेगा। जैसे कि आजकल के बुद्धिजीवी भी वास्तविक धर्म को जाने बिना धर्म और विज्ञान को आपस में लड़ाते हैं ऐसे ही धर्म और राष्ट्र को , धर्म और न्याय को , धर्म और सत्य को तथा धर्म और ज्ञान को भी लड़ाते हैं। क्योंकि उनको सर्वधर्मसमभाव के अनर्थ का रट्टा घोट-घोट कर पिलाया गया है जिस कारण वो विभिन्न मतों द्वारा फैलाई गयी असत्य बातों को जानते हुए भी उनको धर्म की संज्ञा से ही सुशोभित करते हैं जबकि धर्म विज्ञान को सर्वोच्च मान्यता देता है, राष्ट्र क्या होता है यह बताता है, राष्ट्र-प्रेम और विश्व-प्रेम की शिक्षा देता है, सत्य और न्याय ही धर्म होता है और धर्म से ही मानव ज्ञान प्राप्त करता है। इस तरह की संज्ञा से वे धर्म की हानि ही करते हैं और अनजाने में लोगो को यह कहने का मौका भी देते हैं कि सभी धर्मों में गलत-सही सभी तरह की बाते हैं जबकि धर्म तो केवल सत्य और न्याय है और वह कभी गलत नहीं होता।

जो धर्म का विज्ञान के बारे में यह कहना कि ‘परमेश्वर के रचे हुए सब पदार्थों के गुणों को यथावत विचार करके उनसे कार्य सिद्ध करना’ उसको आज लोगो ने अत्यधिक महत्व दिया है किन्तु धर्म के प्रधान विज्ञान विषय ‘परमेश्वर का यथावत ज्ञान और उसकी आज्ञा का बराबर पालन करना’ को लोगो ने भुला दिया है। पदार्थों के गुणों के यथावत ज्ञान को भी आज मनुष्य ने कल्याण हेतु नहीं अपितु विश्व संहारक की तरह अधिक प्रयोग किया है जबसे उन्होंने मुख्य प्रधान विषय की अवेहलना की है। यहीं कारण है आज के विज्ञान ने मनुष्यों के दुःख को बढ़ावा ही दिया है और पृथ्वी और पर्यावरण को अत्यंत दूषित कर दिया है। २०% लोग पृथ्वी के ८०% संसाधनों का उपयोग कर रहे हैं जबकि शेष ८०% लोग केवल २०% का उपयोग करते हैं। इसी से आप मनुष्य के सुखों का अंदाज़ा लगा सकते हैं।

देखिये कितना विरोधाभास है --लोग कहते हैं धर्म कहता है अहिंसा परम धर्म है जबकि वास्तव में धर्म कहता है राजाओं की सेना सभा में जो पुरुष हों वे सब दुष्टों को दण्ड , श्रेष्ठों पर शान्त स्वरुप करने वाले हों क्योंकि दुष्टों पर क्रुद्धस्वभावऔर श्रेष्ठों पर सहनशील होना यही राज्य का स्वरूप है। सभी जीवों पर दया और उनका भला मनुष्यों को करना चाहिये अर्थात उन्हें सभी जीवों के प्रति अहिंसक होना चाहिये।

लोग कहते हैं धर्म कहता है अश्वमेध यज्ञ में घोड़े को मारकर उसके अंगों का होम करना चाहिये जबकि वास्तविक धर्म कहता है –जो न्याय से राज्य का पालन करना है, वहीँ क्षत्रियों का अश्वमेध कहाता है।

लोग कहते हैं धर्म ने मनुष्यों को जातियों में विभाजित कर दिया जबकि धर्म वास्तव में मनुष्य को एक जाति और विश्व को एक परिवार कि तरह स्वीकार करता है।

लोग भांग, चरस का नशा करते हैं और कहते हैं हम ऐसे भगवान का ध्यान लगाते हैं जबकि धर्म नशे को पूर्णतयः निषेध करता है।

ऐसे ही कितने अनर्गल आरोप लोग धर्म पर लगाते हैं किन्तु सत्यता कुछ और ही है। इसीलिए कोई भी धर्म अर्थात वैदिक पुस्तक पढ़ने से पहले यह जरूर विचार लें कि लेखक का उद्देश्य, स्तर और उसकी मानसिकता क्या है अन्यथा आप धर्म के नाम पर उल्लू की बीट, कौउए की हड्डी, जानवर की खोपड़ी, मुर्दे का मांस, गन्दी यौनक्रीडाएं इत्यादि अनेक बकवास ही पढेंगे जो वास्तविक धर्म से कोसो दूर ही नहीं अत्यन्त विरोधी है।

रही बात अन्य मतों को मानने वालों के आरोपों की तो उसके लिये उनकी पुस्तकों को ही पढकर समझ सकते हैं कि उनकी मानसिकता ऐसी क्यों है।

इसीलिए धर्म को विज्ञान, राष्ट्र और न्याय इत्यादि सत्य बातों से लड़ाईये नहीं अपितु धर्म से इनको प्रमाणित कीजिये और धर्म और मत, मजहब, रिलीजन इत्यादि में अन्तर समझिये तथा उनका उपयोग उनके अर्थो के अनुरूप ही कीजिये वरना अर्थ का अनर्थ हो जाता है और लोग असत्य को भी धर्म कि संज्ञा देते हैं। ।

9 टिप्‍पणियां:

आचार्य जी ने कहा…

आईये जाने ..... मन ही मंदिर है !

आचार्य जी

nitin tyagi ने कहा…

good post

पापा जी ने कहा…

उदाहरण के तौर पर एक न्यायधीश(Judge) यदि पक्षपातरहित निर्णय लेता है तो वह अपने धर्म का पालन करता है,( यदि पक्षपात्पूर्ण निर्णय लेगा तो क्या वह उसका धर्म नहीं कहलायेगा? पक्षपातरहित या पक्षपातपूर्ण का उसके धर्म से क्या लेना देना ? )

भांग चरस के सेवन तथा अंगूर चावल के सेवन में क्या फ़र्क है जवकि नशा चारों वस्तुओं में हैं ??

धर्म और विज्ञान में बडा कौन है और क्यों है ???

आम के पेड तथा इमली के पेड में बडा कौन है और क्यों है????

सौरभ आत्रेय ने कहा…

@उपरोक्त टिप्पणी
आपकी बुद्धि पर तरस आता है. वैसे तो यह लेख आप जैसे लोगो की संकीर्ण बुद्धि से परे है फिर भी मैं एक बार और दोहरा देता हूँ. धर्म वह है जो सत्य और न्याय है बाकी सब अधर्म है. न्यायधीश पक्षपात निर्णय लेगा तो अधर्म करेगा. उसके निर्णय से धर्म का क्या लेने-देने से आपका तात्पर्य उसके सम्प्रदाय विशेष से है जोकि धर्म नहीं है. न्यायधीश का मत या सम्प्रदाय कुछ भी हो सकता है किन्तु उसका धर्म पक्षपातरहित निर्णय लेना ही है यदि वह ऐसा नहीं करता है तो वह अपने धर्म का पालन नहीं करता है.

लगता है आप निश्चित तौर पर अंगूर और चावल की जगह भांग, चरस आदि का सेवन ही करते होंगे तभी ऐसी निरर्थक और अतार्किक बात कर रहे हैं.

वैसे आपकी टिप्पणी के बेहूदा कुतर्कों से मुझे इतना तो संज्ञान हो गया है आप कौन महानुभव हैं. खैर ईश्वर आपको सतबुद्धि दे.

पापा जी ने कहा…

बुद्धि पर तरस आने से आपका तात्पर्य ?
संकीर्ण बुद्धि से आपका तात्पर्य ??
धर्म वह है जो सत्य और न्याय है बाकी सब अधर्म है ( कसाई का धर्म क्या है??? जल्लाद का धर्म क्या है???? एक अपराधी का धर्म क्या है ?????)
मैं क्या सेवन करता हूं यह प्रश्न नहीं है ?????
निरर्थक और अतार्किक बातें क्या होती है??????
जैसे आप संज्ञान कर रहे हैं ठीक वैसे ही मुझे भी आपके वारे में कुछ संज्ञान हो रहा है अभी मैं गुप्त काल व्यतीत कर रहा हूं समय पूर्ण होने पर आमने सामने तर्क वितर्क करेंगे, आपके विषय में स्पष्ट राय बनाना अभी तर्क संगत नहीं है?
अभी चर्चा जारी रहेगी ?????

सौरभ आत्रेय ने कहा…

@उपरोक्त टिप्पणी
महानुभाव आप कौन सी मिटटी से बने हैं जो आपको सीधी सी बात समझ नहीं आती इसीलिए मैंने कहा था आपकी बुद्धि पर तरस आता है.
सभी मनुष्यों का धर्म है बिना मतलब जीव हत्या न करना और भोजन के लिये भी( भोजन के बारे में डिटेल में जाना मतलब अभी विषय से अलग और लंबा हो जायेगा). इसीलिए कसाई जो कार्य करता है वह धर्मान्तार्गत नहीं आता है वह अधर्म ही है और उसका मत और सम्प्रदाय जैसे मैं पहले ही कह चुका हूँ कुछ भी हो सकता है.

जल्लाद किसी अपराध में मृत्युदण्ड पाए व्यक्ति को फांसी लगता है यह कार्य उसका धर्म है क्योंकि अपराधी को दण्ड देना न्याय के अन्तर्गत ही आता है इसमें शंका वाली बात क्या है.

अपराधी के धर्म से आपका क्या तात्पर्य है -आपके अनुसार अपराध करना उसका परम कर्तव्य है. वो अधर्म का कार्य करता है और उसके कार्यों को धर्म की संज्ञा दे रहे हैं, फिर से तीसरी बार कह देता हूँ कि अपराधी का मत या सम्प्रदाय कुछ भी हो सकता है किन्तु अपराध करके वो कोई धार्मिक कार्य नहीं करता है.

मुझे आपकी इस टिप्पणी से फिर से अन्दाज़ा हो गया है कि आपके बेसिर-पैर की बातों का उत्तर देने से कोई लाभ नहीं है, इसीलिए महानुभाव आप जैसा चाहे समझे आपकी मर्ज़ी.

पापा जी ने कहा…

धर्म अधर्म के मध्य बेसिर-पैर की बातों से आपका क्या तात्पर्य है ?
आप अन्दाजा बहुत लगाते हैं क्या धर्म अन्दाजे पर चलता है??
बुद्धिमान तथा मूर्ख की बुद्धि में क्या फ़र्क है ???
क्या दूसरे को मूर्ख कह कर खुद को बुद्धिमान माना जा सकता है ????
गुप्त काल का समय काट कर फ़िर आता हूं ?????

chandra shekher ने कहा…

lag raha hai papa ji abhi gyan le rahi hi, gyan leker ayege to bat kerege, papa ji sampradiyeek hindu/muslam/sikh/ishaye/ baudh aur na jane kya hai

madansharma ने कहा…

समझ बढ़ाने, विविधता को समझने और बिना संकोच विश्लेषण कर सकने लायक समझ बढ़ाने के लिए जो तथ्य प्रस्तुत किए गए है उन पर नजर डालना उपयुक्त होगा
पापा जी आपकी बुद्धि पर तरस आता है. पढ़कर तो ऐसा लगता है कि जैसे यह किसी दुराग्रही, दंभी और अल्पज्ञ व्यक्ति की करतूत हो। मुझे तो ऐसा भी प्रतीत होता ह वैसे तो यह लेख आप जैसे लोगो की संकीर्ण बुद्धि से परे है
ऐसी निरर्थक और अतार्किक बात क्यों कर रहे हैं.
आजकल के बुद्धिजीवी भी वास्तविक धर्म को जाने बिना धर्म और विज्ञान को आपस में लड़ाते हैं ऐसे ही धर्म और राष्ट्र को , धर्म और न्याय को , धर्म और सत्य को तथा धर्म और ज्ञान को भी लड़ाते हैं। क्योंकि उनको सर्वधर्मसमभाव के अनर्थ का रट्टा घोट-घोट कर पिलाया गया है जिस कारण वो विभिन्न मतों द्वारा फैलाई गयी असत्य बातों को जानते हुए भी उनको धर्म की संज्ञा से ही सुशोभित करते हैं जबकि धर्म विज्ञान को सर्वोच्च मान्यता देता है, राष्ट्र क्या होता है यह बताता है, राष्ट्र-प्रेम और विश्व-प्रेम की शिक्षा देता है, सत्य और न्याय ही धर्म होता है और धर्म से ही मानव ज्ञान प्राप्त करता है।