बुधवार, 9 जून 2010

हिंदू वेदों को इतना अत्यधिक महत्त्व क्यों देते हैं?

(लेख थोड़ा दीर्घ है किन्तु अतिरिक्त समय में पढ़े अवश्य विशेष तौर पर हिन्दू लोग क्योंकि उन्हें अपने धर्म के मूल को तो जानना चाहिये कम से कम.)

हिंदू धर्म में वेदों का स्थान सबसे महत्वपूर्ण है. सभी हिंदू धार्मिक ग्रन्थ अपनी बातों को प्रमाणित करने के लिये शब्द प्रमाण के अन्तर्गत वेदों को सर्वोपरि स्थान देते हैं. किन्तु आज अधिकतर लोगो का मानना है कि इन वेदों को किसी पूर्वकाल में मनुष्यों ने समयानुसार अपने ज्ञान के अनुरूप लिखा था जिनमें कुछ बात सही हैं और कुछ गलत. कुछ हिंदू लोग मानते हैं वेद ईश्वरकृत ज्ञान है. अब इनमें ऐसा क्या लिखा है जो कुछ लोग गलत और कुछ लोग इनको सम्पूर्ण सत्य मानते हैं. यहाँ मैं इस लेख में केवल यह ही कहना चाहूँगा कि जो लोग इनमें असत्य या गलत बातों का आरोप लगाते हैं वे इस बात का आत्म-मंथन अवश्य करें कि वेद-भाष्य करने वाला या वेदों पर पुस्तक लिखने वाला किस स्तर, मानसिकता और कितना ज्ञान रखता है क्योंकि वेदों में भी और सभी प्रामाणिक वैदिक ग्रन्थों में वेद भाष्य का अधिकार केवल ध्यान अवस्था की उच्चतम अवस्था सबीज या निर्बीज समाधि तक पहुँचने वाले इंसान को ही दिया है. आजकल की संस्कृत या अन्य विषयों की डीग्री या थोड़ा बहुत शाब्दिक ज्ञान रखने वालों का वेद-भाष्य विद्वानों के मध्य मान्य नहीं होता है. एक तो ये डिग्रीयां वैदिक संस्कृत की ही नहीं हैं और यदि उसको वैदिक संस्कृत आती भी है तब भी जब तक वह योग, सांख्य दर्शन आदि के अनुरूप जितेन्द्रिय होकर अष्टांग योग का पालन नहीं करता है उसकी व्याख्या मान्य नहीं है. इसका एक सीधा सा कारण है वेदों में तत्वों के यथार्थ रूप, सृष्टि-सृजन, आत्मा-परमात्मा, जीवन-मौत जैसे अत्यन्त गूढ़ विषयों के साथ-२ मानव जीवन के लिये आवश्यक समस्त विज्ञान, गणित, संख्या आदि के मूल और सामाजिक, राजकीय इत्यादि सभी विषयों के ज्ञान का वर्णन हैं. मंत्रो के वास्तविक अर्थ और व्याख्या को समझाने वाला यदि कोई साधारण पुरुष होगा तो निश्चित तौर पर अर्थ का अनर्थ कर देगा. और यही कारण है आज वेदों को साधारण पुस्तक समझने की भूल का. उदाहरण के तौर पर आधुनिक युग में आइंस्टीन की रिलेटिविटी थियोरी को यदि कम बुद्धि वाला व्यक्ति और भौतिक शास्त्र को न जाने वाला व्यक्ति व्याखित करे तो वो उसको क्या समझेगा या क्या समझायेगा.

वेदों से मेरा तात्पर्य स्याही, कलम द्वारा लिखित पुस्तक से नहीं है मेरा तात्पर्य केवल उस ज्ञान से है जो वेद नाम से जाना जाता है. मैं फिलहाल वेदों में क्या लिखा और क्या नहीं लिखा है उस पर विचार न करते हुए यहाँ केवल इस बात पर विचार कर रहा हूँ कि वेद ईश्वरीय ज्ञान क्यों कहलाते हैं. क्योंकि बहुत लोगो का ये मानना है कि वेदों में उच्च स्तर का तो ज्ञान है किन्तु ये हैं ऋषियों या बुद्धिमान मानव द्वारा निर्मित ही हैं . इनके ईश्वर द्वारा कृत होने में क्या लाभ या तर्क है.

यहाँ एक नए द्रष्टिकोण से विचार किया गया है. यहाँ विषयानुरूप इस लेख में न कोई वेद प्रमाण दिया गया है न किसी अन्य शास्त्र का और न किसी ऋषि की उक्ति का निर्देश है, फिर भी पाठक को इसमें कुछ प्रेरणाप्रद तत्व अवश्य मिलेंगे.

मनुष्य को पूर्णरूप से जाने बगैर कोई विचार ठीक-ठीक समझ नहीं आता और न आ सकता है, क्योंकि यह मनुष्य ही तो है जो विचारशील है. तो प्रथम ‘मनुष्य क्या है’ यह जानना आवाश्यक है.

देखने से यह प्रतीत होता है कि शरीर और एक शक्ति के सम्बन्ध से जो वस्तु या व्यक्ति बनता है, वह मनुष्य कहाता है. इस समय हमें सिर्फ उसी शरीर और शक्ति पर ध्यान देना है जो मनुष्य को उत्पन्न करता है, और अन्य प्राणियों का यहाँ वृतान्त नहीं है.

मनुष्य पैदा होता है और उसी समय एक ध्वनि करता है. वह माता के स्तन से दूध पीने लगता है. वह मलमूत्र करता है ; और भी क्रियायें करता देखा जाता है. ये सब क्रियायें उसको किसी ने नहीं बताई हैं, यानि उसमें स्वाभाविक हैं. इस तरह ज्यों-ज्यों वह बढ़ता जाता है और उसमें बहुत से लक्षण पाए जाते हैं, उन्ही में ज्ञान भी है. इसी कारण बहुत से विद्वानों ने या ऋषियों ने , या योगियों ने कहा है और गौर करने पर अब भी प्रतीत होता है कि मनुष्य में ६ लक्षण हैं , वे हैं –सुख ,दुःख ,राग द्वेष ,ज्ञान , प्रयत्न.

यहाँ हमें ज्ञान को समझना है कि उसको कोई देता है या उसका , यानि मनुष्य का स्वभाविक गुण है. मनुष्य सृष्टि का एक अंग है और सृष्टि हमेशा होती आई है, यानि सृष्टि का होना अनिवार्य है है, यानि अनादी है.

मनुष्य जो अपनी इन्द्रियों से ज्ञान प्राप्त करता है, इसी कारण मनुष्य में ज्ञान-इन्द्रियां कहीं जाति हैं. परन्तु एक और मन या अन्तःकरण , जिसका नाम बुद्धि है भी मनुष्य में है. इनकी सबकी सहायता से मनुष्य अपने लिये जो उसे लाभदायक प्रतीत होता है, कार्यप्रणाली बना लेता है, अर्थात ज्ञान वह है जिससे वह बाह्य पदार्थ से अपने को लाभ पहुँचाने की रीती निकालता है और अपने विचार बनाता है .

अब जब हम यह देखते हैं कि मनुष्य में ज्ञान स्वाभाविक है और उसमें प्रयत्न भी है जिससे ज्ञान बढ़ सकता है , तो किसी अन्य प्रकार से ज्ञान ग्रहण करके अपने विचार बनाने की क्या आवश्यकता है ? अर्थात मनुष्य को ज्ञान देने का क्या अवसर है ? अर्थात यह मानना कि ईश्वर ने मनुष्य को आदिसृष्टि में ज्ञान दिया , किसी तर्क से ठीक प्रतीत नहीं होता?

इस बात को मानने से कि वेद ईश्वरकृत ज्ञान है, मनुष्यमात्र विशेषकर हिंदुओं की बड़ी हानि हुयी है और हो रही है, जिस भ्रान्ति को मिटाना मनुष्य का कर्तव्य है.

आजकल सभी का अनुभव यह है कि हर-एक जो जिस मत का अनुयायी है , अपने मत को सबसे अच्छा मानता है और अन्य प्रकार के विचारवालों की बातें सुनना या उनपर विचार करना भी अपनी बे-इज्जती समझता है; परन्तु प्रायः हिंदू धर्म के विद्वानों या आर्यों को यह कहते सुना जाता है कि हम तो केवल जो बात बुद्धि के अनुकूल होती है अर्थात तार्किक विद्वता पूर्ण होती वही मानते हैं.

आधुनिक समाज में यह भी विचार है कि यदि मनुष्य या कोई विद्वान मनुष्य की परिभाषा कर ले और ज्ञान की भी, तो उसका फल यही हो सकता है कि वेद मनुष्यों के विचारों की पुस्तक है , न कि परमात्मा का दिया हुआ ज्ञान है. मनुष्यों को जो वेदों के काल में अपनी आवश्यकता के अनुसार कुछ विचार उत्पन्न हुए, वे लिख दिए या बना लिये. मनुष्यों को जिससे लाभ होता है वह उसकी पूजा करता है, परन्तु ईश्वर से न तो कोई लाभ होता है और न हो सकता है. यह तो माना जा सकता है कि कोई ऐसी वस्तु अवश्य होनी चाहिये. ऐसा मानने में कोई बुद्धि का काम नहीं है.परन्तु बुद्धि स्वाभाविक है और मनुष्य अनादि है, क्योंकि मनुष्य न हो तो सृष्टि का विचार कौन कर सकता है ? और बगैर मनुष्यों के सृष्टि ही नहीं, क्योंकि सृष्टि अनादि है; या सृष्टिक्रम अनादि है तो ईश्वर को सृष्टि बनाने या न बनाने में कोई अधिकार ही नहीं, तो मनुष्य जो सृष्टि का अंग है, जैसा और जहाँ तक उसका मस्तिष्क जिस काल में ले जाता है वही विचार बना लेता है, इस कारण वेद ईश्वरकृत नहीं हो सकते.

उपरोक्त विचार किसी भी विचारवान व्यक्ति के दिमाग में आ सकते हैं इसमें कोई शंका नहीं है. अब यहाँ से इन शंकाओं के निवारण पर विचार करते हैं.

शंका- वेद ईश्वर का दिया ज्ञान है, इस बात को समझने के लिये यह जानना आवश्यक है कि यह ज्ञान किसके लिये दिया गया है?

निवारण- यह ज्ञान समस्त मनुष्यमात्र के लिये दिया गया है. सब मनुष्य इसके अधिकारी हैं. मनुष्य से अतिरिक्त अन्य प्राणियों के लिये यह ज्ञान नहीं है.

शंका- यह ज्ञान कब दिया गया ?

निवारण- इस विषय के जानकारों का कहना है कि सृष्टि-रचना होने के अनंतर जब जब सर्वप्रथम मानव का प्रादुर्भाव हुआ, उसी समय विशिष्ट मानवों के मस्तिष्क में किसी दिव्य आलौकिक शक्ति के द्वारा उस ज्ञान ज्ञान का उद्भावन किया गया.

शंका- यदि यह मनुष्यमात्र के लिये दिया गया, तो पहले यह जानना होगा मनुष्य क्या है ? और उसके लिये ज्ञान की आवश्यकता भी है या नहीं.

निवारण- आपका कहना उचित है, पर इस विषय में आपका अपना विचार क्या है ?

शंका- हमारे विचार में तो देखने से यह प्रतीत होता है कि शरीर और एक शक्ति के सम्बन्ध से जो वस्तु या व्यक्ति बनता है , वह मनुष्य कहाता है. इस समय हमें सिर्फ उसी शरीर और शक्ति पर ध्यान देना है, जो मनुष्य को उत्पन्न करता है. और प्राणियों का यह वृतान्त नहीं.

निवारण- यह पहले ही कहा गया है कि वेदज्ञान मनुष्यमात्र के लिये है, अन्य प्राणियों के लिये नहीं. मनुष्य कहे जाने वाले देह के साथ जब एक शक्ति का सम्बन्ध होता है, वह मनुष्य है, यही आपका मनुष्य से अभिप्रायः है तो इसे ईश्वर द्वारा सृष्टि के आदि में ज्ञान दिए जाने के लिये आप क्या कहते हैं.

शंका- हमारा कहना है कि मनुष्य जब पैदा होता है उसी समय एक ध्वनि करता है, वह माता के स्तन से दूध पीने लगता है, वह मल-मूत्र करता है, और भी क्रियाएँ करता देखा जाता है. ये सब क्रियायें उसको किसी ने नहीं बाताई हैं, अर्थात उसमें स्वाभाविक हैं. इस तरह ज्यों-ज्यों वह बढ़ता जाता है, उसमें और बहुत से लक्षण पायें जाते हैं, उन्हीं में ज्ञान भी है. इसी करण ऋषियों ने कहा है और गौर करने पर अब भी प्रतीत होता है मनुष्य में छः लक्षण हैं – सुख, दुःख, राग, द्वेष, ज्ञान, प्रयत्न.

निवारण- आपके कहने का तात्पर्य यह प्रतीत होता है कि इस मनष्य-देह के साथ जिस शक्ति का सम्बन्ध आपने बतलाया है , वह शक्ति वही है, जिसको ऋषियों ने जीवात्मा कहा है. ज्ञान, प्रयत्न आदि लक्षण उसी के बताये गए हैं. फलतः एक विशेष प्रकार के देह के साथ जीवात्मा का सम्बन्ध होना मनुष्य का स्वरूप है. जब बालक के रूप में यह प्रादुर्भूत होता है , उस समय की इसकी क्रियाओं और चेष्टाओं को आपने स्वाभाविक कहा है , क्योंकि उसे यह सब किसी ने बताया नहीं है.

यहाँ यह ध्यान रखना चाहिये कि ऐसी क्रियायें सभी प्राणियों में समान रूप से होती हैं. मनुष्य की यह कोई विशेषता नहीं है. आपने इन्हें स्वाभाविक इसलिए कहा कि इस देह का प्रादुर्भाव होने पर उसे यह किसी ने सिखाया नहीं. जिन ऋषियों जीवात्मा के अस्तित्व , उसके स्वरुप का निर्णय कर उसे समझाया है. उनका कहना है कि नवजात बालक की ये क्रियायें पूर्वजन्म के संस्कार के करण होती हैं, जो प्राणी मात्र के लिये साधारण हैं. इन क्रियायों से मनुष्य की कोई विशेषता प्रकट नहीं होती. आहार, निद्रा, भय, आदि सम्बन्धी सब क्रियाएँ प्राणियों में पूर्व-संस्कारवश नवजात बालक में हुआ करती हैं, इन्हें किसी से सीखने की आवश्यकता नहीं होती. आप इन्हें स्वाभाविक बताकर ईश्वरीय ज्ञान के विषय में क्या कहना चाहते हैं?

शंका- यहाँ हमें ‘ज्ञान’ को समझना है कि यह मनुष्य को कोई देता है, या उसका स्वाभाविक गुण है. मनुष्य सृष्टि का एक अंग है और सृष्टि अनादि है. मनुष्य पांच ज्ञानेन्द्रियों से ज्ञान प्राप्त करता है. एक अन्तःकरण, मन या बुद्धि है. इन सबकी सहायता से मनुष्य अपने लिये जो उसे लाभदायक प्रतीत होता है कार्यप्रणाली बना लेता है, यानि ज्ञान वह है जिससे मनुष्य बाह्य पदार्थ से अपने को लाभ पंहुचाने की रीति निकलता है और अपने विचार बनाता है.

हम यह देखते हैं कि मनुष्य में ज्ञान स्वाभाविक है और उसमें प्रयत्न भी है जिससे ज्ञान बढ़ सकता है , तो किसी अन्य प्रकार से ज्ञान ग्रहण करके अपने विचार बनाने की क्या आवश्यकता है ? अर्थात मनुष्य को ज्ञान देने का क्या अवसर है ? अर्थात यह मानना कि ईश्वर ने मनुष्य को आदिसृष्टि में ज्ञान दिया , किसी तर्क से ठीक प्रतीत नहीं होता.

निवारण- ज्ञान जीवात्मा की एक विशेषता है या उसका स्वरुप, ऐसी हालत में हम कह सकते हैं यह उसका स्वाभाविक रूप है. पर जीवात्मा स्वभावतः अल्पज्ञान और अल्पशक्ति होता है; यद्यपि प्रयत्न उसमें हैं, पर केवल अपने प्रयत्न से अपने ज्ञान विषय को बढ़ा नहीं सकता. उसे इस कार्य के लिये बहार के सहयोग की सदा अपेक्षा रहती है. आदिसृष्टि के विषय में विचार को एक ओर रखिये, वर्त्तमान सृष्टि में भी कोई बालक स्वतः ज्ञान-वृद्धि नहीं कर सकता है. उसके लिये माता, पिता, आचार्य, गुरु एवं अन्य प्रकार के अनुभवी व्यक्तियों की अपेक्षा रहती है. उपदेश द्वारा ज्ञान बढ़ाने की यह परम्परा आदिसृष्टि से चली आ रही है. इस बात की एक से अधिक बार परीक्षा की गयी है कि एक नवजात बालक को बिना उसके साथ बोले और उसको कुछ सिखाये बिना अलग एकान्त में रखा गया. उसको आहार आदि का पूरा प्रबंध रखा गया . उसकी ऐसी उम्र तक यह अवस्था रखी गयी जैसी उम्र तक माता,पिता ,गुरु आदि या अन्य पारिवारिक जनों के सहयोग से सीखने वाला बालक संसार के सभी साधारण व्यवहारों को प्रायः सीख लेता है और भाषा आदि के द्वारा अपने सब भावों को प्रकट कर सकता है. एकान्त में रखा बालक यह सब-कुछ नहीं जान सका . शरीर से सब प्रकार पुष्ट होने पर भी वह स्वतः ज्ञानवृद्धि करना तो दूर, अपने आवश्यक उचित आहार आदि को भी समझ लेने में असमर्थ रहता है.

जैसा स्वाभाविक ज्ञान मनुष्य में है, वैसा प्रत्येक प्राणी में रहता है , पर मनुष्य देह की बनावट में ऐसी विशेषताएं हैं, और देह में ऐसी कुछ ग्रंथिया और अवयव हैं कि उनके अपने उचित कार्य करते रहने पर ज्ञान-वृद्धि में अतंत सहयोग प्राप्त होता है पर यह उसी अवस्था में सम्भव है जब बाह्य उपदेश या शिक्षा आदि का उचित सहयोग हो. यह उपदेश या शिक्षा की परम्परा जब से मनुष्य ने सर्गआदिकाल में आँखें खोली हैं तभी से चली आ रही है. वर्तमान काल में माता-पिता, गुरु आदि उपदेश द्वारा बालक को शिक्षित करते हैं; बालक के माता, पिता आदि ने अपने बड़ों से उपदेश प्राप्त किया, उन्होंने अपने पूर्वजों से. इस प्रकार यह उपदेश परम्परा आदिसृष्टि तक पंहुचती है. प्रश्न यह है कि जो सर्वप्रथम मानव हुए , उनको ऐसा उपदेश किसने दिया? माता, पिता आदि उनके पूर्वज कोई न थे. इस बात को निश्चित रूप से जाना जा चुका है कि जीवात्मा को अतिरिक्त ज्ञान-ग्रहण का सामर्थ्य होने पर भी, बिना अन्य सहयोग के स्वतः ज्ञान वृद्धि में वह असमर्थ रहता है. एक सशक्त मनुष्य को गहरे पानी में छोड़ने पर वह तत्काल तैरने नहीं लगेगा, डूब ही जायेगा. पर प्रायः समस्त पशु एवं अनेक पक्षी स्वभावतः जल में छोड़े जाने पर तैर जाते हैं, उन्हें यह सिखाया किसी ने नहीं. मनुष्य एक ऐसा अपाहज प्राणी है, जो बिना सिखाए ऐसे कार्यों में अक्षम रहता है ; सिखाए जाने पर उल्टा, सीधा, तिरछा सब तरह तैर सकता है, तथा जल पर तैरने, अंदर डुबकी लगाने एवं आकाश में उड़ने आदि के अनेक साधनों का निर्माण कर सकता है जबकि अन्य प्राणियों में ऐसी कोई सम्भावना नहीं. मनुष्य की यह यह विशेषता इसकी विशेष शरीर रचना पर आधारित है जैसा कि अभी हम पहले ही कह चुकें हैं. आदिकाल में कोई लौकिक शिक्षक सम्भव न होने से, मानव की उक्त स्तिथि इस बात को प्रमाणित करती है कि उसे किसी अलौकिक पद्वति से वह ज्ञान प्राप्त होता है. जिसपर उसके आगे के समस्त व्यवहार आधारित हैं. यही एक अवसर है जब मनुष्य को उस रीति पर ज्ञान का उपदेश किया जाता है, जो अनंतर काल में साधारण रूप से अनपेक्षित है. जिस रीति पर आदिमानव को ज्ञान वृद्धि का साधन प्राप्त हुआ, उसी का नाम साक्षत्धर्मा व्यक्तियों ने ईश्वर प्रेरणा से ज्ञान प्राप्ति बताया है, उस ज्ञान साधन का मानव सदा लाभ उठा सकता है. वही साधन वेद हैं, जो सृष्टि के आदि समय से लेकर आज तक मानव द्वारा सुरक्षित हैं.

शंका- मेरा विचार है कि यदि मनुष्य या कोई विद्वान मनुष्य की परिभाषा कर ले और ज्ञान की भी, तो उसका फल यही हो सकता है कि वेद मनुष्यों के विचारों की पुस्तक है , न कि परमात्मा का दिया हुआ ज्ञान है. मनुष्यों को जो वेदों के काल में अपनी आवश्यकता के अनुसार कुछ विचार उत्पन्न हुए, वे लिख दिए या बना लिये. मनुष्यों को जिससे लाभ होता है वह उसकी पूजा करता है, परन्तु ईश्वर से न तो कोई लाभ होता है और न हो सकता है. यह तो माना जा सकता है कि कोई ऐसी वस्तु अवश्य होनी चाहिये. ऐसा मानने में कोई बुद्धि का काम नहीं है.

निवारण- मनुष्य और ज्ञान के विषय में अभी ऊपर थोड़ा उपयुक्त विचार प्रस्तुत किया गया है. उतना विचार इस समय हमारी विवेचना के लिये पर्याप्त है और आपकी उसमें सहमति है. मनुष्य और ज्ञान की स्तिथि ऐसी है कि उसमें अन्य सहयोग के बिना किसी तरह के परिवर्तन या वृद्धि आदि की सम्भावना नहीं देखी जाती. ऐसी अवस्था में आपने जो उसका परिणाम निकाला कि वेद मनुष्य के विचारों की पुस्तक है, यह वास्तविकता से सर्वथा विपरीत है. मनुष्य स्वतः बिना किसी अन्य सहयोग के अपने विचारों को इतना महान एवं विस्तृत जानकारी तक पंहुचा सकता है, यही बात तो समझनी है. हमारे सामने जो हालात हैं, उनसे गहरा विचार करने पर हम इसी नतीजे पर पंहुचते हैं कि मानव सहयोग के बिना स्वतः उस स्तिथि को प्राप्त नहीं कर सकता. ऐसा मालूम होता है कि जब मानव अपने व अन्य सहयोगियों के महान प्रयत्न के फलस्वरूप उस अवस्था में पंहुचता है कि वह ऐसी समस्याओं पर विचार कर सके, तब स्वभावतः वह अपनी उन पहली अवस्थाओं को भुला देता है, जब उसने तोतली अटपटी ध्वनियों के साथ एक विशिष्ट सामाजिक वातावरण में रहकर बोलना और अपना सुकोमल हाथ दूसरे के हाथ में देकर कलम पकड़ना सीखा था.वह स्तिथि केवल स्वभाविक ज्ञान द्वारा प्राप्त नहीं होती. यदि कोई विचारशील व्यक्ति आंकें खोल कर मानव समाज की; या अपनी पिछली यात्रा का सिंहावलोकन करे , तो वह इस नतीजे पर पंहुच सकता है कि जहाँ से मानव ने अपनी जीवनयात्रा प्रारम्भ की; वह अवस्था कैसी रही होगी – जीवन का प्रारम्भ किन दशाओं में सम्भव रहा होगा. इससे अच्छा और अधिक निर्दोष कोई अन्य मार्ग नहीं दिखाई देता कि आदिमानव को आलौकिक शक्ति द्वारा वह ज्ञान-साधन अवश्य प्राप्त हुआ, जिसके आधार पर वह अपने जीवन व्यवहार को चलने में समर्थ हो सका.

यह बात कह देने में बड़ी सरल है कि वेद काल में अपनी आवश्यकता-अनुसार जो विचार मनुष्य को उत्पन्न हुए , वे उसने लिख लिये या बना लिये , उन्हीं का नाम वेद है. वेद जिस रूप में हमारे सामने हैं , और उनमें जो कुछ है , वह सब इतना असाधारण है कि उस अवस्था तक पंहुचने के लिये मनुष्यों ने विस्तृत जगत का कितना सूक्ष्म ज्ञान प्राप्त कर लिया होगा, इन्द्रियों के सर्वथा अगोचर विषयों को भी कितनी गहराई व सच्चाई के साथ जान लिया होगा , आज इसकी केवल कल्पना कर सकते हैं ; पर मूल प्रश्न यही है कि यदि कुछ सच्चाई इसी विचार में है, तो यह समस्या मुंह फाड़कर सामने आती है कि वह मानव , जिसके विचार वेद हैं –जानकारी की इतनी ऊँचीं अवस्था तक कैसे पहुँचा होगा? जबकि मानव स्वभावतः इतना अपाहज है कि बिना अन्य सहयोग के स्वतः कुछ नहीं सीख सकता.

इसके समाधान के लिये आधुनिक युग में एक ही मार्ग सुझाया गया है जो भारतीय परम्परा की इस विषय की प्रक्रियाओं की अपेक्षा करता है वह मार्ग है विकासवाद. आदिसर्ग की स्तिथि को हममें से किसी ने नहीं देखा है; जिन्होंने देखा वो आज नहीं ; हमारे–उनके सम्पर्क का कोई आधार नहीं. उसको किसी रूप में जानने या अंदाज़ा करने के लिये हमारे सामने यह प्राक्रतिक जगद्रूप पुस्तक है. इसको यदि कोई पढ़ सके , तो सम्भव है सच्चाई के समीप पहुंचने का मार्ग मिल जाये. प्राचीनकाल में साक्षातधर्मा ऋषियों ने इसे पढ़ा. उन्होंने जो परिणाम इसके प्रस्तुत किये , वे भारतीय संस्कृति व वैदिक साहित्य के रूप में कुछ सीमा तक सुरक्षित हैं. आधुनिक काल में कुछ समय से कुछ लोग इसके अध्यन का प्रशंसनीय प्रयास कर रहे हैं. अनेक जानकारियां भी सामने आ रही हैं. यह भी अपने ढंग का एक अनुपम प्रयास है , इसका अंतिम परिणाम क्या होगा, इसकी अभी प्रतीक्षा करनी होगी.सम्भव है कुछ अगली पीढियांइसे देख-समझ सकें. इसी दिशा में प्रकृति की परतों को उलटकर मानव समाज की यात्रा का जो स्वरुप किया गया है वही विकासवाद है; पर मूलतः यह एक अपसिद्धांत है.कारण यह कि संसार की ज्ञात परिस्तिथि के साथ यह मेल नहीं खाता. मूल प्रश्न यह है कि मानव का स्वतः विकास कैसे होता है? इसका उदाहरण कोई संसार में नहीं मिलता, जबकि इसके विपरीत सारा संसार प्रत्यक्ष उदाहरण है. इसीलिए संसार का ज्ञात या अज्ञात इतिहास कोई इस कल्पना की पुष्टि नहीं करता. जिन पर्त्तों को खोलकर तथाकथित उनके अध्यन से इस कल्पना का उदभावन किया गया है, वे पर्त्तें गहरे संदेशों से भरी हैं.

मानव –मस्तिष्क तथा मानव-देह की अन्य अनेक ग्रंथियों की ऐसी बनावट है जिससे ज्ञानवृद्धि के अत्यन्त साधन रूप में विशिष्ट सहयोग प्राप्त होता है, पर इसका बनाना मानव के हाथ में नहीं है. अपनी इच्छानुसार पूर्ण स्वस्थ मस्तिष्कयुक्त एवं सक्रिय ग्रंथियों से युक्त मानव-देह का निर्माण मानव द्वारा होना सम्भव नहीं, अन्यथा प्रत्येक व्यक्ति उन्नतमस्तिष्क बालक को पैदा कर सकता है. कौन ऐसा पिता हो सकता है, जो अपने पुत्र को सर्वश्रेष्ठ न होना चाहे? यह कितना आश्चर्य है कि इतना अक्षम होता हुआ भी मानव यह समझता है कि उसने स्वतः सब-कुछ अर्जित कर लिया है, उसे कभी किसी से कुछ सीखने की आवश्यकता नहीं हुई !

मनुष्य के लाभ का प्रश्न भी विचारणीय है . लाभालाभ आदि आपेक्षिक भाव हैं, इनकी कोई नियत सीमा नहीं. पर समाज की उच्च स्तिथि में मानव के लिये यह विचार महत्त्व रखता है, इसमें अभ्युदय की श्रेणियाँ छिपी रहती हैं. सवाल यह कि मनुष्य के लाभ में ईश्वर के सहयोग की अपेक्षा है भी कि नहीं. मनुष्य अपने विचार तथा ऐश्वर्यों के लिये प्रयत्न करने पर जिन उपलब्धियों में सफल होता है उसे लाभ कहता है. यह ठीक है पर इन सब प्रकार की ऐहिक उपलब्धियों का जो मूल आधार है, ऐसी ऐश्वरी रचना की ओर से मानव अपनी आँखें मूँद लेता है.

आप मानते हैं संसार या संसार का क्रम अनादि है, संसार बनता व बिगड़ता रहता है, इसे प्रत्येक वैज्ञानिक समझता है. इसका बनाना या बिगाड़ना मनुष्य की शक्ति से बाहर है. जो शक्ति इसे बनाती या बिगाड़ती है, उसी का नाम ईश्वर है. ईश्वर वैसे ही मान नहीं लिया गया है . उसका अस्तित्व आवश्यक, प्रामाणिक है, अनुपेक्षणीय है. मनुष्य के सब प्रकार के ऐहिक-पारलौकिक लाभ जगाद्रचना पर अवलम्बित है. मानव –देह में बैठा देह का अधिष्ठाता[आत्मा] जो इस तर्कणा की उद्भावना किया करता है, वह सृष्टि-रचना के अनन्तर ही इस अवस्था में आ पता है. संसार की यह रचना ईश्वराधीन है., इससे मनुष्य सब प्रकार के लाभ प्राप्त किया करता है. तब क्या यह नहीं माना जा सकता कि ईश्वर द्वारा ही मनुष्य को यह लाभ हुआ है. ठीक मस्तिष्क वाले ने इस सच्चाई को समझा है , इसीलिए वह आपके शब्दों में ईश्वर की पूजा करता है, करता आया है और आगे सदा करता रहेगा.

शंका- विचार यह है कि मनुष्य अनादि है, उसकी बुद्धि या ज्ञान स्वाभाविक है , क्योंकि मनुष्य न हो तो सृष्टि का विचार कौन कर सकता है ? और बगैर मनुष्यों के सृष्टि ही नहीं, क्योंकि सृष्टि अनादि है; या सृष्टिक्रम अनादि है तो ईश्वर को सृष्टि बनाने या न बनाने में कोई अधिकार ही नहीं, तो मनुष्य जो सृष्टि का अंग है, जैसा और जहाँ तक उसका मस्तिष्क जिस काल में ले जाता है वही विचार बना लेता है, इस कारण वेद ईश्वरकृत नहीं हो सकते.

निवारण- मनुष्य की परिभाषा आपकी अनुमति से जो पूर्व-निर्दिष्ट की गयी है, उसके अनुसार उस रूप में मनुष्य को अनादि नहीं कहना चाहिये. जब एक विशेष प्रकार के देह के साथ शक्ति(आत्मा) का सम्बन्ध होता है, उसे मनुष्य कहा जाता है. इस मनुष्य –परिभाषा में देह भी आ जाता है; पर कोई देह अनादि सम्भव नहीं है. देह को बनते-बिगड़ते हम अपने सामने देखते हैं, इसीलिए मनुष्य को अनादि न कहकर इसके क्रम को अनादि कहना चाहिये. मनुष्य का क्रम अर्थात सिलसिला अनादि है, मनुष्य अनादि काल से इसी प्रकार होता आया है , यही अभिप्राय आपका मनुष्य को अनादि कहने का हो सकता है. इसमें शक्ति(आत्मा) अनादि है, देह बनते –बिगड़ते रहते हैं. ज्ञान के स्वाभाविक होने की जो बात है, उसका विवेचन पहले ही किया जा चुका है.

‘मनुष्य न हो तो सृष्टि का विचार कौन कर सकता है ? बगैर मनुष्य के सृष्टि नहीं ‘ यह कहना ठीक नहीं है. सभी वैज्ञानिक , प्राचीन और नवीन , इस बात को जानते और मानते हैं कि मनुष्य के प्रादुर्भाव से बहुत पूर्व सृष्टि की पूर्ण रचना हो चुकी होती है. सृष्टि रचना के पर्याप्त अनन्तर मानव का प्रादुर्भाव होता है. तब यह कहना कहाँ तक ठीक है कि बगैर मनुष्य के सृष्टि ही नहीं ? इसके विपरीत कहना यह चाहिये कि सृष्टि के बिना मानव का प्रादुर्भाव सम्भव नहीं. सृष्टि का विचार पीछे की बात है; जब वह अपने अस्तित्व में आ चुकी है, तो उसका विचार होना या न होना कोई विशेष महत्त्व नहीं रखता. सृष्टिक्रम को अनादि मानने का तात्पर्य यही है कि सृष्टि अनादि काल से चली आ रही है . जब इसका बनना –बिगड़ना माना जाता है, तब उसके बनाने-बिगाड़ने वाले से नकार नहीं किया जा सकता. निश्चित है कि मनुष्य इसके लिये सर्वथा असमर्थ है, साथ ही मनुष्य के प्रादुर्भाव से बहुत पूर्व सृष्टि-रचना हो चुकी होती है. इसकी जो रचना करता है, वही ईश्वर है. फिर सृष्टि के बनाने में ईश्वर का कोई अधिकार नहीं , यह कैसे कहा जा सकता है ?

मनुष्य सृष्टि का अंग है, यह कथन इस बात को स्पष्ट करता है कि सृष्टि-रचना पर मनुष्य का कोई अधिकार नहीं है. मनुष्य का एक भाग देह सृष्टि-रचना हो जाने पर अस्तित्व में आ सकता है, अन्यथा नहीं. आत्मा, जो शक्ति देह के अंदर बैठकर समस्त दैहिक क्रियाकलाप को प्रेरित करती है, उसका सब लौकिक व्यवहार इस स्थूल देह पर आश्रित रहता है. देह के सम्पूर्ण अंग-प्रत्यंग आत्मा-सम्बन्धी किसी भी व्यवहार के लिये उपयोगी होते हैं. देह के उन अंगों –प्रत्यंगों की क्रिया एवं प्रतिक्रिया के विषय में उसी देह के अधिष्ठाता आत्मा को कुछ भी जानकारी नहीं होती. परन्तु वे सब क्रिया एवं प्रतिक्रिया किसी नियम, किसी व्यवस्था के अनुसार अपना कार्य बराबर किया करती हैं. यदि गम्भीरता से देह की इस आन्तरिक प्रक्रिया पर विचार किया जाए, तो इस परिणाम पर पहुँचने में कोई बाधा नहीं होगी कि देह के अधिष्ठाता आत्मा का इन प्रक्रियाओं पर न कोई नियन्त्रण है और न उनकी इसे जानकारी है. उस प्रक्रिया में कभी व्यतिक्रम होने लगता है , तो अधिष्ठाता आत्मा को अपनी बेचैनी और मजबूरी का अहसास अच्छी तरह हो जाता है. स्पष्ट है कि देह की इस आन्तर व्यवस्था का व्यवस्थापक-आत्मा से अन्य कोई तत्व होना चाहिये. यह स्तिथि हमारे सम्मुख इस रहस्य को खोल देती है कि ‘ मनुष्य का मस्तिष्क जिस काल में उसे जहाँ ले जाता है, वही विचार बना लेता है.’ इस कथन में कितना बल है.

इस बात को पहले स्पष्ट कर दिया गया है कि मनुष्य चाहे जिस काल में हो, अन्य के सहयोग के बिना ज्ञानवृद्धि में सर्वथा अक्षम रहता है. इसीलिए ऐसे समय में जब उसके लिये लौकिक उपदेष्टाओं की उपलब्धि सम्भव है , आलौकिक उपदेष्टा के द्वारा उसके लिये ज्ञानवृद्धि के साधनों का उपलब्ध कराना अत्यन्त आवश्यक एवं स्वाभाविक है. इसमें गडबड होना मनुष्य की सांसारिक यात्रा को उत्पथ बना देना है. फलतः सर्गादीकाल में ईश्वर द्वारा मनुष्य के लिये सन्मार्ग प्रदर्शित करने का विचार अबुद्धिमत्तापूर्ण नहीं है. ऐसे ही आधारों पर कहा गया है कि वेद ईश्वरीय ज्ञान है, यह उसी की देन है.

ऐसे विषय इन्द्रियागोचर हैं. सप्रमाण कल्पनाओं एवं ऊहाओं के आधार पर विवेचना प्रस्तुत की जा सकती है. भावुकता को छोड़कर केवल सत्यान्वेषण की भावना से इन विषयों पर मनन किया जाये तो सच्चाई तक पहुँचने की सम्भावना रहती है. पाठकगणों से मेरा हार्दिक निवेदन है कि वे स्वयं इन विषयों पर सलंग्नता से मनन करेंगे , तो उन्हें अवश्य सत्य का प्रकाश मिलेगा.

(ये लेख आचार्य उदयवीर शास्त्री द्वारा लिखे गए एक निबंध, पत्राचार के आधार पर है)

16 टिप्‍पणियां:

Gourav Agrawal ने कहा…

उत्तम अति उत्तम......
इस लेख के लिए धन्यवाद.....
मैं जानता हूँ ये शब्द बहुत कम हैं आपके प्रयास हेतु पर अभी तो इन्ही से काम चला लीजिये

सुनील दत्त ने कहा…

लाभदायक जानकारी देने के लिए धन्यवाद

Arvind Mishra ने कहा…

लम्बा लेख है पूरा नहीं कर सका ..पर लिखा आपने ठीक ठाक है !

Shah Nawaz ने कहा…

एक बेहतरीन लेख और ज़बरदस्त ज्ञान के लिए बहुत-बहुत बधाई.

सलीम ख़ान ने कहा…

agree with SHAH NAWAZ !!!!!!!!!

सुज्ञ ने कहा…

वैदिक दृष्टिकोण से शाकाहार व मांसाहार पर आपके लेख का अभी भी इंतज़ार है।

सत्‍य अन्‍धकार ने कहा…

सुज्ञ बहन की इच्‍छा के पूर्ण करने के पश्‍चात वैदिक दृष्टिकोण से 'नियोग और नारी' विषय पर सत्‍य का अन्‍धकार डालिये

स्वाति ने कहा…

बेहतरीन लेख ..

सौरभ आत्रेय ने कहा…

सुज्ञ जी, अभी इस विषय में मुझे वैदिक पुस्तकें पढ़ने को कम मिली हैं पर आपके याद दिलाने से अब मैं मैं इस विषय पर जल्द ही अध्यन करूँगा और भविष्य में एक तार्किक विवेचन के साथ लिखूंगा.

सौरभ आत्रेय ने कहा…

@सत्य अन्धकार ! ये कैसा नाम रखा है भाई तुमने क्या तुम्हारी दृष्टि में सत्य से अन्धकार फैलता है?
आपने जिस प्रकार 'नियोग और नारी' विषय पर लिखने को मुझसे कहा है उससे स्पष्ट प्रत्यक्ष दीखता है कि आपको सत्य जानने से कोई मतलब नहीं आपका उद्देश्य केवल दूसरों को नीचा दिखाने का प्रयास मात्र है. वैसे नियोग विषय को पढ़ने के लिये आप यहाँ चटकालगा सकते हैं.

nitin tyagi ने कहा…

लेख के लिए धन्यवाद.....

Divya ने कहा…

wonderful post !

admiring the deep insight in you.

Divya ने कहा…

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बेनामी जी की टिपण्णी से पता चला आप यदा कदा ही अवतरित होते हैं। लेकिन जब होते हैं, तब कुछ नया ही सीखने को मिलता है। आपकी सभी पोस्टें पढ़ीं । बहुत ज्ञान-वर्धन हुआ।

आपका आभार।
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बेनामी ने कहा…

@सत्य अन्धकार : लगता है ज्ञान का ऐसा हेलोजेन चमका है आँख में की कुछ दिखाई नहीं दे रहा है |

He he

बेनामी ने कहा…

90% hindu do not read VED. please form a book as VED SAR, which contain manner of prayer and time of prayer of Parmeshwar, quality of God etc. Please read Yatharthgeet.com and read yatharthgeeta to know the best ELMI BOOK. please campane aginst Wine which distroy hindu mostly.

chandrashekher ने कहा…

as a hindu you may eat all things you like. eating is not dharm. Parmeshar kewal chahata hai manusya satya aur nyay par rahe